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कैसे बनेंगे स्मार्ट शहर

महेंद्र बाबू Updated Thu, 11 Oct 2018 06:18 PM IST
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महेंद्र बाबू

मानसून की मूसलाधार बारिश में तबाही और नुकसान के बाद देश के शहर पटरी पर लौट रहे हैं। पर वर्षा में शहरों की सड़कों के नदियों की तरह दिखने और कारों के नावों की तरह बह जाने के दृश्य स्मृति में अब भी ताजा हैं। देश के शहरी केंद्रों और महानगरों का इतिहास सदियों पुराना है। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के ये केंद्र प्राकृतिक आपदाओं का मुकाबला करने और रोज-रोज के ट्रैफिक का सामना करने में विफल हो गए हैं। गुड़गांव और दिल्ली में भीषण ट्रैफिक जाम, सीवेज व्यवस्था के बेकाबू होने से मुंबई की मुश्किलें,  चेन्नई के बाढ़ में डूबने, तेलंगाना में मूसलाधार बारिश के कारण हैदराबादियों का संघर्ष, बंगलूरू का पानी के लिए तरसना आदि अब टीवी की आम खबरें हैं, जिनसे किसी को आश्चर्य नहीं होता।



संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (यूएनडीईएसए) द्वारा इस साल जारी वैश्विक शहरीकरण संभावना की संशोधित रिपोर्ट को इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है। यह रिपोर्ट कहती है कि 2050 तक भारत, चीन और नाइजीरिया की शहरी आबादी पूरी दुनिया की शहरी आबादी की एक तिहाई से अधिक होगी। यह जानकारी भारतीय शहरों के भविष्य के लिए उम्मीद और चिंता, दोनों की वजह है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, 37.7 करोड़ भारतीय, जो कुल आबादी का 31.1 प्रतिशत है, शहरों में रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक भारत की 52.8 फीसदी आबादी शहरों में रहेगी, जबकि अभी यह आंकड़ा 34 प्रतिशत है। दूसरी ओर, 2028 तक दिल्ली आबादी के मामले में टोक्यो को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे बड़ी महानगरी बन जाएगी। ये सारे तथ्य बताते हैं कि भारत व्यापक शहरीकरण की ओर जा रहा है, जो भविष्य में हमारे तेज आर्थिक विकास की वजह बन सकता है। इतिहास गवाह है कि शहरीकरण में अर्थव्यवस्था को गति देने की संभावना होती है।


वैसे तो भारत की शहरी आबादी से संबंधित संयुक्त राष्ट्र का ताजा आकलन उम्मीदें जगाता है, लेकिन बुनियादी ढांचे में कमी, नागर प्रशासन का अभाव और टिकाऊ शहरी जीवन के प्रति उदासीनता जैसी कई चुनौतियां भी इसके साथ जुड़ी हैं।


विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा हाल में जारी आंकड़े बताते हैं कि हवा की बेहद खराब गुणवत्ता के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष बीस देशों में शामिल है, और देश के चौदह शहर इस सूची में हैं।


दरअसल शहरों के समग्र विकास के क्षेत्र में व्याप्त चुनौतियों को दूर करने के लिए व्यापक रूपरेखा की जरूरत है। ऐसा तभी हो पाएगा, जब भारत अपनी राष्ट्रीय शहरी नीति (एनयूपी) विकसित करके इसे लागू करेगा। यह स्वागतयोग्य है कि आवास और शहरी विकास मंत्रालय ने एनयूपी का मसौदा तैयार करने के लिए एक कमेटी गठित की है। शहरी विकास के लिए अम्रुत, हृदय, प्रधानमंत्री आवास योजना और स्वच्छ भारत जैसी कई योजनाएं चल रही हैं। एनयूपी अस्तित्व में आ जाएगा, तो ये सारी योजनाएं एक साथ जुड़ जाएंगी और उम्मीद की जानी चाहिए कि तब शहरीकरण की ओर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा। यह अच्छा संकेत है कि मौजूदा सरकार ने शहरीकरण को विस्तार देने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में देश को बनाए रखने की जरूरत समझी है। वर्ष 2018-19 में सरकार ने आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय का बजट 2.8 प्रतिशत बढ़ाकर 41,765 करोड़ किया है। अगर इस धनराशि का उपयोग रोजगार व जन सुविधाएं बढ़ाने, जीवन स्तर बेहतर करने और शहरों के बुनियादी ढांचे की कमियां दूर करने के लिए किया जाए, तो भारतीय शहर वैश्विक स्तर पर अपनी छाप छोड़ने में सफल होंगे।


-लेखक एचएनबी गढ़वाल सेंट्रल यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट डीन हैं। 

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