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कैसे हासिल करेंगे बजट लक्ष्य

Tue, 03 Feb 2015 08:19 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
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अच्छे दिन लाने के वायदे के साथ सत्ता में आई एनडीए सरकार के पहले पूर्ण बजट से स्वाभाविक रूप से विभिन्न वर्ग के लोगों को काफी उम्मीदें होंगी। हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली के समक्ष कई वित्तीय चुनौतियां भी साफ दिख रही हैं। यदि हम राजकोषीय आंकड़े को देखें, तो वे चिंताजनक संदेश देते हैं। अप्रैल से नवंबर, 2014 के बीच राजकोषीय घाटा पूरे वर्ष के लक्ष्य के करीब 99 फीसदी के समान रहा है। चालू वित्त वर्ष 2014-15 में राजकोषीय घाटे के 5.3 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है।
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हम जानते हैं कि राजकोषीय घाटे का सीधा संबंध कर राजस्व में भारी कमी से है। अप्रैल से नवंबर की अवधि के दौरान कर राजस्व में महज 4.3 फीसदी की धीमी गति से बढ़ोतरी हुई, जबकि इसके 20 फीसदी की दर से वृद्धि करने का अनुमान पेश किया गया था। इसका मतलब है कि कर राजस्व में करीब एक लाख पांच हजार करोड़ रुपये की कमी का अनुमान है। इसमें अगर विनिवेश प्रक्रिया और स्पेक्ट्रम नीलामी से मिलने वाली राशि के लक्ष्य से कम रहने के अनुमान को जोड़ दिया जाए, तो चालू वित्त वर्ष के बजट लक्ष्य को हासिल कर पाना लगभग नामुमकिन दिख रहा है।

हालांकि इसके इतर भी कई अन्य चिंताएं हैं, जिनसे वित्त मंत्री को जूझना है। इनमें से एक बड़ी चिंता बैंकिंग क्षेत्र में पूंजी मुहैया कराने की है। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि ढांचागत बुनियादी क्षेत्र की बंद बड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाना जरूरी है।
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हालांकि कुछ वित्तीय अनुकूलताएं भी हैं, जिनके आधार पर वित्त मंत्री अच्छे बजट का खाका खींच सकते हैं। जून, 2014 के बाद से कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में करीब 55 प्रतिशत की कमी आई है। इससे सरकार को खासा लाभ हुआ है। इसी तरह, देश की अर्थव्यवस्था में विश्वास बढ़ने से विनिवेश से धन जुटाए जाने की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं। हाल ही में देश के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी विनिवेश कवायद के तहत सरकार ने कोल इंडिया में अपनी 10 फीसदी हिस्सेदारी बेची, जिससे खजाने में करीब 22,400 करोड़ रुपये आ गए। निवेशकों के उत्साह को देखते हुए सरकार विनिवेश कार्यक्रम को रफ्तार दे सकती है।

वस्तुतः बजट बनाते समय वित्त मंत्री को सूझबूझ के साथ वित्तीय क्षेत्र में मौजूदा दबाव से जुड़ी चिंताओं का समाधान तलाशना होगा। उन्हें कराधान प्रणाली में सुधार के साथ ही राजस्व संग्रह में बढ़ोतरी के लिए स्पष्ट कार्ययोजना पेश करनी होगी। उन्हें वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) को लागू करने की दिशा में भी स्पष्ट घोषणा करनी होगी। इसी तरह वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी के मद्देनजर चालू खाते के घाटे को सुधारने के लिए निर्यात में बढ़ोतरी के लिए नई रणनीति बनानी होगी। चूंकि सार्वजनिक खर्च की पूरी भरपाई केवल बजट से नहीं होती है। ऐसे में, आक्रामक विनिवेश कार्यक्रम को नए बजट का अंग बनाना होगा। लिहाजा देखना होगा कि वित्त मंत्री नए बजट से आम आदमी, बाजार, किसान, उद्योग, अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और वैश्विक रेटिंग एजेंसियों का कितना भरोसा जीत पाते हैं।
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