हाल ही में जारी ऑक्सफेम विषमता रिपोर्ट, 2020 में कई अध्ययन और आंकड़ों के माध्यम से बताया गया है कि भारतीय समाज में महिलाओं के साथ व्याप्त विषमता से निपटने के लिए समाज और सरकार, दोनों स्तर पर काम करने की जरूरत है। इस रिपोर्ट ने अपनी संस्तुतियों में कहा है कि चूंकि अवैतनिक देखरेख कार्य महिलाओं की पहचान का एक मुख्य पक्ष है, अतः केवल इस कार्य के महिलाओं और पुरुषों में बेहतर पुनर्वितरण की पैरवी ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए अधिक गहरे, व्यापक, सामूहिक विमर्श की जरूरत है। प्रचलित मान्यताओं और उनसे जुड़े व्यवहार में व्यापक बदलाव की जरूरत है।
यह बदलाव धीरे-धीरे महिलाओं और पुरुषों के जीवन में आना चाहिए। यह रिपोर्ट रेखांकित करती है कि इस तरह का बदलाव लाने के लिए अनुकूल माहौल बनाने में राज्य को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। महिलाओं के लिए ऐसी सार्वजनिक सुविधाएं (जैसे कि पानी, गैस स्टोव, शौचालय) तथा सेवाएं (ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित व बेहतर यातायात, बच्चों के रख-रखाव की सुविधा जैसे क्रेच) उपलब्ध होनी चाहिए, जिससे कि वे श्रम-क्षेत्र में समान भागीदारी के अधिकारों को प्राप्त कर सकें। रिपोर्ट के अनुसार स्कूलों व कॉलेजों में लैंगिक संवेदनीकरण व व्यवहार-बदलाव कार्यक्रम आरंभ करना चाहिए। पुरुषत्व व नारीत्व की सही पहचान के सार्वजनिक अभियान भी आरंभ होने चाहिए, जिससे परिवार व परिवार से बाहर श्रम संबंधी पूर्वाग्रह दूर किए जा सकें। स्कूलों में किशोर-किशोरियों तथा समुदायों में पुरुष तथा महिलाओं के बीच लैंगिक समानता के लिए व्यापक लैंगिक संवेदनीकरण के अभियान चल सकें, इसके लिए संबंधित संस्थाओं को सहयोग मिलना चाहिए।
समाज और अर्थव्यवस्था में महिलाओं की व्यापक भागीदारी की बात तो बहुत की जाती है, पर इसके लिए जरूरी कदम उठाए जाएं, तभी जमीनी स्तर पर बदलाव नजर आएगा। इस कार्य को दो स्तरों पर आगे बढ़ाना जरूरी है। पहला स्तर सामाजिक व्यवहार यानी परिवार व विशेषकर पुरुषों के स्तर पर महिलाओं की भूमिका के प्रति दृष्टिकोण का है। जब तक पुरुष घर-गृहस्थी और देखरेख के कार्यों में महिलाओं का अधिक साथ न दें, तब तक महिलाओं पर इस कार्य का अत्यधिक बोझ बना रहेगा और उन्हें शिक्षा, प्रशिक्षण और विकास के समुचित अवसर नहीं मिलेंगे। अवसरों के अभाव में अधिकांश महिलाएं या तो अर्थव्यवस्था व समाज में व्यापक भूमिका के लिए आगे आ नहीं सकेंगी। इस स्थिति में अनेक प्रतिभाशाली महिलाओं व लड़कियों की रचनात्मकता व व्यापक क्षमताओं को निखरने का अनुकूल अवसर नहीं मिलेगा और समाज व अर्थव्यवस्था की व्यापक क्षति होगी। ऐसे ही, पुरुष जब गृहस्थी और देखरेख के कार्यों से अधिक जुड़ेंगे, तो उनके बहुपक्षीय व्यक्तित्व के कुछ उपेक्षित पक्षों को विकसित होने का अवसर भी मिलेगा।
दूसरा स्तर सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों का है। यदि सरकारें उन नीतियों और कार्यक्रमों को अधिक असरदार ढंग से कार्यान्वित करें, जिनसे महिलाओं को घर-गृहस्थी व देखरेख के अधिक बोझ से राहत मिलती है, तो उन्हें अपनी प्रतिभाओं का विकास करने तथा शिक्षा व प्रशिक्षण के लिए अधिक समय मिलेगा। यदि साफ पेयजल की उपलब्धता बहुत आसान और घर के पास सुनिश्चित हो जाए, तो इससे महिलाओं व लड़कियों के समय व श्रम की बचत होगी तथा अपनी क्षमताओं के विकास के लिए अधिक समय व अवसर उन्हें मिलेंगे। ऐसे ही यदि गांवों के पास चारे व ईंधन के संकट का संतोषजनक समाधान हो जाए, तो इससे भी महिलाओं को मदद मिलेगी।