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कैसे तय होगी परमाणु जवाबदेही

Sun, 28 Sep 2014 04:20 PM IST
सिद्धार्थ वरदराजन
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भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु सहयोग की एक बड़ी बाधा भारत का परमाणु उत्तरदायित्व कानून है, जिसके तहत आपूर्तिकर्ता कंपनियों को परमाणु बिजलीघरों में किसी तरह की दुर्घटना होने पर जान-माल के नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराने का प्रावधान है। नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान इस मुद्दे पर भी चर्चा होगी। यह एक रिवाज-सा बन गया है कि जब भी भारत और अमेरिका के बीच कोई बड़ी कूटनीतिक वार्ता तय होती है, उसके ठीक पहले परमाणु उद्योग समूह के पक्ष में गोलबंद होने वाले एवं बड़े रिएक्टर आपूर्तिकर्ता शिकायत करने लगते हैं कि किस तरह भारतीय परमाणु उत्तरदायित्व कानून उन्हें भारत में व्यवसाय करने से रोकता है।
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अब जब नरेंद्र मोदी वाशिंगटन में बराक ओबामा से मिलने के लिए तैयार हैं, तब भारतीय परमाणु बिजलीघरों को उपकरण की आपूर्ति करने वाले घरेलू ठेकेदारों ने भी राग अलापना शुरू कर दिया है कि सरकार को इस कानून पर पुनर्विचार करना चाहिए।

भारत का परमाणु ऊर्जा विभाग लंबे समय से परमाणु दुर्घटना की स्थिति में जवाबदेही के सवाल को हल करने के लिए एक स्वतंत्र कानून की जरूरत महसूस करता रहा है। सिविल लाइबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज ऐक्ट, 2010 भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते का एक विशिष्ट अंग है, जिसमें भारत ने अमेरिका से वायदा किया था कि वह विएना घोषणापत्र के अनुरूप कन्वेंशन ऑन सप्लीमेंटरी कम्पेनसेशन (सीएसी) यानी परमाणु नुकसान के लिए पूरक मुआवजे का पालन करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। सीएससी का पालन करने का मतलब एक घरेलू जवाबदेही कानून पारित करना भी था।
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अमेरिका और परमाणु उद्योग से जुड़े ज्यादातर समीक्षकों का मानना है कि भारत का परमाणु जवाबदेही कानून इससे संबंधित अंतराष्ट्रीय व्यवस्था के अनुरूप नहीं है, क्योंकि इसमें दो ऐसे प्रावधान शामिल हैं, जिनका उल्लेख न तो सीएसी में है, और न ही दूसरे देशों के परमाणु उत्तरदायित्व कानूनों में। दरअसल भारतीय कानून का प्रावधान 17 (बी) संयंत्र के ऑपरेटर को यह अधिकार देता है कि वह उपलब्ध कराए गए उपकरणों में किसी भी तरह की त्रुटि की वजह से होने वाली दुघर्टना की सूरत में आपूर्तिकर्ता को कठघरे में खड़ा कर सकता है। इसी तरह, प्रावधान 46 के मुताबिक इस कानून के सभी प्रावधान दूसरे सभी कानूनों के साथ अस्तित्व में रहेंगे, और आपूर्तिकर्ता को किसी भी कानून के तहत कोई रियायत नहीं मिलेगी।

हालांकि भारत सरकार ने अनुषंगी नियमों के जरिये इस कानून को नरम बनाने की कोशिश की है, मगर इन नियमों को भी कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। समीक्षकों का दावा है कि दोनों प्रावधानों की वजह से आपूर्तिकर्ताओं के लिए व्यापार करना तकरीबन नामुमकिन बन जाएगा।

वैसे अगर इन तर्कों का गंभीर विश्लेषण किया जाए, तो इनकी सच्चाई सामने आने लगती है। और सच यह है कि भारतीय कानून सीएससी के बिल्कुल अनुरूप है। परमाणु ऊर्जा विभाग के कानूनी सलाहकार डॉ जितेंद्र कुमार के मुताबिक सीएससी का अनुच्छेद 12(2) साफ कहता है कि समझौते का कोई भी प्रावधान इसमें शामिल किसी पक्षकार को समझौते की सीमा से बाहर जाते हुए कोई नियम बनाने से नहीं रोकेगा, बशर्ते इससे दूसरे पक्षकारों पर कोई बाध्यता नहीं डाली जा रही हो। फिर 2010 से पहले आपूर्ति किए गए उपकरणों के संदर्भ में भारतीय उपकरण आपूर्तिकर्ताओं की जवाबदेही पर कोई सीमा निर्धारित नहीं की गई थी। इसके बावजूद अगर ये आपूर्तिकर्ता परमाणु परियोजनाओं में शामिल होने के इच्छुक थे, तो आज उन्हें क्या दिक्कत हो रही है?

मामला चाहे कुछ भी हो, परमाणु दुर्घटना की स्थिति में किसी आपूर्तिकर्ता पर पड़ने वाले आर्थिक जोखिम के आकलन के लिए परमाणु ऊर्जा विभाग ने अपनी तरफ से एक संभाव्य सुरक्षा जांच व्यवस्था स्थापित की है। और इसी आधार पर जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ने व्यापारियों के फायदे को ध्यान में रखते हुए बीमे की एक बेहतर योजना भी बनाई है।

दरअसल भारतीय कानून में आपूर्तिकर्ता की जवाबदेही तय करने के पीछे तर्क भी है। चाहे सीएससी हो या जवाबदेही से जुड़े दूसरे कानून, ये उस वक्त के हैं, जब परमाणु उद्योग पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था, और आपूर्तिकर्ताओं को सुरक्षा देना जरूरी भी था। मगर आज हालात बदल गए हैं। फुकुशिमा दुर्घटना इसका प्रमाण है कि रिएक्टर के संरचनात्मक दोष वर्षों बाद भी क्षति पहुंचा सकते हैं। यह देखते हुए कहा जा सकता है कि जवाबदेही का बोझ बांटने से आपूर्तिकर्ताओं और संचालकों के बीच न सिर्फ स्वस्थ रिश्ते कायम होंगे, साथ ही, संयंत्र के निर्माण से लेकर अंतिम चरण तक अधिकतम सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।
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