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जली रोटी का गुस्सा गलत जगह पर

Mon, 16 Jan 2017 08:11 PM IST
अरुणेन्द्र नाथ वर्मा
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अरुणेन्द्र नाथ वर्मा
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पिछले  दिनों कुछ असंतुष्ट सैन्य कर्मचारियों ने सोशल मीडिया पर अपनी सेवा संबंधी असुविधाएं और शिकायतें उजागर कीं, तो मीडिया ने उन्हें खूब उछाला। इसके दो परस्पर विपरीत कारण थे। एक तरफ अधिकांश टिप्पणीकारों की सेना के जवानों के साथ हार्दिक सहानुभूति थी, तो दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की छिछली मनोवृत्ति, जो सत्ता पक्ष को नीचा दिखाना अपना कर्तव्य समझती है, भले इसका खामियाजा सेना के मनोबल को भरना पड़े।
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सेना की देशभक्ति  का आभार मानने वाला पक्ष चाहता है कि सैनिकों को खान-पान की उचित सुविधाएं मिलें और अधिकारी वर्ग उन्हें अपने निजी सेवक के रूप में इस्तेमाल कर उनके स्वाभिमान पर चोट न पहुंचाएं। दुर्भाग्यवश इन दोनों बिंदुओं को ठीक से समझा नहीं गया। एक असंतुष्ट सैनिक की जले पराठे मिलने की शिकायत को मीडिया ने निहायत संजीदगी से यह सोचकर उजागर किया कि इससे सैनिकों को मिलने वाले भोजन और अन्य सुविधाओं में सुधार होगा। अफसरों के सहायकों की दशा को बहस का मुद्दा बनाकर सोचा गया कि यह सैनिकों के मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ आवाज है, अतः  सैनिकों  के हित में ही है।

पर यह सोच व्यावहारिक कसौटियों पर खरी नहीं उतरती। एक इन्फैन्ट्री बटालियन को हर एक सौ तीस सैनिकों पर एक रसोइया मिलता है। लगभग नौ सौ सैनिकों वाली बटालियन में करीब अठारह रसोइये होते हैं। यदि दस प्रतिशत रसोइये और सैनिक छुट्टी पर हों, तो आठ सौ सैनिकों पर सोलह रसोइये। एक जवान यदि चार रोटी खाता है, तो एक समय के भोजन की तीन हजार दो सौ रोटियां बनाने के लिए हर रसोइया दो सौ रोटियां बनाता है। दाल, चावल, सब्जी अलग। ऐसे में किसी जली रोटी का वीडियो खींचने में किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई से जले-भुने सैनिक का क्या जाएगा? एक कंपनी में से बीस-पच्चीस सैनिकों की टुकड़ियां एक पोस्ट पर नियुक्त होती है। बर्फबारी और भयंकर शीत से लड़ते हुए इन बीस सैनिकों वाली हर पोस्ट पर क्या रसोइया नियुक्त हो सकता है या फिर उन्हें भयंकर शीत में नमकपारे और नूडल्स खाकर जीवित रहने को कहा जाए? इस स्थिति में राशन पहुंच गया, तो गर्म खाना उस पोस्ट के जवान ही मिलकर बनाते हैं। ऐसे में किसी जवान को शिकायत हो कि रोटी जली या अधपकी रह गई, तो फौजी नौकरी उसके लिए नहीं बनी। मोर्चे पर डटी सेना के संचालन में एक ही सिद्धांत काम करता है-करो या मरो। कारगिल में टाइगर हिल पर धावा करने का आदेश देने वाला अफसर  जानता है कि उसके सैनिकों में से कई लौटकर नहीं आएंगे। फिर वह धावा करने वाली टुकड़ी के लिए जवान कैसे चुने, मतदान या लॉटरी से? आंख मूंदकर आदेश की तामील करने की संस्कृति के बिना सेना अपना काम कर ही नहीं सकती। पर सोशल मीडिया पर शायद एक दिन कोई सैनिक यह सवाल भी उठाएगा  कि औरों के मौजूद रहते मुझी को क्यों भेजा गया।
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किसी पीस स्टेशन पर एक बटालियन के आठ-नौ सौ सैनिकों को व्यस्त रखने के लिए उन्हें घास की सफाई और पेड़ों के तनों को रंगने का कार्य दिया जाता है। ऐसे हर काम को लेकर कोई सैनिक पूछे कि क्या मैं घास खोदने सेना में आया था, तो मीडिया और नागरिक समाज का इसे अन्याय समझना हास्यास्पद होगा। वाजिब शिकायत सही ढंग से ऊपर तक पहुंचाने के लिए सेना में स्पष्ट और सर्वज्ञात तरीके हैं। यह जिम्मेदारी  उन्हीं पर क्यों न छोड़ दी जाए!
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-लेखक  सेवानिवृत्त विंग कमांडर हैं।
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