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मोदी-जिनपिंग पर टिकी उम्मीदें

चिंतामणि महापात्र Updated Tue, 12 Jun 2018 05:57 PM IST
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मोदी-जिनपिंग पर टिकी उम्मीदें
महज छह हफ्ते के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूसरी चीन यात्रा ने भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में मजबूती के संकेत दिए हैं। हाल के समय में भारत-चीन रिश्ते में काफी-उतार चढ़ाव रहा है और अब समय आ गया है, जब एशिया के इस महत्वपूर्ण रिश्ते में स्थिरता आनी चाहिए। 


दूसरे विश्व युद्ध के बाद के शुरुआती वर्षों में स्वतंत्र भारत ने खुद को अंतरराष्ट्रीय मामलों में एक दिग्गज खिलाड़ी की तरह प्रस्तुत किया था, बावजूद इसके कि वह आर्थिक रूप से पिछड़ा और सैन्य मामले में कमजोर था। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की औपनिवेशिक दासता से मुक्त हुए देशों की उनके मुद्दे को उठाने की उनकी क्षमता और निर्गुट सम्मेलन की बुनियाद रखने से संभव हो सका, धीरे-धीरे सौ से अधिक विकासशील देश इसके सदस्य बन गए।


उस समय चीन या तो घरेलू आर्थिक समस्याओं में उलझा हुआ था या फिर परोक्ष रूप से शीत युद्ध की राजनीति और टकराव का हिस्सा बन गया था। 


1970 के दशक में जब देंग श्याओपिंग के नेतृत्व में चीन ने क्रमिक रूप में सुधारों को अपनाया, नतीजतन वहां आर्थिक चमत्कार आ गया, उसके बाद से माहौल भारत के खिलाफ और चीन के पक्ष में नजर आने लगा। चीन आज पीपीपी (पर्चेसिंग पॉवर पैरिटी, यानी क्रयशक्ति क्षमता) के आधार सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जीडीपी के आधार पर अमेरिका के बाद दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है।


चीन का वैश्विक दिग्गज के रूप में प्रभाव तब बढ़ना शुरू हुआ, जब विकासशील देशों पर भारत की पकड़ तेजी से कमजोर होने लगी और निर्गुट सम्मेलन का अंत हो गया। भारत में आर्थिक सुधारों की शुरुआत 1991 में हुई, चीन में आर्थिक सुधारों की पहल के करीब तेरह वर्ष बाद, जब तक वह आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य मामलों में इसका लाभांश ले चुका था। 


भारत के आर्थिक सुधारों के लाभांश आज मिल रहे हैं और उसे गतिशील अर्थव्यवस्था तथा वैश्विक दिग्गज के रूप में मान्यता दी जा रही है। चीन और भारत दोनों को सर्वाधिक आबादी वाले देशों के रूप में रेखांकित करने के साथ ही, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं और एशिया की महाशक्तियों तथा उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में देखा जाता है। 


चीन आर्थिक रूप से भारत से काफी आगे है और उसे अब उभरती वैश्विक महाशक्ति के रूप में भी देखा जा रहा है। कई विश्लेषक भारत और चीन को प्रतिस्पर्धी के तौर पर देखते हैं। भारत और चीन को एशियाई या वैश्विक प्रभाव के लिहाज से प्रतिद्वंद्वियों के तौर पर देखने से न तो भारत और न ही चीन के हित सधेंगे। 


ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी ने सिंगापुर में शांगरी ला डायलाग फोरम को संबोधित करते हुए आगाह किया कि 'प्रतिस्पर्द्धा सामान्य है। लेकिन प्रतियोगिता को विवाद में नहीं बदलना चाहिए।' उनका कहने का आशय था कि प्रतिद्वंद्विता वाला एशिया क्षेत्र को पीछे ले जाएगा, जबकि सहयोग वाला एशिया इस शताब्दी को आकार देगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि भारत और चीन भरोसे और आत्मविश्वास के साथ मिलकर काम करें, तो एशिया और विश्व का भविष्य बेहतर होगा। 
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इस बयान से थोड़े दिन पहले ही भारतीय प्रधानमंत्री और चीनी राष्ट्रपति की वुहान में सफल शिखर बैठक हुई थी, जोकि दोकलम से उपजे विवाद की पृष्ठभूमि में हुई थी और चीन ने जिसे सराहा था। चीन के विदेश मंत्रालय ने भी एक बयान जारी किया, 'प्रधानमंत्री मोदी ने चीन-भारत संबंध के बारे में सकारात्मक बातें की हैं। हम इसकी सराहना करते हैं। इसी वर्ष अप्रैल में शी ने मोदी से अनौपचारिक मुलाकात की थी।


अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य और द्विपक्षीय संबंधों को लेकर उन्होंने अपने दृष्टिकोण रखे और कई मुद्दों को लेकर सहमति पर पहुंचे।'


दोनों देशों के बीच राजनीतिक समझ को बढ़ाने के लिहाज से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने हाल ही में प्रीटोरिया में हुई ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों की बैठक में कहा था कि भारत मजबूती के साथ एक चीन की नीति को मानेगा और ताइवान या तिब्बत से जुड़े मुद्दों पर जोकि चीन के हितों से जुड़े हुए हैं, उचित प्रतिक्रिया देगा। इसके अलावा रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने दोकलम जैसा टकराव न हो इसके लिए और गलतफहमी पैदा करने वाले मुद्दों को सुलझाने के लिए बीजिंग और नई दिल्ली के बीच हॉटलाइन स्थापित करने का सुझाव दिया है। 


ऐसे सकारात्मक माहौल में प्रधानमंत्री मोदी ने किंगदाओ में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया। एससीओ के शिखर सम्मेलन ने जहां मोदी और जिनपिंग को द्विपक्षीय मसलों पर बातचीत कर सहयोग को आगे बढ़ाने  और मतेभेदों को दूर करने का मौका दिया, वहीं एक बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर एससीओ में भारत की भूमिका कैसी है।


एससीओ की बैठक में पहली बार भारत और पाकिस्तान ने पूर्ण सदस्य के रूप में हिस्सा लिया। यह इस लिहाज से अहम है, क्योंकि सार्क के अलावा कोई और क्षेत्रीय समूह नहीं है, जहां भारत और पाकिस्तान दोनों ही सदस्य हों। हालांकि सार्क का अनुभव अच्छा नहीं है। 


पारंपरिक रूप से चीन को पाकिस्तान समर्थक माना जाता है। रूस अनेक अंतरराष्ट्रीय मसलों पर भारत का भरोसेमंद समर्थक है, लेकिन कुछ मसलों में उसने अलग दृष्टिकोण भी अपनाया है। वास्तव में एससीओ भारत पाकिस्तान को द्विपक्षीय मसलों को सुलझाने का अवसर दे सकता है। सार्क के अनुभव के आधार पर यह आशंका है कि कहीं आने वाले समय में इन दो पड़ोसियों के मतभेद की छाया इस संगठन पर भी न पड़े। भारत को एससीओ का इस्तेमाल ऐसे मंच के तौर पर करना चाहिए जहां वह रूस और चीन के साथ मिलकर एक विश्वसनीय बहुध्रवीय व्यवस्था बनाए।


भारत और चीन मतभेदों के बावजूद जिस तरह से सहयोग की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, वह पाकिस्तान के लिए भी सबक हो सकता है। क्षेत्रीय सहयोग और स्थिरता इस पर टिकी है।

 
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