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इस चुनाव में कितने अहम होंगे प्रवासी मजदूर, बता रही हैं नीरजा चौधरी

नीरजा चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार Published by: नीरजा चौधरी Updated Tue, 27 Oct 2020 02:35 AM IST
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bihar election- lockdown - फोटो : अमर उजाला

बिहार के विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव 'वाइल्ड कार्ड' के रूप में उभरे हैं। यह एक ऐसी घटना है, जिसका असर आगामी तीन नवंबर को मध्य प्रदेश में विधानसभा की 28 सीटों पर होने वाले उपचुनाव पर भी पड़ सकता है। बिहार में बहुत लोग तेजस्वी यादव को नीतीश कुमार के विकल्प के रूप में तो देख ही रहे हैं, लेकिन तेजस्वी की रैली में उमड़ रही भीड़ ज्यादा बड़ी दिलचस्पी का कारण है। दशकों से चुनावों की कवरेज करते हुए भाड़े की भीड़ और जीवंत रैली तथा असंतोष व गुस्से के बीच का फर्क भांप लेने का अनुभव तो हासिल हो ही जाता है। यह बात सबको पता है कि पिछले कुछ समय से नीतीश सरकार के प्रति असंतोष बढ़ा है। यह असंतोष बहुत आश्चर्यजनक भी नहीं है, क्योंकि नीतीश पिछले 15 साल से बिहार की सत्ता में हैं। लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों के बिहार लौटने या कुछ समय पहले आई बाढ़ के दौरान नीतीश के ठंडे रवैये ने जनता की नाराजगी और बढ़ाई ही।



चुनाव अभियान की शुरुआत से पहले यह माना जा रहा था कि नीतीश कुमार यह चुनाव आसानी से निकाल लेंगे, क्योंकि गठबंधन मजबूत है तथा नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बनी हुई है, जिस कारण नीतीश की लोकप्रियता में आई कमी की भरपाई हो जाएगी। उम्मीद की वजह यह भी थी कि महिला मतदाताएं अब भी नीतीश के समर्थन में हैं तथा विपक्षी महागठबंधन बिखरा हुआ है। फिर तीस साल के तेजस्वी लालू यादव तो नहीं ही हैं। यह संभव है कि तेजस्वी की रैलियों में उमड़ती भीड़ का कारण तेजस्वी की लोकप्रियता कम और आर्थिक बदहाली से क्षुब्ध और असहाय लोगों द्वारा विकल्प की तलाश हो। तेजस्वी ने चुनाव में बेरोजगारी का सटीक मुद्दा उठाया है, और हालांकि उनके सत्ता में आने पर 10 लाख लोगों को रोजगार देने के जवाब में भाजपा ने 19 लाख नौकरियां देने का वादा किया है, पर इस मुद्दे पर तेजस्वी ने बाजी मार ली है।


मध्य प्रदेश में होने जा रहा उपचुनाव भी बिहार की ही तरह महत्वपूर्ण है, पर दोनों में फर्क यह है कि जहां पटना में सरकार बदल सकती है, वहीं भोपाल में ऐसा कुछ नहीं होने वाला। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ इस उपचुनाव से चाहे जो भी उम्मीदें लगाए हों, पर अंकगणित कांग्रेस के खिलाफ है। दूसरी ओर, अपने दम पर सरकार चलाने के लिए भाजपा को इन 28 में से मात्र नौ सीटों पर जीत चाहिए। अभी 230 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के 107 विधायक हैं और वह चार निर्दलीयों, बसपा के दो विधायकों और सपा के एक निलंबित विधायकों की मदद से सत्ता में है। दूसरी ओर, विधानसभा में कांग्रेस की 88 सीटें हैं और सत्ता में लौटने के लिए उसे सभी 28 सीटों पर जीत हासिल करनी होगी। हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भरोसा जताया है कि अगर कांग्रेस इनमें से 20-21 सीटें भी जीतती हैं, तो वह 'उन दूसरों' की मदद से सरकार बना लेंगे, जो हमेशा पाला बदलते रहते हैं!


यह उपचुनाव भाजपा सरकार के अस्तित्व से भी ज्यादा कुछ नेताओं की प्रतिष्ठा और भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इस उपचुनाव से सबसे ज्यादा ज्योतिरादित्य सिंधिया की प्रतिष्ठा जुड़ी है, जो इस साल की शुरुआत में अपने 22 विधायकों के साथ कांग्रेस से निकल आए थे। इससे कमलनाथ की सरकार गिर गई, और यह उपचुनाव उसी का नतीजा है। सिंधिया के साथ निकले नेताओं में 16 ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के थे, जिसे सिंधिया के प्रभाव वाला इलाका माना जाता है। सिंधिया को खुश करने के लिए इनमें से कई विधायकों को मंत्री बनाया गया। इस उपचुनाव में सिंधिया जितनी सीटें जितवा पाएंगे, भाजपा में उनकी भूमिका उसी के अनुरूप तय होगी। स्पष्टता से अपनी बात रखने वाले और ठोस जनाधार के यह युवा क्या भाजपा के नए सितारे के तौर पर उभरेंगे, इस क्षेत्र में वादे के मुताबिक भाजपा को अधिक सीटें दिलवा पाएंगे और असम के हेमंत विस्व शर्मा की तरह भविष्य में अपने लिए बड़ी भूमिका हासिल करेंगे या भगवा पार्टी में आए और अनेक नेताओं की तरह हाशिये पर पड़े रहेंगे?


इस उपचुनाव में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए भी दांव उतना ही बड़ा है, क्योंकि पार्टी में सिंधिया के आने के बाद उन्होंने वह सब कुछ दिया है, जिसकी मांग सिंधिया ने की। शिवराज के लिए सबसे अच्छी स्थिति यही होगी कि भाजपा उपचुनाव में इतनी सीटें जीते, जिससे सरकार चलाने के लिए छोटी पार्टियों पर निर्भर न रहना पड़े। लेकिन अधिक सीटें जीतना उनके हित में नहीं होगा, क्योंकि उससे सिंधिया की स्थिति मजबूत होगी।


यह उपचुनाव कमलनाथ के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है, और दिग्विजय सिंह के लिए भी, जिनके पुत्र जयवर्धन सिंह उभरते सितारे हैं और इस उपचुनाव में कमलनाथ के साथ तालमेल बनाकर चल रहे हैं। पहली बार दिग्विजय सिंह उतने व्यस्त नहीं दिख रहे, और न ही अतीत की तरह पार्टी नेता उनके पास विचार-विमर्श के लिए पहुंच रहे हैं। चूंकि ग्वालियर-चंबल क्षेत्र सिंधिया के प्रभाव वाला इलाका है और कांग्रेस का इन 28 में से 27 सीटों पर कब्जा था, लिहाजा भाजपा-सिंधिया गठजोड़ को ये सभी 28 सीटें जीतनी चाहिए। लेकिन इस क्षेत्र में सिंधिया को उन पुराने भाजपा नेताओं की नाराजगी का भी सामना करना पड़ रहा है, जिन्हें उन्हीं के गढ़ में टिकट न देकर उन बाहरी लोगों को दिया गया, जो सिंधिया के साथ भाजपा में आए हैं। क्या वे नाराज भाजपा नेता चुपचाप बैठकर सिंधिया के लोगों को चुनाव जीतने देंगे?


बिहार का चुनाव और मध्य प्रदेश का उपचुनाव सिर्फ इसलिए दिलचस्पी का कारण नहीं हैं कि यह कोविड-19 के बीच पहली बार हो रहा है, बल्कि ये मार्च-अप्रैल में प्रवासी मजदूरों के रिवर्स माइग्रेशन (शहरों से गांव लौटने) के बाद होने वाला भी पहला चुनाव है। उसके बाद से प्रवासी मजूदरों के बारे में कम ही जाना गया है। बिहार लौटे प्रवासी मजदूरों की संख्या बहुत अधिक थी, तो मध्य प्रदेश में भी इनकी संख्या कम नहीं थी। इस चुनाव में इनके दर्द और चिंता का पता चलेगा और इसका भी उनके मन में क्या है। 
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इस चुनाव से जुड़ा मुख्य सवाल अलबत्ता यह है कि आर्थिक बदहाली और महामारी के कारण अगर बिहार के मतदाताओं में आक्रोश है, तो मध्य प्रदेश मतदाताओं के क्षोभ से बचा नहीं रह सकता। वहां भी बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों ने रोजगार गंवाया है।  

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