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दंतेवाड़ा की गलती पांपोर में दोहराई गई

Wed, 06 Jul 2016 07:47 PM IST
शिवदान सिंह
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शिवदान सिंह
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कश्मीर के पांपोर में हाल ही में सीआरपीएफ के आठ जवानों की आतंकियों द्वारा घात लगाकर हत्या ने देश को जहां गम और गुस्से से हिला दिया, वहीं यह संदेश भी दिया है कि सीआरपीएफ में कुछ कमी है, जिसका फायदा आतंकवादी और उग्रवादी उठाते रहते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में सीआरपीएफ पर हमला गंभीर घटना है, जिस पर नीति-निर्धारकों को ध्यान देना चाहिए।
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वर्ष 2010 की दंतेवाड़ा की घटना के कारणों की जांच के लिए प्रसिद्ध आईपीएस अधिकारी ई. राम मोहनराम के नेतृत्व में एक जांच कमेटी गठित की गई थी। इस कमेटी ने पाया कि सीआरपीएफ के जवानों ने उस क्षेत्र के लिए निर्धारित कार्य प्रणाली (जिसे एसओपी कहा जाता है, स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर) का पालन नहीं किया।

एसओपी के अनुसार निर्देश था कि दंतेवाड़ा के ग्रामीण क्षेत्रों में सीआरपीएफ के जवान ग्रामीणों से न तो कोई संबंध रखेंगे और न उनसे कोई सहायता लेंगे, क्योंकि माओवादियों का उस क्षेत्र में जाल बिछा हुआ है। इस कमेटी ने इसके लिए सीआरपीएफ के तीन अधिकारियों, जिनमें डीआइजी नलिन प्रभात भी थे, को जिम्मेवार ठहराया। परंतु इन तीनों अधिकारियों को सजा के तौर पर केवल वहां से दूसरे स्थानों पर ट्रांसफर कर दिया गया। आज इसी का नतीजा है कि उन्हीं नलिन प्रभात (जो अब आइजी बन गए हैं) के कार्यक्षेत्र पांपोर में घटना घटी।
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पांपोर कश्मीर घाटी का दक्षिणी हिस्सा है, जो श्रीनगर को जम्मू से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 44 पर स्थित है। बताया जाता है कि वृजवेहरा तथा पांपोर के बीच लश्कर के आतंकियों की काफी सरगर्मियां हैं। इन्हीं दोनों स्थानों के बीच पिछले छह महीनों में सुरक्षा बलों पर सात बार आतंकी हमले हो चुके हैं। एसओपी के अनुसार, पूरी कश्मीर घाटी में सुरक्षाबलों तथा सिविल वाहनों की आवाजाही से पहले सुरक्षा बल उस क्षेत्र के मार्गों की पड़ताल करके संवेदनशील ठिकानों पर अपनी टुकड़ी तैनात करके वाहनों की आवाजाही करते हैं। परंतु पांपोर में ऐसा नहीं किया गया।

असल में सीआरपीएफ जैसे बड़े बल को पेशेवर, समर्पित तथा इससे लगाव रखने वाला शीर्ष नेतृत्व नहीं मिल रहा। नलिन प्रभात जैसे भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर इसके बड़े पदों पर आते हैं, और अपना समय पूरा करके वापस चले जाते हैं। नतीजतन इस बल की कार्यप्रणाली सेना की तरह पेशेवर तथा अनुशासित नहीं है। इस बल में शीर्ष अधिकारियों के दूसरे कैडरों से आने के कारण जवाबदेही का कहीं नामोनिशान नहीं है। सेना हर क्षेत्र की भौगोलिक तथा सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार अपनी कार्यप्रणाली तय कर लेती है और इसका उल्लंघन करने वाले को सेना के कानून की धारा 63 एवं अन्य सेक्शनों में सजा दी जाती है। परंतु जवाबदेही की कमी के कारण सीआरपीएफ के किसी भी अधिकारी या कर्मी को 2010 से अब तक होने वाली घटनाओं एवं जानमाल की हानि के लिए न तो जवाबदेह ठहराया गया और न ही तय प्रक्रिया का पालन न करने के लिए सेना की तरह सजा दी गई।

अर्धसैनिक बलों में यदि उनके कैडर के अधिकारी शीर्ष स्तर पर नियुक्ति के योग्य नहीं हों, तो इन बलों में सैन्य अधिकारियों को ही नियुक्त किया जाना चाहिए। क्योंकि भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी राज्य पुलिस की शैली के अनुसार काम करने के अभ्यस्त हो जाते हैं। साथ ही जवाबदेही की भावना बढ़ाने के लिए अर्धसैनिक बलों में भी सेना के कानून जैसी व्यवस्था होनी चाहिए।
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लेखक, सेवानिवृत्त कर्नल हैं
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