नेपाल में हाल में आई विनाशकारी जलप्रलय ने एक बार फिर यह सवाल हमारे सामने खड़ा कर दिया है कि जब जलवायु परिवर्तन, तेजी से पिघलते ग्लेशियरों और अनियोजित मानवीय गतिविधियों के चलते हिमालय बेहद संवेदनशील होता जा रहा है, तब भारत इन बदलती परिस्थितियों से पैदा होने वाली आपदाओं के लिए आखिर कितना तैयार है?
यह सवाल अहम इसलिए है, क्योंकि नेपाल की त्रासदी को सिर्फ एक पड़ोसी देश में आई प्राकृतिक आपदा मानकर भूला नहीं जा सकता। यह भारत के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है, क्योंकि हिमालय की पारिस्थितिकी राजनीतिक सीमाओं से बंधी नहीं है और उसमें आने वाला कोई भी बड़ा बदलाव भारत के भूगोल और अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित कर सकता है।
उल्लेखनीय है कि 2024 में इसरो ने बताया था कि भारतीय हिमालयी नदी बेसिन में 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 ग्लेशियल झीलों में से 676 झीलें 1984 और 2023 के बीच काफी बड़ी हो गई थीं। इसी तरह, हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद के ताजा अध्ययन में भी ट्रांस हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने से बन रहीं दो हजार से भी अधिक झीलों को गंभीर खतरे के रूप में रेखांकित किया गया है।
हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और पंजाब के लिए इनसे जुड़े खतरे इसलिए अधिक बढ़ जाते हैं, क्योंकि हिमालयी नदियां इन क्षेत्रों की जीवनरेखा हैं। इसके अतिरिक्त, पहाड़ों से पैदा हुई आपदा का असर कुछ ही घंटों में नीचे के मैदानी इलाकों तक भी पहुंच सकता है। हाल के वर्षों में भारत में अचानक बाढ़ की कई बड़ी घटनाएं हुई हैं, जिनमें 2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2021 की चमोली आपदा, 2023 में सिक्किम में ग्लेशियर झील के फटने की घटना और पिछले साल धराली में हुई घटना शामिल हैं, जिनमें सैकड़ों लोगों की जान गई और बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ।
लिहाजा, यह स्पष्ट ही है कि हिमालय में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का प्रश्न अब केवल पर्यावरणविदों की चिंता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का प्रश्न भी बन गया है। अच्छी बात है कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) नेपाल की इस घटना पर एक विस्तृत अध्ययन शुरू करने की योजना बना रहा है। लेकिन, यह सुनिश्चित किया जाना भी उतना ही जरूरी है कि प्राकृतिक आपदाओं पर नजर रखने वाले सिस्टम ठीक ढंग से काम करें और उनसे मिली चेतावनियों को समय रहते लोगों तक पहुंचाया जा सके।
इसके साथ यह समझना भी जरूरी है कि हिमालय की अपनी भूगर्भीय सीमाएं और पारिस्थितिक वहन क्षमता है। इन सीमाओं की अनदेखी अंतत: उसी समाज के लिए खतरा बन सकती है, जिसके आर्थिक विकास के खातिर निर्माण कार्य हो रहे हैं।