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स्वामी हैं कि मानते नहीं

Thu, 07 Jul 2016 11:53 AM IST
गीता आनंद
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गीता आनंद
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राजग सरकार में वह किसी भूमिका में नहीं हैं। छिहत्तर वर्ष की उम्र में भी वह युवाओं की तरह मुखर हैं, लेकिन लगभग हमेशा शांतचित्त रहते हैं। फिर भी वह भारतीय राजनीति में सबसे चालाक लड़ाकू हैं, जहां अपने चालीस वर्षों से ज्यादा के करियर के दौरान वह मंत्रियों और सरकारों को निशाना बनाते रहे हैं।
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हाल ही में उन्होंने सबसे पहले तो रिजर्व बैंक के गवर्नर पर फिर वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार पर निशाना साधा। फिर उन्होंने चीन की यात्रा के दौरान पारंपरिक भारतीय पोशाक पहनने के बजाय बिजनेस सूट पहनने के लिए परोक्ष रूप से वित्त मंत्री अरुण जेटली पर निशाना साधा।

इस तरह से अर्थशास्त्री स्वामी, अपराध भाव से मुक्त एक हिंदू राष्ट्रवादी, जिनकी हरकतें मोदी सरकार की स्थिरता के लिए एक खतरा बन गई हैं, विवादों का विषय बन गए हैं। सवाल है कि क्या मोदी उन्हें ऐसा करने से रोकने में सक्षम हो पाएंगे।
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रमुख सलाहकार सुधींद्र कुलकर्णी बताते हैं कि अपने नवीनतम हमलों से पहले वर्ष 1999 में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की तेरह महीने की सरकार गिराने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। वह आगे कहते हैं, उन्हें सहन करने का सबसे खराब परिणाम भुगतना पड़ेगा, क्योंकि वह सबसे बड़े विनाशक होंगे।

लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने न केवल उन्हें बर्दाश्त किया है, बल्कि राजनीतिक बियावान से बाहर निकालकर राज्यसभा में लाकर उन्हें प्रोत्साहित भी किया है। राजनीतिक पर्यवेक्षक इसका कारण बताते हुए कहते हैं कि स्थानिक भ्रष्टाचार के खिलाफ स्वामी देश के सबसे बड़े सेनानी हैं। और भ्रष्टाचार उन्मूलन ऐसा विषय है, जिसे मोदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को आधुनिक और अविस्मरणीय बनाने की अपनी योजना में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। वरिष्ठ पत्रकार माधव दास नलपत कहते हैं कि यदि मोदी, सरकार को भ्रष्टाचार मुक्त रखने के अपने वायदे पर खरा उतरना चाहते हैं, तो उन्हें स्वामी की जरूरत है।

एक नौकरशाह के परिवार में जन्मे स्वामी पले-बढ़े तो नई दिल्ली में, लेकिन अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की डिग्री के लिए 1962 में हार्वर्ड चले गए। 1969 में हार्वर्ड से डिग्री लेकर वहीं कुछ वर्षों तक पढ़ाने के बाद वह अकादमिक जगत में करियर बनाने की उम्मीद से भारत लौटे। लेकिन मुक्त बाजार व्यवस्था के मुखर पैरोकार के रूप में उन्होंने पाया कि घोर वामपंथी प्रभुत्व वाले अकादमिक जगत का द्वार उनके लिए बंद है। देश के शीर्ष शैक्षिक संस्थानों में कोई स्थायी जगह पाने में अक्षम रहने पर वह अमेरिका लौटने पर विचार कर रहे थे, तभी वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए, जो सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक जनक है। संघ ने ही उन्हें 1974 में पहली बार राज्यसभा का सदस्य बनाया और वहीं से उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई।

इन वर्षों में स्वामी दो अलग-अलग पार्टियों में रहकर पांच बार संसद में पहुंचे हैं। सर्दियों में भारत में रहना और गर्मियों में हार्वर्ड में पढ़ाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। लेकिन हार्वर्ड में उनका किस्सा 2011 के अंत में अचानक तब खत्म हो गया, जब उन्होंने मुंबई में हुए सिलसिलेवार आतंकी हमले के बाद एक अखबार में लेख लिखा।

अपने उस लेख में उन्होंने मंदिरों पर बने हुए 300 मस्जिदों के विध्वंस का आह्वान किया था और कहा था कि मुस्लिमों को तब तक के लिए भारत में मताधिकार से वंचित कर दिया जाना चाहिए, जब तक कि वे अपने हिंदू पूर्वजों को स्वीकार नहीं करते। उसी के बाद हार्वर्ड ने उन्हें ग्रीष्म पाठ्यक्रम में अध्यापन से वंचित कर दिया। स्वामी ने इस लेख के लिए माफी नहीं मांगी।

उन्हें जानने वाले कुछ लोग कहते हैं कि वह वास्तव में मुस्लिम विरोधी हैं। उनके बयानों का उद्देश्य हिंदू राष्ट्रवादियों के बीच जनाधार निर्माण है। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार नलपत कहते हैं कि वह गुप्त रूप से धर्मनिरपेक्ष हैं, आप उनके परिवार का विश्लेषण कैसे करेंगे? उनकी पत्नी रेक्सोना पारसी समुदाय की सदस्य हैं, जिनका परिवार सदियों पूर्व ईरान से आया था। उनके एक दामाद मुस्लिम हैं।

हिंदू राष्ट्रवाद में उनकी जो भी भूमिका रही हो, लेकिन भारत के कुछ ऐतिहासिक भ्रष्टाचार को सामने लाने में स्वामी की अहम भूमिका रही है। वर्ष 2010 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की, जिसमें बाजार से कम दर पर कंपनियों को सेलफोन स्पेक्ट्रम आवंटन में संलिप्तता का आरोप लगाकर दूरसंचार मंत्री पर मुकदमा चलाने के लिए कहा। इसने भ्रष्टाचार की धारणा को बड़े पैमाने पर फैलाने में मदद की, जिसके कारण लंबे समय से देश में सत्तारूढ़ कांग्रेस हार गई।

उन्होंने कांग्रेस के बड़े नेताओं सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर भी मुकदमा किया और आरोप लगाया कि उन्होंने एक अखबार की अचल संपत्ति पर अवैध कब्जा किया और उन्हें आरोपी के रूप में अदालत में पेश होने और जमानत लेने के लिए मजबूर किया।
कभी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रवक्ता रहे संजय बारू कहते हैं कि हर कोई मानता था कि गांधी परिवार का कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता, लेकिन स्वामी ने यह संभव कर दिखाया।

हाल में स्वामी ने अदालत से बाहर सोशल मीडिया पर भी जंग छेड़ दी है, जहां तीस लाख लोग उनके ट्वीटर फॉलोअर हैं। सुबह चार बजे उठकर वह एक कप काफी पीते हैं और ट्वीटर के मंच पर हमले शुरू कर देते हैं।

रिजर्व बैंक के गवर्नर, मुख्य आर्थिक सलाहकार और वित्त मंत्री अरुण जेटली पर उनके हमले के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने एक टीवी इंटरव्यू में स्वामी के हमलों को अनुचित एवं पब्लिसिटी स्टंट बताकर निंदा करते हुए कहा कि ऐसे व्यवहार से देश का कोई भला नहीं होगा। रघुराम राजन की बहुत देर से रक्षा करते हुए उन्होंने कहा, मैं मानता हूं कि रघुराम राजन हममें से किसी से कम देशभक्त नहीं हैं।

अगर स्वामी को प्रधानमंत्री ने नसीहत दी, तो उसका कोई असर उन पर नहीं दिखा। ट्वीटर पर उन्होंने प्रधानमंत्री का साक्षात्कार लेने वाले का मजाक उड़ाया और गांधी परिवार पर कुछ नए हमले किए।
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