पिछले एक वर्ष में पंजाब के संगरूर जिले के खनौरी-कलां गांव में सतलुज से निकलने वाली भाखड़ा मुख्य नहर का जलद्वार विभिन्न अखबारों में छपी खबरों के कारण सुर्खियों में रहा है। सतलुज में कूदकर आत्महत्या करने वाले किसानों के शोक-संतप्त परिजन पटियाला और रोपड़ जिलों से वहां उनकी लाश ढूंढ़ने आते हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 1995 से 2015 के बीच पंजाब में 2,632 से ज्यादा किसानों की आत्महत्या की खबर है, जिनमें से अकेले मनसा जिले में 1,334 किसानों ने आत्महत्या की, जबकि लुधियाना में 638 किसानों ने आत्महत्या की। अगर इसमें कृषि मजदूरों की आत्महत्या को भी जोड़ दिया जाए, तो यह आंकड़ा बढ़कर 4,687 हो जाता है। हरित क्रांति के लिए मशहूर इस धरती पर किसान आत्महत्या का यह आंकड़ा चौंकाने वाला है।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, पंजाबी विश्वविद्यालय और पटियाला विश्वविद्यालय के मुताबिक, वर्ष 2000 से 2010 के बीच किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा अनुमानित रूप से सात हजार से ज्यादा है, जिनमें से एक तिहाई लोगों ने नहर में डूबकर जान दे दी। यह प्रवृत्ति 2016 में भी जारी रही। इसकी कई वजहें हैं-मक्खियों द्वारा कपास की खेती को नुकसान, बासमती के बाजार भाव में गिरावट (पांच हजार रुपये प्रति क्विंटल से घटकर 1,450 रुपये प्रति क्विंटल पर आना) और स्थानीय महाजनों द्वारा ब्याज दर को बढ़ाकर 20 फीसदी कर देना। नतीजतन किसान दरिद्र हो गए।
किसानों की आत्महत्या कोई नई बात नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक, वर्ष 2015 में 2,195 सीमांत किसानों ने आत्महत्या की, जबकि 3,618 छोटे किसान ऐसा अतिवादी कदम उठाने के लिए मजबूर हुए। हैरानी की बात है कि महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में सीमांत किसानों की तुलना में छोटे किसानों ने ज्यादा आत्महत्या की। यानी कृषि संकट की सर्वाधिक मार छोटे किसानों पर पड़ती है, और ऐसा पारंपरिक रूप से सूखे से त्रस्त राज्यों में ही नहीं होता।
पंजाब जैसे राज्यों में आम तौर पर गेहूं और धान की फसलें ही बोई जाती हैं। उर्वरक, कीटनाशक, बीज, ट्रैक्टर, सबमर्सिबल पंप आदि के मूल्यों में बढ़ोतरी के कारण खेती आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं रही है। अरहर, धान, गन्ना आदि के बीजों में भारी बढ़ोतरी हुई है। पहले किसान अपने बेटों को पारिवारिक विरासत के रूप में बीज सौंपते थे, लेकिन अब वह रवायत नहीं बची है। इसी तरह उर्वरकों के मूल्यों, कृषि मजदूरों की मजदूरी, फसल रक्षक रसायन, ट्रैक्टर भाड़ा आदि में भी वृद्धि हुई है। इन सबके चलते कृषि लागत में कई गुना की बढ़ोतरी हो गई है, जैसे वर्ष 2004-05 में धान की खेती पर प्रति हेक्टेयर 20,607 रुपये की लागत आती थी, जो 2012-13 में बढ़कर 47,644.5 रुपये हो गई। इसी तरह गेहूं की कृषि लागत 12,850 रुपये प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 38,578 रुपये प्रति हेक्टेयर हो गई।
पारंपरिक रूप से स्थानीय साहूकारों पर ज्यादा ब्याज वसूलने का दोष मढ़ा जाता है, लेकिन एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2015 में आत्महत्या करने वाले तीन हजार किसानों में से 2,474 ने स्थानीय बैंकों से कर्ज लिया था, जबकि साहूकारों से मात्र 9.8 फीसदी किसानों ने कर्ज लिया था।
इस समस्या को सुलझाने के लिए एक समावेशी दृष्टिकोण की जरूरत है। हमारी नीति ऐसी होनी चाहिए, जो एकीकृत कीट प्रबंधन को बढ़ावा दे। वियतनाम में मेकांग डेल्टा के 20 लाख से ज्यादा धान उत्पादक किसानों ने शुरू में स्प्रे नहीं करने की नीति को अपनाया, यानी धान रोपने के शुरुआती 40 दिनों में कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया। इससे हिंसक झींगूर, जो आम तौर पर धान के कीड़ों का शिकार करते हैं, बचे रहे और फसल में वृद्धि के साथ कीटनाशकों के प्रयोग में 50 फीसदी की कटौती हुई।
स्थानीय उर्वरक उद्योग को समर्थन की भी जरूरत है-समय पर सब्सिडी देने से कार्यशील पूंजी की जरूरतों में सुधार होगा, जो उन्हें बाहरी कर्ज के बजाय आंतरिक स्रोतों से लागत प्रबंधन करने के लिए प्रोत्साहित करेगा। देरी से सब्सिडी भुगतान की वजह से उर्वरक कंपनियों को सालाना 3,500 करोड़ रुपये ब्याज देने पड़ते हैं। राज्य बीज नीति को अनुबंध (कॉन्टेक्ट) खेती को बढ़ावा देना चाहिए। इसके साथ कीट प्रबंधन के लिए नए जीनोटाइप और फलों की बीमारियों के लक्षणों की पहचान के अलावा प्रतिकूल मौसम से निपटने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। गुणवत्तापूर्ण कृषि तकनीक से बीजों के उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है।
हमारी कृषि उपकरण नीति को फिर से तैयार करने की भी जरूरत है। खेती के जिन उपकरणों और औजारों का अभी आयात किया जाता है, उनके निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। सरकार को सालाना ग्राम स्तर पर भारी कर्ज में फंसे किसानों की सूची तैयार करनी चाहिए, ताकि दरिद्रता में फंसे और संभावित आत्महत्या करने वाले किसानों की पहचान की जा सके। ऐसे किसानों को नाबार्ड स्थानीय प्रशासन के साथ समय पर ऋण उपलब्ध कराकर और बीमा दावे का निपटारा करके बेहतर परामर्श दे सकता है।
कृषि संकट के कारण किसानों का अपने परिवार को बचाना और बच्चों को शिक्षित करना मुश्किल हो गया है। उत्तर प्रदेश के आत्महत्या ग्रस्त गांवों का दौरा मेरे लिए एक दुखद अनुभव था। यह कृषि संकट इतना ज्यादा है कि परेशान सीमांत किसानों के प्रति परिवार को मात्र पचास हजार रुपये देने में मेरे साढ़े सात साल का कुल संसदीय वेतन खर्च हो गया, लेकिन उसका बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा। क्राउड फंडिग के जरिये तीन हजार से ज्यादा किसानों के दुख को कम करने की हमने कोशिश की, लेकिन उनके जीवन में बदलाव केवल व्यवस्थागत परिवर्तन से ही संभव है। सीमांत किसानों को सिर्फ उम्मीद ही नहीं, सहयोग की भी जरूरत है।