केंद्र के सत्ताधारी एनडीए गठबंधन में जो दरारें दिख रही हैं, वैसा होना ही था। अब अटल-आडवाणी वाली भारतीय जनता पार्टी नहीं रही, जो सहयोगियों के आगे घुटने टेकती रही है। गठबंधन में बड़ा भाई होने के नाते उसकी जवाबदेही अपने साथियों को मनाने और साथ-साथ चुनाव में उतरने की भले ही हो, लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि वह सहयोगियों की मनमानी मांगों के आगे झुक जाएगी।
इसका आभास महाराष्ट्र की शिवसेना को भी है और बिहार की लोकसमता पार्टी या जनता दल (यू) को भी है। इसीलिए अमित शाह से मुलाकात के बावजूद उद्धव ठाकरे को यह कहने में गुरेज नहीं होता कि उनकी पार्टी शिवसेना अगले चुनाव में अकेले लड़ेगी या फिर बिहार एनडीए के भोज में उपेंद्र कुशवाहा जाने से ही इन्कार कर देते हैं।
महाराष्ट्र हो या बिहार या कोई और राज्य, एनडीए के सहयोगी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए और गठबंधन में ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करने के लिए ऐसा करेंगे। इसका आभास भाजपा को भी है। इसलिए भाजपा ने पहले से प्लान-बी बनाकर रखा हुआ है। वह यह संदेश नहीं देना चाहती कि अपने सहयोगियों से वह पीछा छुड़ाना चाहती है। बल्कि बड़ा भाई होने के नाते वह चाहती है कि जनता के बीच संदेश यही जाए कि उसने अपना घर संभालने की भरपूर कोशिश की। बेशक उपचुनावों में लगातार मिलती हार ने उसके आत्मविश्वास को थोड़ा डिगाया है, लेकिन इतना भी नहीं कि वह सहयोगियों के सामने झुक जाए।
सबसे पहले बात करते हैं उपेंद्र कुशवाहा की। उन्हें जानने वालों को पता है कि वह 27 जुलाई 2017 से ही एनडीए में असहज हैं। उनकी असहजता की वजह एक दौर में उनके साथी रहे नीतीश कुमार हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय जनता दल से नाता तोड़कर फिर से भाजपा का दामन थाम लिया था। जनता दल से अलग होकर नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडिस की अगुआई में जो समता पार्टी बनाई थी, उसका मूल आधार कोइरी और कुर्मी वोट बैंक था। कुर्मी वोट बैंक की अगुआई नीतीश कुमार के हाथ थी, तो कुशवाहा यानी कोइरी बिरादरी के नेता उपेंद्र कुशवाहा माने जाते थे। दोनों को तब लव-कुश की जोड़ी कहा जाता था।
जब नीतीश ने 2013 में भाजपा से नाता तोड़ा, तो कुशवाहा ने एनडीए का दामन थामा। हालांकि उस दौर के उनके सहयोगी अरूण कुमार कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के साथ जाने के हिमायती थे। नीतीश कुमार के एनडीए में फिर शामिल होने के बाद से कुशवाहा का उहापोह में पड़ना स्वाभाविक था। उन्होंने लालू यादव की तरफ हाथ बढ़ाना शुरू किया। लेकिन भाजपा ने सवाल नहीं खड़ा किया। पार्टी तब चाहती थी कि अगर कुशवाहा अलग होना चाहते हैं, तो खुद अलग हो जाएं।
यही हालत महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की भी है। अटल-आडवाणी युग में विधानसभा में जहां शिवसेना बड़े भाई की भूमिका निभाती थी, वहीं लोकसभा चुनावों में भाजपा। लेकिन मोदी-शाह की भाजपा ने हर जगह खुद को आगे रखा है। उद्धव का गुस्सा इसी वजह से है। इसलिए वह चाहते हैं कि अधिक से अधिक सीटें अगले चुनाव में हासिल कर सकें।
अगर वह भाजपा से अलग होना ही चाहते, तो केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल अपने मंत्रियों को हटाते। लेकिन वह ऐसा नहीं कर रहे हैं। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, वैसे-वैसे एनडीए में ऐसी खींचतान दिखेगी। बेशक पार्टी न झुके, लेकिन इसका असर यह होगा कि गठबंधन की साख पर सवाल उठेगा।