हाल ही में प्रकाशित बैंक ऑफ अमेरिका तथा मेरिल लिंच की रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रशांत महासागर की जलवायु में होने वाले परिवर्तन से भारत में कम बारिश की आशंका के संकेत देने वाले अल नीनो के प्रभाव से सूखे की स्थिति के कारण खाद्यान्न की कीमतों के अधिक रहने की आशंका होगी। 27 अप्रैल को उद्योग मंडल एसोचैम ने भी अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट के आधार पर कहा है कि अगर मानसून पर अल नीनो का असर रहता है, तो दलहन के दाम भी तेजी से बढ़ते हुए दिखाई देंगे। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने आशंका जताई है कि लगातार बढ़ रही महंगाई नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। यकीनन 16वीं लोकसभा के परिणाम के बाद नई सरकार की पहली परीक्षा महंगाई के मोर्चे पर ही होनी है।
उल्लेखनीय है कि 15 अप्रैल को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) और थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के जो आंकड़े जारी किए गए हैं, उनके अनुसार, जो थोक महंगाई दर विगत फरवरी में 4.68 फीसदी थी, वह बढ़कर मार्च में 5.7 फीसदी तक पहुंच गई। इसी प्रकार खुदरा महंगाई दर, जो फरवरी में 8.03 फीसदी थी, वह मार्च में बढ़कर 8.31 फीसदी तक जा पहुंची है। खाद्य पदार्थों की थोक महंगाई दर फरवरी के 8.12 फीसदी के स्तर से उछलते हुए मार्च में 9.9 फीसदी दर्ज की गई है। वस्तुतः महंगाई दर में यह इजाफा इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि पिछले वर्ष दिसंबर से इसमें गिरावट दिख रही थी और फरवरी में थोक महंगाई दर नौ माह के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई थी। हालांकि महंगाई बढ़ने के कुछ नए प्राकृतिक कारण भी दिख रहे हैं। फरवरी-मार्च के बीच देश के बड़े हिस्से में हुई बेमौसम बारिश और भारी ओलावृष्टि ने फसलों को नुकसान पहुंचाया है। इसके कारण खाद्य वस्तुओं के कम उत्पादन और उनकी कीमतों में वृद्धि की आशंका है।
इस बीच मानसून के संभावित मिजाज को लेकर जो आकलन सामने आ रहे हैं, वे भी महंगाई की चुनौती को विषम बना सकते हैं। मौसम विभाग के शोध अध्ययनों में कहा जा रहा है कि इस बात की संभावना है कि अल नीनो असर के कारण मानसून कमजोर रहेगा। इससे उत्तर भारत में कम बारिश होने की आशंका बढ़ गई है। उल्लेखनीय है कि अल नीनो प्रशांत महासागर की जलवायु में होने वाला एक अस्थायी परिवर्तन होता है। पहले 2002, 2004, 2009 और 2012 में भी अल नीनो के कारण भारत में मानसून उम्मीद से हल्का रहा था, जिससे कई बार गंभीर सूखे की स्थिति भी बन चुकी है।
यदि भयानक अल नीनो तूफान इस साल भी आता है, तो चालू वित्त वर्ष के दौरान भारत में महंगाई दर 8.5 फीसदी से अधिक और जीडीपी विकास दर घटकर पांच फीसदी के स्तर पर आ सकती है। महंगाई का ऊंचा स्तर लोगों की मुश्किलें और बढ़ा सकता है। अभी भी यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि बढ़ती खुदरा महंगाई ने लोगों को न केवल ज्यादा दाम वाली चीजों, बल्कि दाल और फल से लेकर सब्जियों जैसी बुनियादी वस्तुओं पर भी अपना खर्च घटाने पर विवश कर दिया है। गरीब ही नहीं मध्यवर्गीय परिवारों को भी अब जीवन के लिए जरूरी वस्तुएं खरीदने से पहले कई बार सोचना पड़ रहा है। खाद्य पदार्थों की कीमत में बढ़ोतरी आम जनता की जेब को खाली कर रही है।
निस्संदेह देश के नए प्रधानमंत्री को मौजूदा सरकार की गलतियों से सबक लेकर महंगाई पर अधिक ध्यान देने की जरूरत होगी। नई सरकार के द्वारा हर स्तर पर महंगाई नियंत्रण के लिए रणनीतिक प्रयत्न जरूरी होंगे। यह समझना होगा कि सिर्फ अधिक उत्पादन से कीमतों में कमी की पुरानी सोच सफल नहीं है। खाद्य आपूर्ति शृंखला को सुधारने के लिए कई महत्वपूर्ण नीतिगत कदम महंगाई रोकने का अच्छा विकल्प हो सकते हैं।