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अपराध आखिर कैसे होंगे कम?

Thu, 13 Jun 2013 08:38 PM IST
शीतला सिंह
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समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह ने अपने बेटे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश को नसीहत दी है कि यदि मैं मुख्यमंत्री होता, तो 15 दिन में कानून और व्यवस्था ठीक कर देता। उन्होंने कहा कि जो अधिकारी सुनने और सुधरने के लिए तैयार नहीं हैं, उन्हें जेल भेजा जाना चाहिए। वह उत्तर  प्रदेश में कानून और व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति पर पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवालों का जवाब दे रहे थे।
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अब प्रश्न उठता है कि जिस प्रकार का जीवन दर्शन हम अपनाने जा रहे हैं, उसका मुख्य लक्ष्य तो येन-केन-प्रकारेण लाभ प्राप्त करना है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हम उचित और अनुचित साधनों का प्रयोग करने पर भी उतारू हैं। क्या समाज में ऐसी स्थितियां बन रही हैं, जिससे उसके आचार-व्यवहार के मानक बदलें, वह अनुचित और अपराधिक गतिविधियों से दूर रहे। उल्टे अपराधिक प्रवृत्तियों के शिकार तो घर-परिवार के लोग भी हो रहे हैं।

अध्ययन में ऐसे प्रकरण भी आ रहे हैं कि बेटे ने बाप का कत्ल इसलिए कर दिया, जिससे उसकी कमाई हुई संपत्ति का उत्तराधिकारी होने के नाते वह उसे स्वतः प्राप्त हो जाए। समाज में बाजारी प्रवृत्ति के साथ ही बिकाऊपन भी बढ़ रहा है, इसलिए यह माना जाता है कि समाज का कोई ऐसा हिस्सा नहीं है, जो उपयोग के लिए खरीदा न जा सके।
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भू-सपंत्तियां और जायदाद तो बिकती ही हैं, उन पर अनुचित कब्जे की प्रवृत्तियां भी हावी होने की शिकायत काफी दिनों से है, लेकिन यहां श्रम और शरीर भी बिकाऊ है। इसी के साथ ही ज्ञान, बुद्धि और कौशल के खरीददार भी हैं।
हम जिसे नियामक और नियंत्रक इकाई यानी राज्य को संचालित करने के लिए अधिकारों से संपन्न अधिकारी वर्ग कहते हैं, वह भी इस प्रवृत्ति से पूर्णतया मुक्त नहीं है।

देश भर में कई हजार अधिकारियों पर अपने पदों का दुरुपयोग करके अनुचित लाभ कमाने के आरोप, जांच और अदालतों में विद्यमान हैं। कौन-सा समुदाय ऐसा है, जो अनुचित लाभ की ओर नहीं बढ़ रहा है। बड़ी मात्रा में जो सत्ता के नियामक मंत्री हैं, वे भी तो अपराध की जांच के घेरे में हैं।

अभी पिछली प्रदेश सरकार के 18 मंत्री पदों का दुरुपयोग करने के चलते हटाए गए थे और अब उसमें से ज्यादा अपराधिक गतिविधियों द्वारा अनुचित धन कमाने के लिए लोकायुक्त या जांच आयोग का सामना कर रहे हैं। अभी केन्द्र के दो मंत्रियों को भी हटाना पड़ा है, जिनके ऊपर अपने पद के दुरुपयोग का आरोप था।

लोकतंत्र में राज्य व्यवस्था कानून सम्मत बनाई गई है, इसे उसके प्रतिनिधि बनाते हैं। कानूनों की संख्या बढ़ती जा रही है, लेकिन यह पूरी नहीं हो पा रही है, क्योंकि अपराध के नए स्वरूपों के नियमन के लिए यही लगता है कि अब इसमें बदलाव होना चाहिए।

इसलिए आंकड़े हम कोई देखें, लेकिन सत्य यही है कि अपराध घटने के बजाय बढ़ते ही जाएंगे। अपराधों के नियमन और नियंत्रण के लिए व्यवस्था नायक को पुलिस बल कहा जाता है, लेकिन पिछली सदी के सातवें दशक में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश आनंद नारायण मुल्ला ने पुलिस को गुंडों और अपराधियों का समूह बताया था। आज पुलिस के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी भले ही भिन्न हो, लेकिन तात्विक दृष्टि से तो यही निष्कर्ष बता रही है।

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्केंडेय काटजू ने उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय के संबंध में एक टिप्पणी की थी कि व्यवस्था सड़ गई है, उससे सड़न और गंदगी की बू आ रही है। अब सवाल उठता है कि इन व्यवस्थाजन्य दोषों के लिए आखिर हम किसे जिम्मेदार ठहराएं।

इसलिए मुख्यमंत्री मुलायम सिंह रहें या अखिलेश या मायावती या कोई और आ जाए या प्रश्न देश के किसी राज्य का हो, अपराध वृद्धि से मुक्ति के जो साक्ष्य आएंगे भी, वे केवल इस तथ्य पर आधारित होंगे कि राज्य अपराधों को छिपा रहा है, लेकिन आम आदमी तो बढ़ते हुए अपराधों से ऊब और घुटन महसूस करेगा ही। इसलिए यह उपदेशों, जेल और पुलिस बलों की संख्या बढ़ाकर नहीं, बल्कि जीवन के आदर्श और मानक बदल कर ही संभव है। इस दिशा में प्रयत्न दिख ही नहीं रहा है।
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