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धूप आने दो: गजेंद्र मोक्ष पाठ की रचना कैसे हुई, संस्कृति के पन्नों से होता है खुलासा

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 04 Feb 2024 07:20 AM IST

सार

गजेंद्र ने पैर छुड़ाने का भरपूर प्रयास किया, परंतु उसे सफलता नहीं मिली। गजेंद्र छटपटाता रहा। उसके साथी गज असहाय खड़े देखते रहे। दोनों के बीच संघर्ष चलता रहा। गजेंद्र स्वयं को पानी से बाहर खींचता और ग्राह उसे भीतर खींचता। सरोवर का जल मैला हो गया।
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vishnu bhagwan - फोटो : istock


उसने अपने इष्ट भगवान विष्णु की शरण में जाने का निश्चय किया। ग्राह द्वारा दी जा रही पीड़ा पर ध्यान न देकर गजेंद्र सोचने लगा - “काल बड़ा बली है। यह सांप के समान बड़े प्रचंड वेग से सबको निगल जाने के लिए दौड़ता रहता है । इससे भयभीत होकर जो कोई भगवान की शरण चला जाता है, उसे प्रभु अवश्य बचा लेते हैं। वही प्रभु सबके आश्रय हैं। मैं उन्हीं की शरण ग्रहण करता हूं।”

गजेंद्र, एकाग्रचित्त से पूर्वजन्म में सीखे स्तोत्र के जप द्वारा भगवान की स्तुति करने लगा। स्तुति सुनकर भगवान विष्णु वहां प्रकट हो गए। गजेंद्र ने गरुड़ पर आरूढ़ भगवान विष्णु को देखा तो कमल का एक सुंदर पुष्प अपनी सूंड़ में लेकर ऊपर उठाया और कष्टपूर्वक कहा - “नारायण! जगद्गुरो! भगवान! आपको नमस्कार है।”  गजेंद्र को इस तरह पीड़ित देखकर भगवान विष्णु, गरुड़ की पीठ से नीचे उतरे और गजेंद्र के साथ ग्राह को भी सरोवर से बाहर खींच लाए। फिर उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से ग्राह का मुंह फाड़कर गजेंद्र को मुक्त कर दिया। देवल के शाप से ग्रस्त हूहू गंधर्व भी ग्राह योनि से मुक्त हो गया। उसने भगवान विष्णु की परिक्रमा की और उनके चरणों में प्रणाम करके अपने लोक को लौट गया। 

भगवान विष्णु ने गजेंद्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया। उसकी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने कहा- “हे गजेंद्र! जो लोग ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तुम्हारी की हुई स्तुति से मेरा स्तवन करेंगे, उन्हें मैं मृत्यु के समय निर्मल बुद्धि का दान करूंगा।”

गजेंद्र द्वारा की गई यही स्तुति ‘गजेंद्र मोक्ष पाठ’ कहलाती है। श्रीमद्भागवद पुराण के आठवें स्कंध में गजेंद्र मोक्ष की कथा का विस्तार से उल्लेख मिलता है। इस स्तोत्र में 28 श्लोक हैं। यह कथा शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सुनाई है।



 
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