यकीनन एक ऐसे आर्थिक मुश्किलों के दौर में, जब हमारा विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घटते हुए 277 अरब डॉलर रह गया है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा एशियाई विकास बैंक जैसी संस्थाओं की ताजा रिपोर्ट कह रही हैं कि भारत के लिए विदेशी मुद्रा की कमाई की राह बहुत कठिन बनी हुई है, तब प्रवासी भारतीयों (एनआरआई) से विदेशी मुद्रा प्राप्ति की उम्मीदें दिखाई दे रही हैं।
विदेशी धरती पर अपनी प्रभावी भूमिका निभाने के बाद एनआरआई भारतीय अर्थव्यवस्था में डॉलर की आपूर्ति बढ़ाने में खासे मददगार हो सकते हैं। यह देखा गया है कि जब भी रुपया कमजोर हुआ है, तब प्रवासी भारतीयों द्वारा स्वदेश भेजे गए धन से उसे मजबूती मिली है और वह स्थिरता की ओर बढ़ा। उल्लेखनीय है कि इस समय दुनिया भर के विभिन्न देशों में कार्यरत लोगों द्वारा स्वदेश धन भेजने के मामले में प्रवासी भारतीय शीर्ष पर हैं। विश्व बैंक की हाल ही में जारी अनुमान रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीयों के 2013 में 71 अरब डॉलर की राशि स्वदेश भेजने की संभावना है। विदेशों में कार्यरत लोगों से धन प्राप्ति के मामले में भारत सबसे आगे है, उसके बाद चीन का स्थान आता है। चीनी प्रवासियों के 60 अरब डॉलर स्वदेश भेजने की संभावना है। वर्ष 2013 में विकासशील देशों में इस तरह आने वाली कुल मुद्रा का एक तिहाई अकेले भारत और चीन के खाते में आएगा।
भारतीय प्रवासियों से सहयोग की नई उम्मीदों के तहत केंद्र सरकार एवं रिजर्व बैंक ने भी प्रवासियों के निवेश के लिए जो आकर्षक कदम उठाए हैं, उनके कारण विदेश में बसे भारतीयों ने अपनी निवेश गतिविधि तेज कर दी है। सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के बैंकों ने अप्रवासी भारतीय जमा खातों (एफसीएनआर) पर ब्याज दरों में वृद्धि की है, ताकि ज्यादा से ज्यादा विदेशी मुद्रा हासिल की जा सके। इस वर्ष मार्च से लेकर सितंबर तक के दौरान कई बैंकों ने अपनी एफसीएनआर जमा दरों में इजाफा किया है। आईसीआईसीआई बैंक अपने एनआरआई ग्राहकों को अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क से तीन फीसदी ज्यादा ब्याज दर की पेशकश कर रहा है। इंडियन ओवरसीज बैंक, देना बैंक तथा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने भी प्रवासियों से जमा प्राप्त करने के लिए अपनी ब्याज दरों में आकर्षक वृद्धि की है।
एनआरआई को रिजर्व बैंक का स्वाइप विंडो की सुविधा प्रदान करने का विचार काफी रास आ रहा है। दरअसल, एनआरआई विदेशी बैंकों से कम ब्याज दरों पर पैसे लेकर उसे एफसीएनआर अकाउंट में ऊंची ब्याज दरों पर जमा करा रहे है। इससे उन्हें काफी लाभ हो रहा है। रिजर्व बैंक ने सितंबर के तीसरे सप्ताह से 30 नवंबर तक एनआरआई के लिए स्वाइप विंडो की सुविधा उपलब्ध कराई है, जिसके तहत रिजर्व बैंक ने एफसीएनआर डिपॉजिट पर देय ब्याज को फ्री कर दिया है। एनआरआई लगातार इस सुविधा का लाभ उठा रहे हैं। मसलन अगर कोई एनआरआई लंदन में रह रहा है, तो उसे भारत में एफसीएनआर पर पांच वर्ष के लिए 5.5 फीसदी और तीन वर्ष के लिए 4.7 फीसदी ब्याज मिल रहा है। चूंकि ब्रिटेन और अन्य विकसित देशों में कर्ज पर ब्याज दर कम है। इसलिए प्रवासी भारतीय उन देशों में ओवर ड्रॉफ्ट करके स्वाइप विंडो का उपयोग करके इसका लाभ ले रहे हैं।
वस्तुतः विदेशों में रह रहे भारतीय कारोबारियों, वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और उद्योगपतियों की प्रभावी भूमिका दुनिया के विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं में सराही जा रही है। प्रवासी भारतीय विकसित देशों के सबसे महत्वपूर्ण विकास सहभागी बन गए हैं। यह सर्वविदित तथ्य है कि पूरी दुनिया में प्रवासी भारतीयों और विदेशों में कार्य कर रही भारत की नई पीढ़ी की श्रेष्ठता को स्वीकार्यता मिली है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा सहित दुनिया के कई राष्ट्र प्रमुखों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं में प्रवासी भारतीयों के योगदान का कई बार उल्लेख किया है। यह बराबर कहा गया है कि आईटी, कंप्यूटर, मैनेजमेंट, बैंकिंग, वित्त के क्षेत्र में दुनिया में भारतीय प्रवासी सबसे आगे हैं। उल्लेखनीय है कि चीन सहित दुनिया के अधिकांश विकसित और विकासशील देशों का नया जनसांख्यिकी परिदृश्य कामकाजी आबादी में अपरिहार्य गिरावट का स्पष्ट संकेत दे रहा है और इन देशों में कामकाजी आबादी कम हो गई है। जबकि भारत की जनसंख्या में करीब पचास प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा उन लोगों का है, जिनकी उम्र पच्चीस साल से कम है। ऐसे में भारत की युवा आबादी मानव संसाधन के परिप्रेक्ष्य में दुनिया के विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं में अपनी सहभागिता बढ़ाकर भारत की ओर अमूल्य विदेशी मुद्रा भेजकर देश के लिए आर्थिक वरदान सिद्ध हो सकती है।
यदि हम चाहते हैं कि प्रवासी भारतीय भारत की ओर विदेशी मुद्रा के प्रवाह में भारी वृद्धि करें, तो हमें ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जिससे प्रवासियों के प्रति सांस्कृतिक सहयोग और स्नेह बढ़े। यदि हम चाहते हैं कि अब विदेश जाने वाली भारतीय प्रतिभाएं विदेशों में कमाई करके भारत की ओर विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ाएं, तो हमें प्रतिभाओं को तराशने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे। देश के शैक्षणिक संस्थानों में इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट जैसे प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों में पढ़ाई करने वाले युवाओं को वैश्विक रोजगार बाजार की नई जरूरतों के मुताबिक सुसज्जित करना होगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केंद्र सरकार ऐसी नीतियों को लागू करने को पूरी तरह तैयार है।