सर्वोच न्यायालय का आदेश क्या आया, कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी कोठियों में रहने का अधिकार नहीं है, फौरन बहानों की लंबी सूची तैयार हो गई। मायावती ने लखनऊ में अपनी आलीशान कोठी के गेट से अपना नाम हटाकर कांशीराम संग्रहालय की तख्ती लगा दी। अखिलेश यादव से जब पत्रकारों ने पूछा कि वह अपनी कोठी कब खाली करेंगे, तो उन्होंने मुस्कराते कहा कि ऐसा तभी करेंगे, जब उनको और उनके पिता को कोई दूसरी जगह मिल जाएगी।
इस यादव परिवार के पास न धन की कमी है और न लखनऊ में पांच सितारा होटलों की कमी है, लेकिन ऐसे सवाल हम अपने राजनेताओं से नहीं करते। अपने समाजवादी देश में परंपरा है कि राजनेताओं के आवास के खर्च हम तब तक उठाते रहेंगे, जब तक इस दुनिया में वे रहें। यह गलत परंपरा है। अन्य लोकतांत्रिक देशों में ऐसा नहीं होता, लेकिन हमारे लोग इतने दयालु हैं, या शायद इतने लाचार, कि यह मुद्दा कभी किसी आम चुनाव में मुद्दा बना ही नहीं है।
सो दिल्ली में पूर्व प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों के लिए भारतीय करदाता सरकारी कोठियों का खर्च उठाते हैं और राज्यों की राजधानियों में पूर्व मुख्यमंत्रियों का। राजस्थान सरकार ने तो हाल में कानून पारित किया, जिसके तहत पूर्व मुख्यमंत्री बेघर कभी नहीं होंगे। इसके अलावा उनके कुछ नौकरों और खर्च का भी बोझ भी राजस्थान की जनता उठाने पर अब कानूनी तौर पर मजबूर होगी। इस गलत परंपरा में परिवर्तन लाने की आवश्यकता आप तब समझेंगे, जब ध्यान रखेंगे कि देश के अधिकतर लोगों के लिए आवास का मतलब है इतना छोटा घर कि एक अनुमान के मुताबिक, 33 फीसदी भारतीयों के घर अमेरिकी जेलों में कैदियों के कमरों से छोटे हैं।
गांवों में अगर पूरा परिवार दस फुट बाई दस फुट के घरों में गुजारा करते हैं, तो मुंबई के 60 प्रतिशत लोग झुग्गी बस्तियों में रहते हैं। जो झुग्गी का किराया-पगड़ी दे सकते हैं, उनको मुंबई के लोग अच्छी किस्मत वाले इसलिए मानते हैं, क्योंकि हजारों लोग फुटपाथों पर जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हैं। समाजवाद के नाम पर भारत का ऐसा हाल हुआ है।
सो जब नरेंद्र मोदी को देश के मतदाताओं ने पूर्ण बहुमत देकर दिल्ली भेजा था चार वर्ष पहले, तो आशा थी कि इन गलत परंपराओं में परिवर्तन लाने का काम वह करेंगे। शुरुआत दिल्ली से की जा सकती थी, जहां केंद्र सरकार के मंत्री और आला अधिकारी ऐसी कोठियों में रहते हैं, जिनका मासिक किराया बाजार में आज 10 लाख रुपये से कम नहीं है। मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के कुछ महीनों बाद मैंने उनके एक वरिष्ठ मंत्री से पूछा था कि सरकारी आवास उपलब्ध करने की परंपरा कब समाप्त करेंगे मोदी, तो उनका जवाब था, 'अभी नहीं। अगली बार जब जीतेंगे, तब इस किस्म के परिवर्तन लाए जाएंगे।’
पिछले सप्ताह कैराना हारने के बाद यह भी तय नहीं है कि जनता भाजपा को दूसरा मौका देगी भी।
कैराना में हार हुई है गोरखपुर और फूलपुर हारने के बाद। सो ऐसा लगने लगा है कि उत्तर प्रदेश के लोग एक वर्ष के अंदर ही निराश हो गए हैं योगी आदित्यनाथ की सरकार से। क्या कैराना की हार के बाद योगी ऐसा कोई कदम उठाने को तैयार होंगे, जिससे साबित होने लगे कि परिवर्तन लाने के लिए वह पूरा प्रयास कर रहे हैं? सरकारी कोठियां अगर पूर्व मुख्यमंत्रियों से वापस लेने का काम करते हैं योगी, तो कम से कम संदेश तो जाएगा जनता में कि वास्तव में परिवर्तन लाने के लिए वह प्रतिबद्ध हैं।