सियासत के अंधेरे सार्वजनिक हैं। यह बात सभी जानते हैं, लेकिन यहां हम समाज के अंधेरे की भी बात करेंगे। अनुभव एकदम ताजा है। यह नववर्ष की पूर्व बेला थी। 29 दिसंबर की रात हम उत्तर प्रदेश में गुन्नौर तहसील के एक गांव गंगुर्रा पहुंचे। चंद दिन पूर्व चरनसिंह नामक दलित की छठी में पढ़ने वाली बारह वर्षीय बेटी सुधा अपने पिता के साथ खेत पर गई थी। प्यास लगी, तो सामने बनी मंदिर पर पानी पीने चली गई थी। इस पर पुजारी ने न केवल उसे बुरी तरह मारा-पीटा, बल्कि शिकायत करने पर उसके पिता पर भी हमला किया था। सोशल मीडिया, टीवी चैनल और अखबारों द्वारा यह वाकया सामने आया, तो कानूनी कार्रवाई भी हुई और वह बाबा जेल भी गया।
परंतु इस बीच सुधा के ग्यारहवीं में पढ़ने वाले चचेरे भाई राहुल को उसके पिता ने नए कपड़े और मोटरसाइकिल खरीदकर दी, तो कुछ लोगों को यह पसंद नहीं आया कि एक दलित अच्छा कपड़ा पहनकर उसके जैसा दिखे। उसके साथ मारपीट की गई और चाकू से वार किए गए। इलाज के बाद उसकी जान तो बच गई, लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं कि फिर उसके साथ ऐसा कुछ नहीं होगा। उसके छोटे भाई का अपहरण हुए छह महीने से अधिक हो गए हैं, पर पुलिस ने उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट तक नहीं लिखी।
इन्हीं सब घटनाओं की जानकारी लेने जब हम लोग पिछले दिनों वहां गए और उस मंदिर के बाबा से इस संबंध में पूछताछ करने लगे, तो वह भड़क गए। जहां हम टिके थे, वहां रात में कुछ पुलिस वाले पहुंच गए और बोले कि हमें पता चला है कि कुछ संदिग्ध लोग लेखक-पत्रकार का बहाना बनाकर दलित बस्ती में छिपे हैं। जब हमने अपना-अपना परिचय पत्र दिखाया, तो वे लौट गए।
अगले दिन जब हमने थाने के इंचार्ज से कहा कि आपको तो अल्पसंख्यकों, दलितों की रक्षा करनी चाहिए, पर आप तो कमजोरों को वक्त-बेवक्त सताने पहुंच जाते हैं। तो उन्होंने कहा कि जब सौ लोग किसी एक दलित के खिलाफ शिकायत लेकर आते हैं, तो हमें जाना ही पड़ता है। इस पर हमारे साथ गईं एक महिला पत्रकार ने कहा कि तब उन लोगों के खिलाफ हमारी भी शिकायत लीजिए, जिन्होंने हमारे बारे में झूठी रिपोर्ट लिखवाई। उसने लिखित शिकायत दी, जिसे थाना इंचार्ज ने रख लिया।
इलाके के कुछ दलितों ने बताया कि चूंकि इस बस्ती के दलितों को किसी भी पार्टी की सरकार में पढ़ने-लिखने के मौके नहीं मिले, रोजगार योग्य बनने ही नहीं दिया गया, तो भला उन्हें आरक्षण का लाभ कैसे मिलेगा। गांव में बिजली के खंभे दिख रहे थे, लेकिन दलित घरों में बिजली नहीं थी। शाम होते ही दलित बस्ती अंधेरे में डूब जाती है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत गांव में शौचालयों तो बने हैं, लेकिन उनकी हालत इतनी खराब थी कि उसमें कोई बैठ नहीं सकता था। नतीजतन महिलाओं को खुले में शौच जाने की स्पष्ट मजबूरी दिखाई देती है। गांव में किसी को सरकार की ओर से गैस चूल्हा नहीं मिला है। हां, लोहिया के नाम पर कुछ सड़कें जरूर पक्की बन गई हैं।
जिस अस्पृश्यता को संविधान के जरिये खत्म कर दिया गया है, वह अब भी यहां दिखता है। गरीबी बेरोजगारी और उपेक्षा के कारण यहां अधिकांश दलित परिवार गांव छोड़कर चले गए हैं। यह विडंबना ही है कि जब मायावती सत्ता में आती हैं, तो वह भी दलित की चिंता छोड़ सर्वजन का राग अलापने लगती हैं और जब सपा का समाजवाद आता है, तो वह एक जाति तक सिमटकर दलितों के खिलाफ खड़ा हो जाता है।