हिम तेंदुआ, बिल्ली प्रजाति की एक शिकारी जंतु है। पर्वतों की चोटी पर पाई जाने वाली इस प्रजाति के संरक्षण को संस्था ने प्राथमिकता दी है, जिसे संस्था समग्रता में देखती है। डॉ. नामग्याल बताते हैं कि हिम तेंदुआ एक मनोहारी प्रजाति है, पर इसका पशुपालक किसानों के साथ संघर्ष होता रहा है। हिम तेंदुआ और मनुष्य के सहअस्तित्व को प्रोत्साहित करना हमारा प्रमुख उद्देश्य है। अगर हिम तेंदुए नहीं रहेंगे, तो ज्यादा वन्य-जीव बढ़ जाएंगे, अगर ज्यादा वन्य जीव बढ़ जाएंगे, तो घास-फूस की कमी हो जाएगी, और पालतू जानवरों को चारा नहीं मिल पाएगा, मिट्टी का क्षरण हो जाएगा और गांव में बाढ़ का खतरा बढ़ जाएगा। पूरा इलाका रेगिस्तान बन जाएगा, जिससे खेती नहीं हो पाएगी, इससे लोगों की खाद्य सुरक्षा में कमी आएगी। इसलिए हिम तेंदुए का रहना सबके लिए और उसके खुद के लिए भी जरूरी है।
डॉ. नामग्याल लद्दाख के होमस्टे के बारे में भी बताते हैं। होमस्टे यानी घर के अतिरिक्त कमरों को सैलानियों को किराये पर देना। इससे स्थानीय लोगों को अतिरिक्त आमदनी होती है और पर्यटकों को स्थानीय संस्कृति से सीखने व जुड़ने का मौका मिलता है। इससे हिम तेंदुए व वन्य जीवों से जो आर्थिक नुकसान होता है, उसकी कुछ हद तक क्षतिपूर्ति भी हो जाती है। फिलहाल, संस्था पूरे लद्दाख में करीब 40 गांवों में होमस्टे कार्यक्रम चला रही है। पिछले साल सितंबर में मुझे भी ससपोटसे गांव में एक होमस्टे में ठहरने का मौका मिला था, जहां लोगों का आत्मीय स्नेह मिला था और वहां मैंने लद्दाखी भोजन का लुत्फ उठाया था। लद्दाखी रोटी खाम्बीर और नमकीन चाय पी थी। मैं रिगजेन आंगमो नामक महिला के घर ठहरा था, जिनके पति का निधन कुछ साल पहले हो गया था। उनकी अधिकांश आजीविका होमस्टे से ही चलती है।
होमस्टे से मिलने वाली दस प्रतिशत राशि गांव के विकास के लिए ग्रामकोष में जमा होती है, जबकि शेष राशि वह खुद रखती हैं। पिछले कुछ वर्षों में लद्दाख में पर्यटन काफी बढ़ा है। और यहां की अधिकांश आबादी पर्यटन आधारित आजीविका पर आश्रित है। गर्मी में ये लोग पर्यटन की गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं। इसलिए जरूरी है कि स्थानीय युवा और वयस्क यहां की समृद्ध जैव विविधता से अवगत हों और इसमें पर्यटकों का मार्गदर्शन कर सकें। संस्था की कार्यकर्ता सेरिंग आंगमो बतलाती हैं कि शुरुआत में एसएलसी-आईटी और कल्पवृक्ष ने मिलकर संयुक्त रूप से कुछ स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम चलाया था। एसएलसी-आईटी ने इस काम को जारी रखा है। अब इस कार्यक्रम का विस्तार काफी सारे स्कूलों में हो गया है। कुल मिलाकर, इस पूरी पहल के बारे में कुछ बातें कही जा सकती हैं। इससे हिम तेंदुआ सहित अन्य वन्य जीवों तथा प्रकृति के संरक्षण के साथ समुदायों की आजीविका की भी रक्षा हो रही है। कहा जा सकता है कि वन्य जीवों की सुरक्षा व संरक्षण स्थानीय समुदायों की भागीदारी से किया जा सकता है, जो लद्दाख की इस पहल ने कर दिखाया है।