प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के चार वर्षों की समीक्षा हो चुकी है। पक्ष और विपक्ष, दोनों की बातें सामने आ चुकी हैं। एक बात तो जाहिर है और वह है कि सरकार का रिकॉर्ड मिला-जुला रहा, लेकिन सौ टके का सवाल है कि चुनाव पूर्व जितनी घोषणाएं और वायदे किए गए थे, उनमें कितने 2019 के लोकसभा चुनाव तक पूरे हो पाएंगे? अब व्यावहारिक रूप से प्रधानमंत्री मोदी के पास सिर्फ दस महीने ही रह गए हैं। इन दस महीनों में उन्हें उन तमाम योजनाओं और कार्यक्रमों का लेखा-जोखा देना होगा।
इनमें कई तो ऐसे हैं, जो शुरू तो हुए बहुत धूम-धाम से लेकिन आगे नहीं बढ़ पाए। इसलिए अब वक्त है कार्यान्वयन का और बड़े कदम उठाने का। इन चार वर्षों की एक खास बात यह रही कि सरकार ने जल्दबाजी में कोई भी कदम नहीं उठाया और न ही लोकप्रिय कदमों का सहारा लिया। अब हालात बदल गए हैं और चुनाव के मद्देनजर सरकार को शायद ऐसे कदम उठाने पड़ सकते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी के कार्यक्रम दो श्रेणियों में रखे जा सकते हैं। एक तो वे हैं, जो केंद्र सरकार चला रही है और दूसरी वे हैं जिनका दारोमदार राज्य सरकारों पर हैं। ये वे परियोजनाएं या कार्यक्रम हैं, जो केंद्र सरकार के धन से राज्य सरकारें चलाती हैं। इनमें दोनों की भागीदारी होती है। इस समय देश में 135 सरकारी योजनाएं चल रही हैं और इनमें कई ऐसी हैं, जो पिछली सरकारों द्वारा शुरू की गई थीं। मोदी की योजनाओं में प्रधानमंत्री जन धन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना, अटल पेंशन योजना, उज्जवला योजना, स्वच्छ भारत मिशन वगैरह काफी चर्चा में रही हैं। इनके लिए केंद्र सरकार ने काफी धन का प्रावधान किया और इनका काफी प्रचार भी कर रही है।
आने वाले वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़ोतरी की दर 7.5 प्रतिशत हो सकती है, जो प्रधानमंत्री मोदी के प्रगति के दावे को मजबूत करेगी। जीडीपी में बढ़ोतरी से एनडीए सरकार को बल मिलेगा। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से हमारी अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ने लगा है और यह जारी रहेगा। इससे राजकोषीय और चालू घाटा दोनों ही बढ़ जाएंगे। यह सरकार के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द होने जा रहा है, क्योंकि हमारे निर्यात में कोई बढ़ोतरी होती नहीं दिख रही है।
दुनिया के कुल व्यापार में भारत का योगदान बहुत ही कम है और अगले एक साल में इसके बढ़ने की संभावना कम ही है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को अगले चुनाव में जिस सवाल का जवाब देना मुश्किल होगा, वह है कितने लोगों को रोजगार दे पाए वह? उन्होंने वायदा किया था कि वह हर साल एक करोड़ लोगों को रोजगार मुहैया करवाएंगे, लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है। भारत में बेरोजगारी की दर हर महीने बढ़ती दिख रही है। अप्रैल महीने में तो यह बढ़कर 7.25 प्रतिशत हो गई थी। इसका समाधान तभी संभव है, जब देश में निजी निवेश बढ़े और यह तुरंत नहीं हो सकता है।
एक सवाल यहां उठ रहा है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी अपने पांच वर्ष के लक्ष्यों को बढ़ाकर 2022 तक ले जा रहे हैं? उन्होंने पहले भी कहा था कि वह 2022 तक सभी को घर देंगे। अब वह कई और योजनाओं के बारे में 2019 के बजाय 2022 की बात कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनके रणनीतिक सलाहकारों ने उन्हें भविष्य की योजना बनाकर दे दी है। उन्हें पता है कि आने वाले एक वर्ष में ऐसी कोई उपलब्धि नहीं हो पाएगी कि मोदी उसका बखान कर सकें। वह उन योजनाओं के बारे में ही लंबी-चौड़ी बातें करेंगे, जो पूरी तरह से सफल नहीं हुई हैं, लेकिन उसके करीब हैं। मसलन, स्वच्छ भारत और बेटी बचाओ वगैरह या फिर उज्जवला योजना।
दरअसल केंद्र सरकार और मोदी की समस्या यह भी है कि 20 राज्यों में भाजपा या उसके गठबंधन की सरकारें होने के बावजूद बहुत-सी योजनाओं के कार्यान्वयन में उतनी सफलता नहीं मिल पाई है, जितनी अपेक्षित है। भारतीय संविधान के मुताबिक केंद्र सरकार को अपनी योजनाओं के कार्यान्वयन में राज्यों की आर्थिक मदद करनी चाहिए। केंद्र ने ऐसा ही किया है, लेकिन इसके बावजूद कई राज्य कार्यक्रम कार्यान्वयन में पिछड़ गए हैं। कुछ ही राज्य ऐसे हैं, जो ईमानदारी से इसका पालन कर पा रहे हैं।
इस मामले में सिक्किम जैसा राज्य सक्रिय रहा है और उसने प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी महत्वाकांक्षी योजना का सफलता से निर्वाह किया है। इसी तरह जननी सुरक्षा योजना और वृद्धावस्था पेंशन जैसी योजनाएं पूर्वोत्तर ही नहीं, देश के अन्य राज्य अभी काफी पिछड़े हुए हैं, सिक्किम काफी आगे है और उसने 300 से 500 प्रतिशत ज्यादा पेंशन देना जारी रखा है। अगर अन्य राज्यों का लेखाजोखा लें, तो स्वच्छ भारत मिशन में बिहार ने बहुत सफलता पाई है, जबकि उत्तर प्रदेश ने जन धन योजना तथा कौशल विकास योजना में काफी काम किया है।
उत्तर प्रदेश ने ग्राम सड़क योजना तथा ग्राम ज्योति योजना में काफी बेहतर काम किया है। ग्राम सड़क योजना में मध्य प्रदेश, राजस्थान और ओडिशा ने भी काफी काम किया है। स्टार्ट अप योजना में भाजपा शासित राज्यों से बेहतर काम दूसरे राज्यों मसलन कर्नाटक, तेलंगाना, सिक्किम, दिल्ली में हुआ। सिर्फ महाराष्ट्र और कुछ हद तक गुजरात ने भाजपा की इज्जत बचाई।
प्रधानमंत्री मोदी के सामने यह बहुत बड़ी चुनौती है कि वह कैसे अपने कार्यक्रमों और मिशन को तेजी से आगे बढ़ाएं। इसके लिए उन्हें राज्य सरकारों की मदद चाहिए। नीतियों के कार्यान्वयन में राज्यों की बड़ी भूमिका होती है और अगर वे केंद्र के साथ कदम से कदम मिलाकर चले तो ही बचे हुए दस महीनों में प्रधानमंत्री मोदी के लिए सकारात्मक माहौल बन पाएगा। इसके अलावा जरूरी है कि बढ़ती हुई बेरोजगारी पर अंकुश लगाया जाए। यह जीत के मार्ग की बहुत बड़ी बाधा है।