स्नैपडील और फ्लिपकार्ट भारत की दो सबसे बड़ी ऑनलाइन कंपनियां हैं। ऑनलाइन कारोबार की दुनिया में इन कंपनियों की छवि इतनी अच्छी है कि इनकी तुलना अमेरिका की ई-बे और अमेजन जैसी कंपनियों से की जाती है। लेकिन हाल ही में स्नैपडील के युवा मुख्य कार्यकारी कुणाल बहल ने चीन की दिग्गज ई-कारोबार कंपनी अलीबाबा से अपनी कंपनी की बराबरी करने की ठानी है। बावजूद इसके कि इस क्षेत्र में चीन की तुलना में भारत काफी पीछे है। चीन के मुकाबले भारत में आय का स्तर ही निम्न नहीं है, बल्कि क्रेडिट कार्ड और इंटरनेट के इस्तेमाल के मामले में भी यह पीछे है। इसके बावजूद भारत का ई-कारोबार बाजार में संभावनाएं तलाशने के साथ वैश्विक समुदाय को यह आश्वासन देने की कोशिश कर रहा है कि अलीबाबा की कामयाबी यहां भी दोहराई जा सकती है।
निवेश के अवसरों की तलाश में कुणाल बहल ने हाल ही में सिलिकॉन वैली की यात्रा की। शुरू में केवल 400 कर्मचारियों वाली उनकी इस कंपनी में आज 1,300 कर्मचारी हैं, जो भारत के 4,000 से भी ज्यादा कस्बों और शहरों तक अपनी सेवाएं पहुंचा रहे हैं। चार फरवरी, 2010 को जब स्नैपडील डॉटकॉम की शुरुआत हुई थी, तब यह रेस्टॉरेंटो में डिस्काउंट उपलब्ध कराने वाली एक वेबसाइट मात्र थी। पर एक वर्ष बाद नेक्सस वेंचर पार्टनर्स नाम की कंपनी के रूप में इसे पहले भारी-भरकम निवेश का तोहफा मिला। इसके बाद यह भारतीय क्रेताओं और विक्रेताओं के लिए ई-बे जैसा ऑनलाइन बाजार बनकर उभरने लगी। दरअसल, स्नैपडील की सफलता भारत में ई-कारोबार के विकास में मील का पत्थर साबित हुई है। इसकी तुलना भी अक्सर ई-बे से ही की जाती है। वर्ष 2011 से यह कंपनी इंटेल कैपिटल और नेक्सस वेंचर पार्टनर्स जैसे निवेशकों से तकरीबन 20 करोड़ डॉलर का निवेश जुटा चुकी है।
इस क्षेत्र की सबसे बड़ी और भरोसेमंद ब्रोकरेज कंपनी सीएलएसए के मुताबिक, आगामी पांच वर्षों में भारत में ई-कारोबार मौजूदा 3.1 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 22 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाएगा। स्नैपडील की तरह ही बंगलूरू की फ्लिपकार्ट है, जिसकी तुलना पुस्तकों, वस्त्रों और इलेक्ट्रॉनिक सामान की ऑनलाइन बिक्री करने वाली अमेरिकी दिग्गज कंपनी अमेजन से की जाती है। सीएलएसए के मुताबिक, 2020 तक फ्लिपकार्ट का बाजार 70 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है।
भारत में ई-कारोबार से जुड़े इन्हीं आंकड़ों ने निवेशकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। निवेश बैंक एलेग्रो एडवाइजर्स की मई, 2013 की रिपोर्ट बताती है कि पिछले तीन वर्षों में भारत में 53 ई-कारोबार कंपनियों ने तकरीबन 86 करोड़ अमेरिकी डॉलर मुनाफा कमाया है। पिछले कुछ समय से ऑनलाइन बाजार की स्थिति हालांकि अच्छी नहीं है, और कई छोटे-मोटे स्टोर बंद भी हुए हैं, लेकिन विश्लेषकों का यह मानना है कि बड़े खिलाड़ियों के उभरने से ऑनलाइन बिक्री उद्योग की जड़ें मजबूत हो रही हैं।
भारत में इस खेल के दो ही बड़े खिलाड़ी स्नैपडील और फ्लिपकार्ट हैं। 2007 में अपनी स्थापना के बाद से फ्लिपकार्ट तकरीबन 54 करोड़ डॉलर का मुनाफा कमा चुकी है। हालांकि सरकार की ओर से इसकी छानबीन की जा रही है कि अमेरिकी कंपनियों से वेंचर फंड प्राप्त करने वाली फ्लिपकार्ट ने किसी विदेशी निवेश कानून का उल्लंघन तो नहीं किया है। लेकिन भारत के ऑनलाइन बाजार की दुनिया में फ्लिपकार्ट का ब्रांड भरोसे का दूसरा नाम बन गया है। शायद यही वजह है कि मोटोरोला ने विगत छह फरवरी को जब अपना नया फोन भारत में लॉन्च किया, तो उसने ऑनलाइन बिक्री का जिम्मा फ्लिपकार्ट को सौंपा। फ्लिपकार्ट और स्नैपडील, दोनों ही आईपीओ लाने की बात कर चुकी हैं। कई आलोचक यह भी मानते हैं कि ऑनलाइन बाजार के क्षेत्र में भारत की जितनी क्षमता थी, उसका उपयोग किया जा चुका है। इसीलिए भारत में ई-कारोबार की कंपनियां अपनी कमाई भले बढ़ाती रहें, लेकिन इनके नए ग्राहकों की संख्या उस तेजी से नहीं बढ़ रही, जितनी कि ये कंपनियां दावा करती हैं। पर व्यावहारिक धरातल पर इन आशंकाओं की पुष्टि नहीं होती। सच्चाई यह है कि जिस गति से भारतीय मध्यवर्ग फैल रहा है, उतनी ही तेजी से ई-कारोबार करने वाली कंपनियां भी बढ़ रही हैं।
वर्ष 2010 में एक इंटरव्यू में कुणाल बहल ने कहा था कि उनकी कंपनी जल्दी ही श्रीलंका, बांग्लादेश और सिंगापुर में कारोबार फैलाने जा रही है। उनकी यह योजना फिलहाल मुल्तवी है और सारा जोर भारत में व्यापार पर है। सच्चाई यह भी है कि भारत के ऑनलाइन विक्रेता विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचते रहे हैं। भारत सरकार ने सितंबर, 2012 में रिटेल क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दरवाजे खोलने का फैसला तो किया, परंतु ई-कॉमर्स अभी इसके दायरे से बाहर है।
कुछ समय पहले भारतीय बाजार में प्रवेश करने वाली अमेजन की ताजा रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में एफडीआई कानून से जुड़े मुद्दों की लॉबिंग को लेकर अमेरिका काफी पैसा लगा चुका है। हालांकि कंपनी भलीभांति जानती है कि भारत में होने वाले आगामी लोकसभा चुनाव से पहले इस कानून में बदलाव की उम्मीद न के बराबर है। लेकिन विश्लेषक यह भी मानते हैं कि विदेशी ई-कंपनियों के भारत में आने से देसी कंपनियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। उल्टे विविधताओं और जटिलताओं से भरे भारतीय बाजार में देसी कंपनियां फायदे में ही रहेंगी।