मिथकों को दैवीय स्वरूप प्रदान कर, वृहद भारत के गरीब समाज पर एकछत्र शासन करने वालों के लिए इतिहास महज राजे-रजवाड़ों की वंशावलियों, उनकी वीरता का बखान और संस्कृति के नाम पर कुलीनता के पक्षपोषण का औजार रहा है। सदियों से भारतीय ज्ञान-मीमांसा, इन्हीं धुरियों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यहां के इतिहास को जानने के लिए, इतिहास की समझ रखने वाले विदेशी यात्रियों के लिए यह जमीन चुनौतीपूर्ण रही। उन्होंने चुनौती को स्वीकारा। वे यहां आए। इस धरती पर भ्रमण किया। अपनी समझ और सीमाओं के अंदर जो लिख सकते थे, लिखा। यहां के किसी ने दूसरे देशों की ओर रुख नहीं किया और न अन्य समाजों का इतिहास तलाशने का काम यहां के तीर्थयात्रियों ने किया। आम जन तो पठन-पाठन से दूर था ही, उसके संघर्ष और वाचिक गाथाएं, गंवारों के कृत्य से ज्यादा मंडित न की जा सकीं। दूसरी ओर इतिहास में आमजन की पहलकदमी को नकारने वालों ने, आमजन के सामने अपने हितों की हिफाजत के लिए इतिहास को गल्प में बदला। गल्प से सृजित चाणक्य, कौटिल्य और विष्णु गुप्त के अंतर्संबंध आज तक स्पष्ट न हो सके। अंग्रेजों के आने के बाद, पहली बार यहां के सत्ता-समाज, कृषि और संस्कृति को लिपिबद्ध करने के प्रयास हुए। अंग्रजों ने ही गजेटियर प्रकाशन की नींव रखी, जो आज भी तमाम शोध कार्यों का आधार बनी हुई है।
इसलिए हम चाहे अंग्रेजों पर जो भी दोषारोपण करें, इतिहास को औपनिवेशिक मानसिकता से लिखा बताएं, तब भी इतिहास को अभिलेखीय साक्ष्यों पर आधारित करने का प्रयास उन्होंने ही किया। हम तो शब्दभेदी बाण चलाते रहे। तलवार और घुड़सवारों से परास्त होते रहे। इसलिए जो लोग आजादी के बाद लिखे गए इतिहास को अस्पृश्य समझ कर, अपने मनमाफिक इतिहास की रचना को उद्धत दिख रहे हैं, दरअसल वे इतिहास का पुनर्लेखन नहीं कर रहे, इतिहास को विकृत कर, अपने अमानवीय एजेंडे की स्वीकार्यता बढ़ाना चाहते हैं। अकबर और राणा प्रताप के बीच के सत्ता संघर्ष को हिंदू-मुस्लिम संघर्ष बना देना, इतिहास का पुनर्लेखन नहीं, कबायली लेखन है।
इतिहास के तमाम शोध कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए अभिलेखीय साक्ष्यों की जरूरत होती है। उन अभिलेखों या साक्ष्यों को परखने की जरूरत होती है। जब बिना किसी पुरातात्विक साक्ष्य या अभिलेखीय प्रमाण के इतिहास लेखन को बढ़ावा दिया जाएगा, तो इतिहास को विकृत होने से रोका नहीं जा सकता।
मिथकों के दैवीय नायकों को ऐतिहासिक बनाने, उन्हें पूज्य बनाने की बाध्यता को अपनाने से उनके प्रतिनायकों के भी दैवीय बनाए जाने की परिस्थितियां पैदा होंगी, हो रही हैं। लाख प्रतिबंधों और प्रयास के बावजूद, प्रतिनायकों का निर्माण रोका नहीं जा सकता।
आज जरूरत यह है कि इतिहास के उपलब्ध प्रामाणिक अभिलेखों को बचाया जाए। आस्था के बजाय तर्कशीलता से काम लिया जाए। अभिलेखों का पुनर्मूल्यांकन बुरा नहीं होता, बल्कि यह शोध के नए दरवाजे खोलता है। भारत जैसे गरीब और अल्प शिक्षित समाज में इतिहास लेखन में सबाल्टर्न नजरिये को भी प्रमुखता से स्थान दिया जाना चाहिए। इतिहास लेखन या पुनर्लेखन का काम अकादमियों और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता में होना चाहिए। कमजोर समाज की उपेक्षा, इतिहास को पक्षपाती बनाएगी। इतिहास का पुनर्लेखन, सबाल्टर्न की सत्ता में ही संभव है। इसलिए सबाल्टर्न को सत्ता से बाहर कर इतिहास लेखन, एक विकृत लेखन को जन्म देगा।