दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका ने चीन के च्यांग काई-शेक का साथ दिया था। च्यांग 1930 के दशक में चीन पर हमला करने वाले जापानी फासीवादियों के खिलाफ लड़ रहे थे। रूजवेल्ट प्रशासन को उम्मीद थी कि च्यांग के नेतृत्व वाला राष्ट्रवादी चीन, युद्ध के बाद अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ के साथ मिलकर दुनिया की चार बड़ी शक्तियों, यानी ‘बिग फोर’ में शामिल होगा। पर, जब 1946-1949 के गृहयुद्ध में माओ जेडोंग के नेतृत्व में चीनी कम्युनिस्टों को जीत मिली, तो वाशिंगटन हैरान रह गया। अमेरिका इस बात से भी नाराज था कि अब सोवियत संघ और चीन, दोनों कम्युनिस्ट शासन के अधीन आ गए थे। किसी न किसी को तो इसके लिए जिम्मेदार ठहराना ही था। यहीं से अमेरिका में यह बहस शुरू हुई कि आखिर ‘चीन को किसने खोया?’, जो 1950 के दशक के ‘रेड स्केयर’ (कम्युनिस्टों के डर) का अहम हिस्सा थी। जिन अधिकारियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया, उन्होंने ही दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान चेतावनी दी थी कि चीनी कम्युनिस्ट सैन्य जीत हासिल कर सकते हैं। उस समय उनकी बात अनसुनी कर दी गई थी। आरोप लगाया गया कि राष्ट्रवादियों को पर्याप्त समर्थन न देने के कारण ही च्यांग सत्ता से बाहर हुए। यह सोच कि अमेरिकी विदेश विभाग 55 करोड़ लोगों के देश में कम्युनिस्टों को सत्ता पर कब्जा करने से रोक सकता था, अमेरिकी शक्ति की सीमाओं को समझने में बड़ी भूल थी।
1950 के दशक में अमेरिकी विदेश विभाग के चीन मामलों के विशेषज्ञों को हटाने का सिलसिला 1960 के दशक तक चलता रहा। चीन मामलों के विशेषज्ञों की अनदेखी के कारण वियतनाम युद्ध को भी बढ़ावा मिला। आखिरकार, 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर ने चीन के साथ राजनयिक संबंधों की शुरुआत की और ‘चीन किसने खोया’ वाली बहस खत्म हो गई। अब चीन सोवियत संघ के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने वाला एक भू-राजनीतिक मोहरा बन चुका था। निक्सन और किसिंजर की यह सोच 1989 तक बनी रही। 1990 के दशक में चीन की आर्थिक और तकनीकी तरक्की ही वह वजह थी, जिसके कारण अमेरिका को उसे एक बड़ी ताकत के तौर पर देखना पड़ा। जियांग जेमिन और उनके डिप्टी झू रोंगजी इतने प्रभावशाली थे कि डेमोक्रेट और रिपब्लिकन, दोनों को लगा कि अगर चीन को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में शामिल किया गया, तो वह एक पूंजीवादी और उदार समाज की ओर बढ़ेगा। राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भी यही मानते थे और वह ऐसा सोचने वाले अकेले नहीं थे। शीत युद्ध की शानदार समाप्ति से उत्साहित अमेरिकी अधिकारियों को लगा कि चीन भी यूरोप की तरह लोकतंत्र और आजादी की राह पर आगे बढ़ेगा। पर, चीन यूरोप नहीं था। डब्ल्यूटीओ में शामिल होने के बाद वह जिनपिंग के नेतृत्व में तानाशाही की ओर मुड़ गया।
इनमें से हर गलती की अपनी खास वजहें हैं। ये गलतियां चीन के आकार, जटिलता और पूरी तरह से अलग संस्कृति से भी जुड़ी हैं। दोनों देशों के रिश्तों में स्थिरता लाने वाली सबसे अहम व्यवस्था ताइवान को लेकर जानबूझकर बनाई गई रणनीतिक अस्पष्टता है। इसकी नींव निक्सन की चीन यात्रा के दौरान पड़ी और इसे ‘शंघाई कम्युनिक’ (शंघाई विज्ञप्ति) के नाम से जाना गया। उस फॉर्मूले का मतलब था कि चीन एक ही है और उसकी राजधानी बीजिंग है, पर कोई भी पक्ष ताइवान की मौजूदा स्थिति को हिंसक तरीके से बदलने की कोशिश नहीं करेगा। 1972 के बाद पहली बार शंघाई कम्युनिक पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। पहले भी कुछ गलतियां हुई हैं। फिर भी, ज्यादातर अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने अपने बयानों में संयम बरता है। ट्रंप प्रशासन में ऐसा नहीं रहा। ताइवान व एशिया-प्रशांत क्षेत्र को लेकर ट्रंप का रुख लगातार बदलता रहा है। चीन में अब शी जिनपिंग का शासन है, जो लेनिनवादी शैली की केंद्रीकृत सत्ता चलाते हैं और ताइवान को लेकर खुले तौर पर आक्रामक रुख रखते हैं।
अमेरिका फिर उसी ‘चीन किसने खोया’ वाले दौर में लौट आया है, जहां बुनियादी गलतियां हो सकती हैं। ऊपर से एआई को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा दोनों देशों के रिश्तों को और अस्थिर कर सकती है। सबसे बड़ी भू-राजनीतिक तबाही तब होगी, जब ताइवान या दक्षिण चीन सागर को लेकर सैन्य संघर्ष शुरू हो जाए। जैसा कि येल के चीन विशेषज्ञ ऑड अर्ने वेस्टैड बताते हैं, 1914 में जर्मनी को लगा था कि ब्रिटेन शायद अपने सहयोगियों की मदद के लिए आगे नहीं आएगा। यह सोच प्रथम विश्वयुद्ध शुरू होने की एक वजह बनी। इसी तरह, अगर चीन को लगे कि अमेरिका ताइवान की मदद के लिए आगे नहीं आएगा, तब भी युद्ध का खतरा बढ़ सकता है। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में होने वाला कोई बड़ा सैन्य संघर्ष महत्वपूर्ण वैश्विक आपूर्ति शृंखला को तहस-नहस कर सकता है और दुनिया को पूरी तरह बदल सकता है। इसकी तुलना प्रथम विश्वयुद्ध से करना अतिशयोक्ति नहीं होगी।
दूसरा विश्वयुद्ध खत्म होते ही कम्युनिज्म ने अमेरिका के मुख्य दुश्मन की भूमिका ले ली। आज फिर कम्युनिज्म को लेकर चर्चा तेज है, क्योंकि चीन सैन्य, आर्थिक और एआई, तीनों क्षेत्रों में अमेरिका को पीछे छोड़ने की दिशा में बढ़ रहा है। भ्रम यह है कि ताइवान और अमेरिका के दूसरे एशियाई सहयोगियों की सुरक्षा पर नरम रुख अपनाने से युद्ध टाला जा सकता है। लेकिन, ऐसा रुख चीन को ताइवान पर हमला करने के लिए उकसा सकता है और पूरे प्रशांत क्षेत्र के भविष्य को गंभीर खतरे में डाल सकता है। अमेरिका और चीन, दोनों को एक-दूसरे के सामने अपना रुख साफ रखना चाहिए। प्रथम विश्वयुद्ध की एक वजह एक-दूसरे के इरादों को गलत समझना भी थी। ट्रंप का बदलता रुख अमेरिका और चीन के बीच गलतफहमी बढ़ा सकता है, जिससे युद्ध का खतरा बढ़ सकता है।
आज दुनिया में अमेरिका और चीन के बीच संभावित भू-राजनीतिक टकराव जितनी ताकत किसी दूसरे संघर्ष में नहीं है। अगर इस टकराव का गलत आकलन हुआ, तो इसके परिणाम पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी हो सकते हैं। करीब 75 साल पहले चीन ने अमेरिकी घरेलू राजनीति में बड़ी उथल-पुथल मचा दी थी। इस बार उसके परिणाम उससे कहीं ज्यादा गंभीर हो सकते हैं।
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