कुछ कल्प व्यतीत होने पर ब्रह्मा सृष्टि-कार्य में संलग्न हो गए। उस समय उनके ‘नरद’ नामक कंठ प्रदेश से एक मुनि प्रकट हुए। इसी कारण उन्हें ‘नारद’ कहा गया। ब्रह्मा का जो पुत्र उनके चेतस (चित्त) से प्रकट हुआ, उसका नाम उन्होंने ‘प्रचेता’ रखा। फिर एक पुत्र ब्रह्मा के दक्षिण पार्श्व से उत्पन्न हुआ, जो सब कर्मों में दक्ष होने के कारण ही ‘दक्ष’ कहलाया। वेदों में कर्दम शब्द छाया के अर्थ में प्रयोग किया जाता है। जो बालक ब्रह्मा की छाया से प्रकट हुआ, उसका नाम ‘कर्दम’ पड़ा। इसी तरह ‘मरीचि’ शब्द वेदों में तेजोभेद के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अतः ब्रह्मा का वह पुत्र जो तेजस्वी रूप में प्रकट हुआ, वह ‘मरीचि’ कहलाया। जिस बालक ने क्रतु (यज्ञ) समूह का संपादन किया, उसे ब्रह्मा का पुत्र होने पर ‘क्रतु’ नाम दिया गया। ब्रह्मा का मुख उनका प्रधान अंग है। उस अंग से उत्पन्न हुआ बालक ‘इर’ अर्थात तेजस्वी था, इसलिए वह ‘अंगिरा’ नाम से प्रसिद्ध हुआ।
भृगु शब्द का अर्थ अत्यंत तेजस्वी होता है। ब्रह्मा से उत्पन्न जो बालक अत्यंत तेजस्वी था, वह ‘भृगु’ कहलाया। जो बालक होने पर भी अपने तेज से अरुण वर्ण का हो गया, वह ‘अरुण’ नाम से विख्यात हुआ। जिसके योगबल से हंस उसके अधीन रहते थे, ब्रह्मा का वह बालक ‘हंसी’ नाम से प्रसिद्ध हुआ।
ब्रह्मा का एक पुत्र विधाता को अत्यंत प्रिय था, उसका नाम ‘वशिष्ठ’ रखा गया। जो बालक सदा तप में लीन और संपूर्ण कर्मों में संयत रहता था, उसका नाम ‘यति’ पड़ा। वेदों में ‘पुल’ शब्द तपस्या के लिए आता है और ‘ह’ स्फुट-अर्थ में प्रयोग होता है। इसलिए जिस बालक में स्फुट रूप से तपस्या लक्षित हुई, उसे ‘पुलह’ नाम दिया गया। जिसके पूर्वजन्मों के तप समूह रूप में विद्यमान हैं; वह ‘पुलस्त्य’ के नाम से विख्यात हुआ।
‘त्रि’ शब्द त्रिगुणमयी प्रकृति को दर्शाता है और ‘अ’ विष्णु के अर्थ में प्रयुक्त होता है। जिस बालक की उन दोनों में समान भक्ति है, उसे ‘अत्रि’ कहा गया। मस्तक पर तपस्या के तेज से प्रकट हुई अग्निशिखा जैसी पांच जटाओं वाला बालक ‘पंचशिख’ कहलाया। जो तपस्या का भार वहन करने में पूर्ण समर्थ था, वह ‘वोढु’ कहलाया। जिसने दूसरे जन्म में आंतरिक अंधकार से रहित प्रदेश में तप किया था, उस शिशु का नाम ‘अपांतरतमा’ हुआ।
तपस्या में जिसकी स्वाभाविक रुचि थी, वह पुत्र ‘रुचि’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। सहसा ब्रह्मा के क्रोध के समय ग्यारह बालक प्रकट हुए और रोने लगे, वे अपने रोदन के कारण ‘रुद्र’ कहलाए। उन रुद्रों में से एक का नाम ‘कालाग्नि रुद्र’ है, जो भगवान शंकर के अंश माने जाते हैं। अन्य रुद्र, श्रीकृष्ण की कला मात्र माने गए हैं।
इसके अतिरिक्त, ‘सनक’ ब्रह्मा के प्रथम, ‘सनंदन’ द्वितीय, ‘सनातन’ तृतीय और ‘सनत्कुमार’ चौथे पुत्र हैं। ब्रह्मा ने उन चारों से संतान उत्पन्न करने को कहा। परंतु वे तपस्या के मार्ग पर चल पड़े, तो ब्रह्मा को बड़ा क्रोध आया। इसी क्रोध से रुद्रों की उत्पत्ति हुई। सनक और सनंदन शब्द, आनंद के वाचक हैं। इसलिए वे दोनों बालक, जो भक्तिभाव से परिपूर्ण एवं सदा आनंदित रहते हैं, उन्हें सनक और सनंदन नाम मिले। इसी तरह, भगवान श्रीकृष्ण, सनातन पुरुष हैं। जो उनका भक्त है, वह भी उन्हीं के समान है। इसीलिए ब्रह्मा का तीसरा कृष्ण-भक्त पुत्र, ‘सनातन’ नाम से विख्यात हुआ। ‘सनत’ का अर्थ है नित्य और ‘कुमार’ का अर्थ है शिशु। नित्य ही शैशव अवस्था में रहने वाले इस बालक को ब्रह्मा ने ‘सनत्कुमार’ नाम दिया। ब्रह्मा के ये चारों पुत्र नग्न रूप में रहते हैं, किंतु ज्ञान में इनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता।