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पलायन से कैसे मिले मुक्ति

Tue, 13 Jun 2017 06:29 PM IST
उमेश चतुर्वेदी
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उमेश चतुर्वेदी
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पहाड़ में एक कहावत है, पानी और जवानी उसके काम नहीं आती, नीचे बह जाना उसकी नियति होती है। अब यह उत्तर प्रदेश की भी कहानी बन गई है। खासकर राज्य के पूर्वी इलाकों के ज्यादातर गांव जवानी से खाली हैं। अगर कोई जवान गांव में बचा भी है, तो उसकी वजह यह नहीं कि उसके पास अपने गांव में खुशी-खुशी जिंदगी गुजारने लायक तंत्र मौजूद है। वह किसी न किसी मजबूरीवश ही गांव में ही टिका है। उत्तर प्रदेश से पलायन का दंश कभी-भी गंभीर सामाजिक मुद्दा नहीं रहा।
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पलायन को लेकर न तो कभी व्यवस्थित अध्ययन हुआ और न ही ऐसा करने की कोशिश की गई। ऐसे में भारतीय वाणिज्य उद्योग मंडल यानी एसोचैम और थॉट आर्बिट्रेज रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी टारी की रिपोर्ट पहला व्यवस्थित कदम मानी जा सकती है, जिसमें उत्तर प्रदेश के पलायन को लेकर व्यवस्थित अध्ययन पेश किया गया है। जिसने यह बताया है कि 2001 से 2011 के बीच 20 से 29 साल आयु वर्ग के 58 लाख 34 हजार लोगों ने रोजगार के लिए राज्य से बाहर पलायन किया, जबकि 1991 से 2001 के बीच यह आंकड़ा 29 लाख 55 हजार था। इस रिपोर्ट के आधार पर देखें, तो अब पलायन का आंकड़ा लगभग दोगुना हासिल चुका है। 

यह रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा लोग रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाते हैं और हाल के दशकों में इसमें और इजाफा हुआ है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड, अवध, पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों के गांवों की हालत देखने के बाद इस रिपोर्ट के आंकड़े भी कम ही बताए जा सकते हैं। सूखा और बाढ़ के बाद उजाड़ होने वाली जिंदगियों को संवारने के लिए पलायन करने वाले लोग और उत्तर प्रदेश से बाहर और खासकर गुजरात, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जाने वाली ट्रेनों की जनरल बोगी और स्लीपर क्लास की भीड़ इस रिपोर्ट में शामिल आंकड़ों के विस्तार की ही मांग करती है। 
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उत्तर प्रदेश का पूर्वी और उससे सटा बिहार से लोगों के पलायन का लंबा इतिहास रहा है। यहां के लोकगीतों में इस पलायन के दर्द को गहराई से समझा जा सकता है। एग्रीमेंट के तहत इन्हीं इलाकों के लोगों को उन्नीसवीं सदी में अंग्रेज मारीशस, गुयाना, फिजी आदि देशों में ले गए थे। जहां की जमीनों को इन इलाके के लोगों ने अपने पसीने से सींचा और उन देशों की आर्थिक तसवीर बदल दी। यह पलायन का दर्द ही है कि भोजपुरी इलाके के गंवई नाटककार भिखारी ठाकुर की रचनाएं अमर बन गईं। 

पलायन ने उत्तर प्रदेश के उन इलाकों की समृद्धि में वैसा योगदान नहीं दिया, जिस तरह केरल के पलायन ने दिया है। खाड़ी देशों से आ रहे पेट्रो डॉलर ने राज्य की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वहीं उत्तर प्रदेश के पलायित लोगों में से ज्यादातर बमुश्किल अपना पेट पालते हैं और पीछे गांवों में छूट गए अपने परिवार को कुछ रकम भेज देते हैं, जो उनके गुजारे में थोड़ी मददगार हो जाती है।

विधानसभा चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने राज्य के पलायन को बड़ा मुद्दा बनाया था। राज्य में पार्टी की भारी जीत के पीछे एक हद तक इस मुद्दे का भी हाथ रहा है। बजट सत्र के दौरान लोकसभा में केंद्र सरकार स्वीकार कर चुकी है कि उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय दर से भी ज्यादा है। इसलिए योगी सरकार पर दबाव भी है कि वह पलायन रोकने और राज्य की बेरोजगारी दर को काबू करे। एसोचैम और टारी ने अपनी रिपोर्ट देते वक्त योगी सरकार के लिए छह सूत्री एजेंडा भी तैयार किया है, जिसे ‘एक्शन प्लान फॉर द न्यू गवर्नमेंट’ नाम दिया गया है। इस रिपोर्ट ने भी माना है कि राज्य के पूर्वी क्षेत्रों से ज्यादा पलायन हो रहा है, लिहाजा उस क्षेत्र में कौशल विकास केंद्रों की स्थापना पर भी जोर है। 
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