फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

कैसे तैयार हुई हिंसा की जमीन : जमीन विवाद भारत के हर गांव और शहर में है

Avdhesh Kumar
Updated Tue, 23 Jul 2019 03:54 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
priyanka gandhi sonbhadra - फोटो : अमर उजाला

किसी छोटे गांव में दस लोगों को मार दिया जाए तथा दो दर्जन के आसपास घायल हों, तो वहां क्या स्थिति होगी, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के घोरावल इलाके के उम्भा गांव में यही हुआ। जमीन विवाद भारत के हर गांव और शहर में है। किसी कानून के राज में चाहे जमीन का जितना बड़ा विवाद हो, इस तरह सरेआम हिंसा का दुस्साहस करने का उदाहरण अत्यंत कम मिलेगा। अंडरवर्ल्ड और अपराधी गिरोह एक समय शहरों में जमीन हथियाने के लिए अवश्य कभी-कभी ऐसा करते थे। किंतु वह भी बीते दिनों की बात हो गई।

जमीन को लेकर विवाद काफी पुराना है। ग्राम प्रधान का कहना था कि उसने जमीन खरीदी है तथा प्रशासन ने भी उस पर मुहर लगा दी है, लेकिन स्थानीय लोग उसे कब्जाए बैठे हैं। ग्राम प्रधान अचानक भारी संख्या में ट्रैक्टर, और लोगों को लेकर खेतों की जुताई कराने लगा। स्थानीय निवासियों ने, जो आदिवासी हैं, विरोध किया तो उन पर हमला किया गया। उन्होंने भी प्रति हमला किया। दोनों तरफ से ईंट, पत्थर, ढेले, लाठी, गंड़ासा आदि से लड़ाई हुई, किंतु ग्राम प्रधान की ओर से अचानक गोलियां चलने लगीं एवं फिर लोग ढेर होते चले गए।



पहली नजर में मामला स्थानीय प्रशासन और प्रभावी लोगों की मिलीभगत का दिखता है, जिन्होंने आदिवासियों द्वारा लंबे समय से जोती जा रही जमीनों को उनके नाम करने की जगह उसे खाली दिखाया। मुख्यमंत्री ने एक समिति बना दी है, जो पूरी स्थिति की रिपोर्ट 10 दिनों में देगी।

विज्ञापन

priyanka gandhi sonbhadra - फोटो : अमर उजाला
किसी छोटे गांव में दस लोगों को मार दिया जाए तथा दो दर्जन के आसपास घायल हों, तो वहां क्या स्थिति होगी, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के घोरावल इलाके के उम्भा गांव में यही हुआ। जमीन विवाद भारत के हर गांव और शहर में है। किसी कानून के राज में चाहे जमीन का जितना बड़ा विवाद हो, इस तरह सरेआम हिंसा का दुस्साहस करने का उदाहरण अत्यंत कम मिलेगा। अंडरवर्ल्ड और अपराधी गिरोह एक समय शहरों में जमीन हथियाने के लिए अवश्य कभी-कभी ऐसा करते थे। किंतु वह भी बीते दिनों की बात हो गई।

जमीन को लेकर विवाद काफी पुराना है। ग्राम प्रधान का कहना था कि उसने जमीन खरीदी है तथा प्रशासन ने भी उस पर मुहर लगा दी है, लेकिन स्थानीय लोग उसे कब्जाए बैठे हैं। ग्राम प्रधान अचानक भारी संख्या में ट्रैक्टर, और लोगों को लेकर खेतों की जुताई कराने लगा। स्थानीय निवासियों ने, जो आदिवासी हैं, विरोध किया तो उन पर हमला किया गया। उन्होंने भी प्रति हमला किया। दोनों तरफ से ईंट, पत्थर, ढेले, लाठी, गंड़ासा आदि से लड़ाई हुई, किंतु ग्राम प्रधान की ओर से अचानक गोलियां चलने लगीं एवं फिर लोग ढेर होते चले गए।

पहली नजर में मामला स्थानीय प्रशासन और प्रभावी लोगों की मिलीभगत का दिखता है, जिन्होंने आदिवासियों द्वारा लंबे समय से जोती जा रही जमीनों को उनके नाम करने की जगह उसे खाली दिखाया। मुख्यमंत्री ने एक समिति बना दी है, जो पूरी स्थिति की रिपोर्ट 10 दिनों में देगी।

आदिवासी बहुल सोनभद्र जिले में जगह-जगह भूमिहीन सरकारी जमीनें जोतकर वर्षों से गुजर-बसर कर रहे हैं। उन्हें जमीन का मालिकाना हक कभी नहीं दिया गया। जितने सर्वे हुए उनमें यह सच तो दिखा होगा कि वे जमीन जोत रहे हैं। लेकिन रिकॉर्ड में उन्हें भूमिहीन बताया जाता रहा। जिस गांव में यह खूनी संहार हुआ है, वहां गोंड बिरादरी के लोग कई पुश्तों से खेती करते आए हैं। अब जितनी जानकारी सामने आई है, गोंड जनजाति के लोग प्रशासन से लगातार गुहार लगाते रहे, लेकिन उन्हें जमीन पर अधिकार नहीं दिया गया।

खूनी जमीन की पूरी कथा विचित्र है। 1955 में कांग्रेस के जुड़े एक प्रभावी व्यक्ति ने आदर्श कोऑपरेटिव सोसायटी का निबंधन कराया। इस जमीन में से तहसीलदार ने 90 बीघा जमीन उस आदर्श सोसायटी के नाम कर दी। कहा जाता है कि सोसायटी का निर्माण स्थानीय निवासियों के विकास के उद्देश्य से किया गया था। यह तो छानबीन का विषय है, उस समय से सोसायटी ने वाकई विकास के लिए काम किया या नहीं। इस जमीन को बाद में 1989 में एक आईएएस के नाम पर कर दिया गया।

यह कैसे हुआ? आदिवासियों के कब्जे से वे जमीन खाली नहीं करा पाए। उन्होंने इसे ग्राम प्रधान यज्ञदत्त भूरिया को बेच दिया। भूरिया ने जमीन खरीदने के साथ ही कब्जे का प्रयास आरंभ कर दिया था। वह न्यायालय भी गया और अपने पक्ष में फैसला भी ले आया। इस पूरे प्रकरण को गहराई से देखने से साफ हो जाता है कि इसे केवल ग्राम प्रधान और उसके लोगों का अपराध नहीं माना जा सकता। इसमें पिछले साढ़े छह दशकों की सरकारें, प्रशासन सब शामिल हैं। आखिर उस जमीन की मिल्कियत का फैसला पहले ही हो जाना चाहिए था।

मुख्यमंत्री ने पूरे जिले के लिए एक समिति बनाने तथा सर्वे करके आवास, बिजली, शौचालय आदि योजनाएं पहुंचाने की घोषणा की है। हालांकि इन सबसे अलग किसी भी अवस्था में कोई व्यक्ति इस तरह सरेआम हिंसा कैसे कर सकता है। अगर प्रशासन की शह नहीं हो, तो सरेआम अपराध करने का दुस्साहस ग्राम प्रधान नहीं कर सकता है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
विज्ञापन
Next