वह यह जताने की कोशिश कर रही है कि राहुल गांधी की सोच वक्त से आगे की है। चूंकि दक्षिण के लोगों की सोच ज्यादा परिपक्व है, इसलिए वे राहुल की बातों पर भरोसा कर रहे हैं। पहले कर्नाटक और फिर तेलंगाना की जीत इसका परिचायक है।
नैरेटिव के बहाने उत्तर बनाम दक्षिण की जंग का लंबा इतिहास रहा है। कहा जाता रहा है कि विंध्य के उत्तर वाले लोग विदेशी धरती से आए आर्य की संतान हैं, जबकि विंध्य के दक्षिण वाले लोग बुनियादी रूप से भारत के ही लोग हैं। हालांकि दयानंद सरस्वती जैसे लोग इसका विरोध करते रहे। आज के दौर के राजनेता सुब्रमण्यम स्वामी हों या फिर मानवशास्त्री, सबका मानना है कि चाहे उत्तर के लोग हों या दक्षिण के, वे बुनियादी रूप से एक ही हैं। शंकराचार्य ने पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में पीठ स्थापित करके इस विभाजनकारी सोच पर रोक लगाने की कोशिश की थी। भारत सरकार अधिनियम के तहत जब 1937 में राज्यों में चुनाव हुए, तब से पेरियार की अगुआई में शुरू हुआ हिंदी विरोध भी उत्तर बनाम दक्षिण की ही जंग का विस्तार था। जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी राष्ट्रपति नहीं बन पाए, तब भी उत्तर बनाम दक्षिण की वैचारिक जंग को हवा दी गई। संविधान सभा की मंजूरी के बावजूद हिंदी अगर देश की व्यावहारिक रूप से राजभाषा नहीं बन पाई, तो इसके पीछे भी उत्तर बनाम दक्षिण वाली सोच ही थी।
उत्तर के राज्यों की गरीबी व पलायन और दक्षिण के आर्थिक उत्थान के पैमाने पर भी यह जंग चलती रही है। वैसे भी देश को बांटने और किसी क्षेत्र विशेष के लोगों को हंसी का पात्र बनाने की परंपरा लंबे समय से है। पर सोच के स्तर पर उत्तर और दक्षिण के राज्यों को बांटने की मौजूदा कोशिश बाकी कोशिशों से अलग है। स्वाधीनता आंदोलन की कोख से निकली कांग्रेस ने अंदरूनी राजनीति के चलते भले ही कभी ऐसी राजनीति को हवा दी हो, पर उसने खुलकर कभी ऐसी विभाजनकारी सोच को हवा नहीं दी। कांग्रेस की संस्कृति और राजनीतिक परंपरा भारत को जोड़ने की रही है, तोड़ने की नहीं। ताजिंदगी कांग्रेसवाद के विरोधी रहे समाजवादी नेता मधु लिमये ने अपने आखिरी लेख में कांग्रेस को देश की एकता का प्रतीक बताया था। पर लगता है कि कांग्रेस के आज के कर्णधार और उनके सलाहकारों को कांग्रेस की इस प्रकृति की जानकारी नहीं है।
एक बारगी मान भी लें कि कांग्रेस का नैरेटिव सही है, कि दक्षिण के लोग उत्तर के लोगों के मुकाबले राजनीतिक रूप से परिपक्व हैं, तो हमें यह भी मानना पड़ेगा कि आपातकाल सही था, क्योंकि उसके बाद हुए आम चुनावों में कांग्रेस को जो 154 लोकसभा सीटें मिली थीं, उनमें से 89 सीटें दक्षिण भारत में ही मिली थीं। उत्तर में सिर्फ मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा सीट पर उसे जीत मिली थी। निश्चित तौर पर कांग्रेस भी इसे स्वीकार नहीं करेगी। तो फिर वह उत्तर बनाम दक्षिण को लेकर ऐसा नैरेटिव क्यों फैला रही है?
तमिलनाडु में कांग्रेस 1971 के विधानसभा चुनावों से ही गायब है। अगर वह कभी दिखती है, तो द्रमुक या अन्नाद्रमुक के सहारे। केरल और आंध्र प्रदेश की सत्ता से भी कांग्रेस दो चुनावों से दूर है, तो क्या यह मान लिया जाए कि इन प्रदेशों के लोगों की सोच छोटी है। आज के दौर में हर राजनीतिक दल राजनीतिक फायदे के लिए नैरेटिव गढ़ सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया में उसे देखना होगा कि उससे देश का मानस न बंटे। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वह विभाजन की सोच पर लगाम लगाए, क्योंकि इसका खामियाजा समूचे देश को भुगतना पड़ेगा। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी कांग्रेस को इससे परहेज करना चाहिए।