सरकारी बैंकों को मिलने वाली 2.11 लाख रुपये अतिरिक्त पूंजी के बावजूद उनके अच्छे दिन नहीं आने की आशंका, मंद अर्थव्यवस्था की तलवार अभी लटके रहने और राजनीति के गर्माने का इशारा कर रही है। मंदी खिंचने की आशंका की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी पुष्टि कर दी। वित्त मंत्री भी संसद में मंदी को कबूल कर चुके। भारतीय रिजर्व बैंक की ताजा वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में भी ऐसी ही चेतावनी है।
कर्ज की रकम डूबने का घुन अब निजी बैंकों को भी लग गया। सरकारी बैंकों की अटकी रकम में पिछले साल 17 फीसदी बढ़ोतरी हुई और निजी बैंकों के डूबत खाते में बीते सितंबर तक 41 फीसदी इजाफा हो चुका। इसकी मुख्य वजह खनन, खाद्य प्रसंस्करण, इंजीनियरिंग, निर्माण और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों के कारोबार में आया लंबा ठहराव है। सितंबर तक डूबत खाते की राशि सरकारी बैंकों द्वारा दिए कुल कर्ज की 10.2 फीसदी पहुंच चुकी और मार्च तक बढ़कर 10.8 फीसदी तथा सितंबर में 11.1 फीसदी हो जाने का अंदेशा है। इससे साफ है कि कारखानों द्वारा भुगतान और उनमें निवेश अभी तक ठिठका हुआ है।
इसकी पुष्टि, मोटे कर्जदारों से वसूली अटकने की दर मार्च में 14.6 फीसदी से बढ़कर सितंबर में 15.5 फीसदी पहुंच गई है। सरकारी बैंकों की कुल डूबत राशि जून 2017 में 8,29,338 करोड़ रुपये के स्तर तक जा पहुंची। इसी तरह निजी बैंकों की डूबत राशि सितंबर 2017 में 100,481 करोड़ रुपये हो चुकी। इससे अगले साल सितंबर तक पूंजी पर्याप्तता अनुपात में कमी से छह बैंक फेल हो सकते हैं।
कायदे से सरकारी बैंकों को मार्च 2017 में डूबी रकम से पिंड छुड़ा लेना था, मगर उनकी नाकामी ने सरकार को 2.11 लाख करोड़ रुपये की पूंजी उन्हें देने को मजबूर किया। यह नौबत निवेश की दर पिछले 50 साल में सबसे नीचे गिरने से भी आई। अब आईएमएफ नौ सरकारी बैंकों के निजीकरण की सलाह देकर सरकार को पसोपेश में डाल रहा है। अगले डेढ़ साल में मोदी सरकार को आठ विधानसभा चुनाव और फिर आम चुनाव लड़ना है और निजीकरण करके वह किस—किस को सफाई देती फिरेगी।
आईएमएफ ने कर्ज वसूलने में नाकाम छोटे सरकारी बैंकों को पूंजी का सहारा देने अथवा किसी बड़े बैंक में मिलाने की कोशिश को खारिज किया है। चालू वित्त वर्ष में बैंक कर्जों की मांग सिर्फ रिटेल और कृषि क्षेत्र से बढ़ी है। नोटबंदी और फिर जीएसटी की मार से पस्त सूक्ष्म, लघु और मझोली इकाइयों (एमएसएमई) को बैंकों से अधिक कर्ज दिलाने पर सरकार जोर तो दे रही है, मगर मंदी आड़े आ रही है। इसमें मंदी का अर्थ है बेरोजगारी बढ़ना, क्योंकि सबसे अधिक रोजगार यही सेक्टर देता है।
सरकारी बैंकों की दुर्दशा को स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक और मूडीज भी सबसे खराब दौर करार दे चुके। इससे निपटने को रिजर्व बैंक ने व्यावसायिक बैंकों में नौ सूत्री सुधार फॉर्मूला सुझाया है। इसमें ग्राहकों की मांग और जरूरत के मुताबिक वित्तीय सेवा उत्पाद तैयार करना, कर्ज देने की रफ्तार हर कीमत पर बढ़ाना, अपना चिट्ठा, दिवालिया कानून, इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड के अनुसार दुरुस्त करना, कॉरपोरेट गवर्नेस के जरिये बैंक और देश का वित्तीय ढांचा मजबूत करना भी शामिल है। नई प्रौद्योगिकी से नौकरियां और घटेंगी। यों भी भारत के बड़े सरकारी बैंक 2018 में कोई नई वैकेंसी नहीं निकालने का इरादा जता रहे हैं। देखना यही है कि आगामी बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली क्या कोई चमत्कार कर पाएंगे?