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पंजाब विश्वविद्यालय कैसे बना अव्वल?

Tue, 10 Dec 2013 07:29 PM IST
गोविंद सिंह
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जब दुनिया के 250 श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की सूची में पंजाब विश्वविद्यालय का नाम आया, तो देश भर के शिक्षाविदों की आंखें फटी रह गईं। जिस विश्वविद्यालय का नाम देश के अंदरूनी संस्थानों की सूची में ही कहीं न हो, उसने कैसे इतनी ऊंची छलांग लगाई? लेकिन यह सच है, और चूंकि लंदन टाइम्स का सर्वे निर्विवाद रहा है, इसलिए उस पर भरोसा न करने का कोई कारण भी नहीं है। यही नहीं, एक बार फिर इस विश्वविद्यालय ने ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) और दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्था वाले 17 देशों के विश्वविद्यालयों में 13वां स्थान पाया है।
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आलोचक कह रहे हैं कि चूंकि देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसी विश्वविद्यालय से निकले हैं, इसलिए उन्होंने इसकी सिफारिश की होगी। कोई कह रहा है कि इन सर्वे एजेंसियों पर बिल्कुल भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे पैसा लेकर सर्वे करवाती हैं। लेकिन इन पंक्तियों के लेखक को पंजाब विश्वविद्यालय की इस छलांग पर आश्चर्य नहीं हुआ। बल्कि हैरत होती है कि उसे यह सम्मान इतनी देर से क्यों मिला? जो आरोप आज टाइम्स के सर्वे पर लगाए जा रहे हैं, वास्तव में वे स्वदेशी सर्वे एजेंसियों पर लगते हैं, जो ईमानदारी के साथ सर्वे नहीं करते हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आकलन के कुछ मानदंड हैं, जिनके बिना आप उस दौड़ में कहीं नहीं ठहरते। अधिकांश भारतीय विश्वविद्यालयों के लिए उन्हें छू पाना भी संभव नहीं हो पाता। इनमें प्रमुख हैं: छात्र- शिक्षक अनुपात, कितने नोबेल विजेता विद्वान विश्वविद्यालय ने पैदा किए, अनुसंधान का स्तर और परिमाण, अंतरराष्ट्रीय फैकल्टी, अंतरराष्ट्रीय छात्र, कितने पुरस्कार अध्यापकों और छात्रों को मिले हैं, अनुसंधान और नव-प्रवर्तन में निवेश, पढ़ाई का स्तर, नियोक्ताओं की नजर में प्रतिष्ठा, उद्योग जगत से होने वाली आय अर्थात विश्वविद्यालय किस हद तक उद्योग जगत से जुड़ा हुआ है, कितने और कैसे अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान होते हैं और कुल मिलाकर विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा कैसी है? ये कुछ मानदंड हैं, जिनमें भारतीय विश्वविद्यालय बहुत पीछे हैं।
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तीसरी दुनिया में ही हम चीन, ताइवान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया से बहुत पीछे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि किसी विश्वविद्यालय की साख दो-चार दिन में नहीं बनती। आप खुद ही तुलना कीजिए: दुनिया के पहले-दूसरे स्थान पर रहने वाले हार्वर्ड विश्वविद्यालय का सालाना बजट जहां 22,500 करोड़ रुपये है, वहीं हमारे श्रेष्ठ संस्थानों का बजट भी बमुश्किल 500-600 करोड़ का होता है। ऐसे भी विश्वविद्यालय हैं, जिनका बजट महज दस करोड़ भी नहीं होता है। ऐसे में आप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबले की सोच भी कैसे सकते हैं?

जहां तक पंजाब विश्वविद्यालय का सवाल है, उसके पीछे 130 साल की समृद्ध विरासत है। 1882 में लाहौर में स्थापित यह विश्वविद्यालय आजादी से पहले भी देश के पहली कतार के संस्थानों में था। 1947 में देश के बंटवारे के वक्त यह भी बंट गया। पहले शिमला और बाद में चंडीगढ़ में इसे ठौर मिली। अच्छी बात यह हुई कि तब के हुक्मरानों ने इसके महत्व को समझा और इसके साथ राजनीति नहीं खेली। 550 एकड़ में फैले इस विश्वविद्यालय में तब के श्रेष्ठ अध्यापकों को आमंत्रित किया गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक, समाज विज्ञानी, लेखक और साहित्यकार यहां अध्यापक बनकर आए। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और मुल्क राज आनंद इनमें कुछ हैं।

188 संबद्ध कॉलेजों और चार क्षेत्रीय कैम्पसों की बदौलत आज यह विश्वविद्यालय विश्व स्तर पर यों ही नहीं उभरा है। सत्तर-अस्सी के दशक में यहां पढ़ाई का माहौल वाकई अद्भुत था। तब यहां दाखिला हो जाना या अध्यापकी पा जाना, किसी ख्वाब से कम नहीं होता था। पहले इसका साठ प्रतिशत खर्चा केंद्र सरकार उठाती थी, तो चालीस प्रतिशत पंजाब सरकार। अब इसका पूरा खर्च केंद्र सरकार ही उठाती है। इसलिए यहां प्रादेशिक राजनीति का दखल नहीं के बराबर रहा है। अस्सी के दशक में आतंकवाद की काली छाया इसके ऊपर भी पड़ी। तब इसकी वीरानी बहुत कचोटती थी। आज यह फिर से तरक्की की चौकड़ी भरने लगा है, यह देखकर मन खुशी से भर जाता है।
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