अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले दिसंबर में अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की घोषणा करते हुए जब भारत को 'अग्रणी वैश्विक शक्ति' बताया, तो सुनकर बड़ा अच्छा लगा था। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका प्रमुख रक्षा भागीदार, भारत के साथ सामरिक सहयोग बढ़ाएगा। भारतीय विदेश मंत्रालय की तत्काल प्रतिक्रिया थी, भारत अमेरिका के नवीनतम सामरिक वक्तव्य का स्वागत करता है, क्योंकि यह बढ़ रहे भारत-अमेरिकी संबंधों को दर्शाता है। भारत और अमेरिका के बीच घनिष्ठ सहयोग हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समृद्धि में योगदान के साथ ही दोनों देशों की आर्थिक प्रगति में भी योगदान दे रहा है। यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी, क्योंकि ट्रंप ने न सिर्फ भारत के महत्व को रेखांकित किया, बल्कि चीन और पाकिस्तान के बारे में वे सभी बातें कहीं, जो भारत के लिए रुचिकर हो सकती हैं।
करीब दो महीने बाद ट्रंप प्रशासन ने एक और बड़ी घोषणा कर डाली। अधिकतर भारतीयों के लिए यह मधुर, नैसर्गिक संगीत से कम नहीं हो सकती। अमेरिकी सीनेट की विदेश मामलों संबंधी समिति में सहायक विदेश मंत्री (पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र) सूसन थॉर्नटन ने कहा कि अमेरिका चीन को एशियाई देशों पर दबाव डालने या उन पर धौंस जमाने नहीं देगा। उन्होंने यह भी कहा कि एशिया से अमेरिका को बेदखल करने के चीनी प्रयासों को सफल नहीं होने दिया जाएगा। सूसन के नीतिगत बयान को ओबामा प्रशासन के चर्चित 'एशियाई धुरी' सिद्धांत का विस्तार माना सकता है। ओबामा प्रशासन में विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने 2011 में इसे सार्वजनिक किया था। 'एशियाई धुरी' का निशाना था चीन। अमेरिका को 'सहज सहयोगी' बताने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु सहयोग के लिए अपनी सरकार दांव पर लगा दी थी, फिर भी वह इस धुरी की दिशा में खास नहीं बढ़ सके। हालांकि उन्हीं के शासनकाल में राष्ट्रपति बुश भारत को 'अंतरराष्ट्रीय शक्ति' बनाने का भरोसा दिला चुके थे।
ओबामा शासन के अंतिम दिनों तक 'एशियाई धुरी' काफी ढीली हो चुकी थी और परमाणु सहयोग अभी तक फलीभूत नहीं हुआ है। ट्रंप ने सत्ता संभालने के पहले ही 'सर्वप्रथम अमेरिका' की नीति घोषित कर दुनिया भर में अपने सहयोगी राष्ट्रों को आशंकित कर दिया। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने 'नाटो' देशों तक को नहीं छोड़ा। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद खुद अमेरिकी नेतृत्व में कायम हुए अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र के प्रति विश्वास को झकझोरने के बाद ट्रंप या उनके अधिकारियों की बातों पर भारत कितना यकीन करे? यह सवाल इसलिए कि अमेरिकी प्रतिष्ठान से ही उठ रही आवाजों को अनसुना नहीं किया जा सकता। जैसे 'फॉरेन अफेयर्स' पत्रिका के नवीनतम अंक में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है,'तीन चौथाई अमेरिकी डोनाल्ड ट्रंप को विश्वास लायक नहीं मानते। ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी, जापान, जॉर्डन, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन जैसे अमेरिका के परंपरागत सहयोगी देशों के अधिकतर नागरिकों को ट्रंप पर विश्वास नहीं है।'
अमेरिकी सत्ता तंत्र से जुड़े महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान, 'कार्नेगी एंडाउमेंट' के सीनियर फेलो फ्रेडरिक ग्रेरे का मत है, 'भारत के सामने एक बड़ा मुद्दा वह बुनियादी बात समझने का है, जब क्षेत्र में उकसाने वाली चीनी कार्रवाइयों के बाद अमेरिका हस्तक्षेप कर सकता है। वायु-समुद्र युद्ध, दूरदराज नाकेबंदी या समुद्रों में प्रवेश पर रोक-इन सभी रणनीतियों पर अमेरिका में होने वाले विचार में यह बुनियादी बात नहीं है। चीन के संबंध में अमेरिका की कोई रेड लाइन हो या न हो, अहम सबक यह है कि भारत अमेरिकी संरक्षण के सहारे नहीं रह सकता।' भारत जैसे देशों के लिए मनमोहक बातें करने वाले अमेरिकी कूटनीतिक भी समझते होंगे कि चीन के खिलाफ सैनिक हस्तक्षेप उनके लिए संभव नहीं है। वे कोरिया की जंग के पैगाम को भूले नहीं होंगे। तब तो चीन के पास परमाणु अस्त्र भी नहीं थे। यह चीन भी जानता होगा कि जो अमेरिका अपेक्षाकृत कमजोर रूस को क्रीमिया और यूक्रेन में नहीं रोक पाया, वह उससे सारी सीमांएं टूट जाने के बाद ही पंगा लेगा।
चीन से युद्ध या उसमें अमेरिकी हस्तक्षेप भारत भी नहीं चाहता। लेकिन कट्टरपंथी, धर्मांध पाकिस्तान से युद्ध छिड़ जाए और चीन उसमें सीधा दखल भले न करे, फिर भी वह पाकिस्तान को हथियार, गोला-बारूद और कल-पुर्जों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित कर भारत के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है। चीन और रूस भारत के प्रतिकूल, कश्मीर मसले का समाधान थोपना चाहें, तो क्या होगा? उस स्थिति में अमेरिकी भूमिका ऐतिहासिक साबित होगी। बुनियादी राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखने की नीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में शिरकत शतरंज के खेल की तरह होती है, इसलिए उसमें विश्वास-अविश्वास की भूमिका निर्णायक नहीं हुआ करती। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय स्थिति में विभिन्न क्षेत्रों में अमेरिका से गहन सहकार का कोई विकल्प नहीं है। चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को बेलगाम होने से रोकने का काम सिर्फ अमेरिका कर सकता है। यह अमेरिकी हितों का भी तकाजा है। फिर भी वह भारत से प्रतिफल चाहेगा।
किसी न किसी रूप में प्रतिफल तो सोवियत संघ भी हासिल करता था। भारत के हितों की रक्षा में मास्को का निर्णायक योगदान होने के बावजूद इंदिरा गांधी ने ब्रेझनेव के 'सामूहिक एशियाई सुरक्षा सिद्धांत' को मानने से इन्कार कर दिया था और अफगानिस्तान में सोवियत फौजी दखल का समर्थन भी नहीं किया था। तब अमेरिका और चीन में गठजोड़ था और सोवियत संघ अकेला था। आज चीन और रूस एक पाले में हैं और अमेरिका एक तरफ। शह और मात के अंतरराष्ट्रीय गणित के फॉर्मूले की परिधि में ही भारत अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए अमेरिका, रूस और चीन से रिश्ते तय कर सकता है।