सातवें वेतन आयोग की सिफारिश लागू करने के साथ यह प्रावधान करना कि, ‘अच्छा नहीं, बहुत अच्छा’ करने पर ही वेतनवृद्धि और पदोन्नति मिलेगी, एक गंभीर मसला है। सुनने और देखने में बात अच्छी लग सकती है, लेकिन गैर बराबरी पर आधारित भारतीय समाज व्यवस्था में, जहां जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार पर भेदभाव की कुसंस्कृति रही है, वहां यह शोषण का नया हथियार साबित हो सकता है। आशंका यह भी है कि यह परोक्ष रूप से भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार को बढ़ाएगा।
आखिर ‘अच्छा या बहुत अच्छा’ काम करने का क्या मापदंड होगा? चापलूसी करना, उपहार देना या घर-परिवार का काम निपटाना भी अच्छा काम माना जाएगा या इससे मुक्ति मिल जाएगी? जहां वरिष्ठता जैसी चीज नहीं है, वहां क्या आज योग्यता के आधार पर उच्च पदों को भरा जा रहा है या अपनी पसंद, विचारधारा, जाति, संबंध, रिश्ते आदि का ख्याल रखकर? क्या यह संभव नहीं कि गैर बराबरी वाले हमारे समाज में ऐसे प्रावधान अधिकारियों को मनमानी करने की छूट प्रदान करेंगे? क्या यह आशंका निर्मूल है कि इससे सर्वाधिक नुकसान दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों का होगा?
वार्षिक प्रविष्टियां देने का जो तरीका सरकारी महकमों में रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है। वहां काम की गुणवत्ता खास मायने नहीं रखती। चाटुकारिता और भेंट के सहारे बेहतर प्रविष्टियां पाने की जुगत वर्षों से कायम है। दफ्तरों में काम करने वाले स्वाभिमानी कर्मचारियों की तुलना में, काम न करने वाले, चाटुकार और दलाल जैसे कर्मचारी, अपने बॉस के ज्यादा प्रिय होते हैं। उन्हें ही बेहतर प्रविष्टियां मिलती हैं। ‘बॉस इज ऑलवेज राइट’ का कथन, उसी संस्कृति का अंग है। चाटुकार कर्मचारी, अफसरों के घरों तक अपनी पहुंच बना लेते हैं। वे ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर कार्यालय की पूरी नीति-अनीति पर पकड़ रखते हैं। कभी-कभी किसी ईमानदार अफसर के आ जाने पर बेशक उनकी दाल नहीं गलती। मगर अगले अफसर के आते ही चापलूसी फिर कारगर हो जाती है। नुकसान हमेशा ईमानदार और मेहनती कर्मचारियों का होता है।
भारत की जाति व्यवस्था का कोढ़, सरकारी दफ्तरों को ज्यादा प्रभावित किए हुए है। काम लेने के तौर-तरीकों में भी जातिवादी नजरिया अपनाया जाता है। आरक्षण से आए दलितों या पिछड़ों की वार्षिक प्रविष्टियां खराब करने की परंपरा रही है। यह परंपरा और बढ़ जाए, तो कार्यालय की कार्य-संस्कृति का नुकसान ही होगा।
जिस शिक्षा के सहारे हम नौकरी में आते हैं, उसका ढांचा जातिवादी है। प्राथमिक पाठशालाओं में दलित छात्रों या दलित रसोइयों के साथ जो भेदभाव हुआ, वह हमने देखा है। विश्वविद्यालयों में पीएच. डी. छात्रों से लेकर तकनीकी संस्थाओं में शीर्ष स्थान पर आने वाले छात्रों के साथ जातिगत भेदभाव होता रहा है। जब वार्षिक प्रविष्टियों के सहारे भेदभाव करने और अपनों को लाभ पहुंचाने का खेल खेला जाता रहा है, तब सातवें वेतन आयोग की यह सिफारिश, कि बहुत अच्छा काम करने वालों को ही मिलेगी वेतन वृद्धि या पदोन्नति, यह निम्न जाति के कर्मचारियों के हितों को नुकसान पहुंचा सकती है। यह भी संभव है कि आने वाले दिनों में दलितों और पिछड़ों को उच्च पदों पर पदोन्नति पाने के अवसर को इस हथियार के सहारे समाप्त ही कर दिया जाए?
‘बहुत अच्छा’ एक सापेक्ष शब्द है। इसको वेतनवृद्धि या प्रोन्नति का आधार बनाने से अनावश्यक विवाद बढ़ेंगे।