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उनके ढोल फूट गए

Tue, 01 Sep 2015 08:27 PM IST
अशोक मिश्र
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आपने ढोल देखा है! अरे वही जिसे शादी-ब्याह, मूंडन, छेदन या तीज-त्योहारों पर बड़ी उमंग और उत्साह के साथ बजाया जाता था। मैं वही ढोल हूं। खैर, शादी-ब्याह, तीज-त्योहारों पर ढोल की जैसे-जैसे उपयोगिता घटती गई, राजनीति में इसकी उपयोगिता वैसे-वैसे बढ़ती गई।
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अब आप कहेंगे कि मैं क्या ऊटपटांग बक रहा हूं? तो साहब, बात यह है कि जिस दिन आजादी मिली, नेहरू जी ने अपनी पीठ पर एक ढोल बांध लिया और लगे पीटने, 'मुझे इस देश में समाजवाद लाना है। मुझे इस देश को स्वर्ग बनना है।' जब तक वह जिंदा रहे, यह समाजवाद का ढोल बजता ही रहा। उसके बाद तो किसिम-किसिम के ढोल ईजाद कर लिए गए। जैसे-जैसे राजनीति में भ्रष्टाचार, अनाचार, भाई-भतीजावाद, प्रांतवाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता बढ़ती गई, ढोल का आकार-प्रकार भी बदलता गया।

अभी जो जिल्ले सुबहानी दिल्ली में हैं, वह विकास का ढोल पीट रहे हैं। उन्होंने अपनी पीठ पर 'जन धन योजना', 'मेक इन इंडिया', 'स्टैंड अप इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया', 'स्किल इंडिया' जैसे न जाने कितने अंग्रेजी नाम वाले ढोल बांध रखे हैं। जब मर्जी होती है, तो वह कोई एक ढोल बजाने लगते हैं। और कभी-कभी तो सारे ढोल एक साथ पीटने लगते हैं। सवा साल-डेढ़ साल पहले उन्होंने 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' का ढोल पीटा था, लेकिन उनके साथियों ने खाया भी और दूसरों को खिलाया भी। उनका एक ढोल था कि आन नहीं मिटने देंगे। पर यह ढोल कुछ ऐसे बजा कि आज रोज आन मिट रही है, और वह टुकुर-टुकुर निहार रहे हैं।
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वह जब ढोल बजाने से ऊब जाते हैं, तो मन की बात करने लगते हैं। इससे भी मन भर जाता है, तो फिर विकास का ढोल पीटने लगते हैं। वह यह भी नहीं देखते हैं कि ढोल की डोरियां कब की ढीली हो चुकी हैं, और उन्हें तत्काल कसने की जरूरत है। भला आप लोग ही बताइए, ऐसी हालत में मैं (ढोल) भला कब तक बजता? जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ, तो मैं फूट गया। तब से जिल्ले सुबहानी परेशान हैं। आखिर उनके ढोल फूट जो गए हैं।
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