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भूजल को कैसे बचाएं

Thu, 29 Jun 2017 06:01 PM IST
ईशा झावेरी
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ईशा झावेरी
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हर वर्ष जून से सितंबर के अंत तक मानसून की बारिश भारत के दक्षिणी तट से होकर धीरे-धीरे उत्तर की ओर फैलती है, और भारत में होने वाली कुल 80 फीसदी बारिश के लिए यही मानसून जिम्मेदार होता है। भीषण गर्मी के बाद होने वाली इस बारिश से नदियां उफनने लगती हैं, खेतों में बुआई शुरू हो जाती है और जलाशयों में पानी भरने लगता है। मगर इस हर्षोल्लास के पीछे कृषि व्यवस्था की हताशा छिपी हुई है। 
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1960 के दशक से भारत में भूजल से सिंचाई में नाटकीय रूप से बढ़ोतरी हुई है और इसने देश की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाई है। देश का एक तिहाई खाद्यान्न पैदा करने वाले 26 करोड़ लघु तथा सीमांत किसानों और खेतिहर मजदूरों के जीवनयापन का यह एक बड़ा सहारा है। मगर इसकी वजह से देश के भूजल पर भारी दबाव पड़ रहा है। दुनिया में भूजल का सर्वाधिक दोहन भारत में होता है, जिसकी वजह से 1980 के दशक से पूरे देश में भूजल स्तर गिरता जा रहा है।

देश के उत्तर-पश्चिम के क्षेत्र में यह समस्या खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है, जहां भूजल स्तर आठ मीटर से 16 मीटर नीचे चला गया है। रिचार्ज दर काफी कम होने के कारण यह जल ऐसे ही जाया हो जाता है। वास्तव में भूजल पर ऐसी निर्भरता टिकाऊ नहीं हो सकती। सबसे बड़ी बात तो यही है कि मानसून में होने वाली बारिश के साथ अनिश्चितता जुड़ी हुई है। जलवायु संबंधी कुछ प्रतिमान इसके बढ़ने की संभावना जताते हैं, तो कुछ प्रतिमानों ने इसके कमजोर होने का अनुमान जताया है। जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय मानसून में परिवर्तन हो रहा है, जिससे देश के भूजल संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा।भूजल पर बढ़ते दबाव का मुद्दा सिर्फ पानी से नहीं जुड़ा है, इसका संबंध मानवीय व्यवहार और आर्थिक नीति से भी है।
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उदाहरण के लिए जब सूखाग्रस्त क्षेत्र में पानी उपलब्ध कराया जाता है, तो उससे अधिक पानी वाली फसलों की मांग भी बढ़ती है, जिससे सिंचाई के लिए दबाव बनता है और अंततः भौतिक प्रणाली, पर्यावरण और लोगों पर दबाव बढ़ता है। इसलिए यह समझना अहम है कि आखिर लोग पानी का कैसे इस्तेमाल करते हैं। खेती और आर्थिक नीतियों के जटिल संबंधों को देखते हुए भारत में भूजल का भविष्य कैसा है?
इस प्रश्न का जवाब तलाशने के लिए मैंने न्यू हैम्पशायर यूनिवर्सिटी और पेन्सिलवेनिया यूनिर्विसिटी के सहयोगियों के साथ ग्रामीण भारत में उपयोग किए जाने वाले नॉनरेनेवबल भूजल यानी रिचार्ज न किए जा सकने वाले भूजल का एकीकृत आर्थिक-जलविज्ञान संबंधी आकलन किया। वैसे भारत में राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना चल रही है, जिसका मकसद अधिक जल वाले क्षेत्र से कम जल वाले क्षेत्र की ओर नदियों का पानी ले जाया जाना है ताकि सिंचाई की सुविधा बढ़ाई जा सके। कावेरी और गोदावरी नदियों को नहर के जरिये जोड़ने की इस तरह की पहली परियोजना 16 सितंबर, 2015 में पूरी हो चुकी है। 

हमारे अध्ययन का निष्कर्ष है कि अगले तीस वर्षों तक भूजल स्तर में गिरावट जारी रह सकती है। पंजाब और हरियाणा, राजस्थान के उत्तरी क्षेत्र और गुजरात तथा उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में भूजल स्तर में लगातार गिरावट दर्ज की जाएगी। भूजल स्तर के नीचे जाने से पानी खींचने का खर्च बढ़ेगा जिसका सीधा प्रभाव कल्याणकारी योजनाओं पर पड़ सकता है। वास्तव में भूजल स्तर को ऊंचा करने के लिए कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा दिया जा सकता है, सिंचाई की प्रणाली बदली जा सकती है और इसके साथ ही छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों को मदद पहुंचाने के लिए बेहतर नीतियां बनाई जा सकती हैं। 
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- लेखिका स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में रिसर्च फेलो हैं
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