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भंग-व्यंग्य: भंग पीसना एक कला है, कविता है... पीने के पहले शंकर भगवान की तारीफ में छंद सुनाए जाएं और...

श्रीलाल शुक्ल, कालजयी उपन्यासकार और साहित्यकार Published by: ज्योति भास्कर Updated Fri, 14 Mar 2025 03:36 AM IST

सार

भंग को इतना पीसा जाए कि लोढ़ा और सिल चिपक कर एक हो जाएं, पीने के पहले शंकर भगवान की तारीफ में छंद सुनाए जाएं और उसे व्यक्तिगत न बना कर सामूहिक रूप दिया जाए।
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भांग - फोटो : Adobe Stock


सनीचर का काम वैद्य जी की बैठक में भंग के इसी सामाजिक पहलू को उभारना था। इस समय भी वह रोज की तरह भंग पीस रहा था। उसे किसी ने पुकारा, 'सनीचर!' सनीचर ने फुंफकार कर फन-जैसा सिर ऊपर उठाया। वैद्य जी ने कहा, 'भंग का काम किसी और को दे दो और यहां अंदर आ जाओ।' जैसे कोई उसे मिनिस्टरी से इस्तीफा देने को कह रहा हो। वह भुनभुनाने लगा, 'किसे दे दें? कोई है इस काम को करनेवाला? आजकल के लौंडे क्या जानें इन बातों को। हल्दी-मिर्च-जैसा पीस कर रख देंगे।' पर उसने किया यही कि सिल-लोढ़े का चार्ज एक नौजवान को दे दिया, हाथ धोकर अपने अंडरवियर के पीछे पोंछ लिए और वैद्य जी के पास आकर खड़ा हो गया। तख्त पर वैद्य जी, रंगनाथ, बद्री पहलवान और प्रिंसिपल साहब बैठे थे। प्रिंसिपल एक कोने में खिसक कर बोले, 'बैठ जाइए सनीचरजी!'


इस बात ने सनीचर को चौकन्ना कर दिया। परिणाम यह हुआ कि उसने टूटे हुए दांत बाहर निकाल कर छाती के बाल खुजलाने शुरू कर दिए। वह बेवकूफ-सा दिखने लगा, क्योंकि वह जानता था चालाकी के हमले का मुकाबला किस तरह किया जाता है। बोला, 'अरे प्रिंसिपल साहेब, अब अपने बराबर बैठा कर मुझे नरक में न डालिए।' बद्री पहलवान हंसे। बोले, '...गंजहापन झाड़ते हो! प्रिंसिपल साहब के साथ बैठने से नरक में चले जाओगे? बैठ जाओ उधर।'


वैद्य जी ने शाश्वत सत्य कहने वाली शैली में कहा, 'इस तरह से न बोलो बद्री। मंगलदास जी क्या होने जा रहे हैं, इसका तुम्हें कुछ पता भी है?' सनीचर ने बरसों बाद अपना सही नाम सुना था। वह बैठ गया। वैद्य जी ने कहा, 'तो प्रिंसिपल साहब, कह डालो, जो कहना है।' उन्होंने अवधी में कहना शुरू किया, 'कहै का कौनि बात है? आप लोग सब जनतै ही।' फिर अपने को खड़ी बोली की सूली पर चढ़ा कर बोले, 'गांव-सभा का चुनाव हो रहा है, यहां का प्रधान बड़ा आदमी होता है। वह कॉलिज-कमेटी का मेंबर भी होता है-एक तरह से मेरा भी अफसर।' वैद्य जी ने अकस्मात कहा, 'सुनो मंगलदास, इस बार हम लोग गांव-सभा का प्रधान तुम्हें बनाएंगे।'


सनीचर का चेहरा टेढ़ा-मेढ़ा होने लगा। उसने हाथ जोड़ दिए-पुलक गात लोचन सलिल। किसी गुप्त रोग से पीड़ित के पास मेडिकल एसोसिएशन का चेयरमैन बनने का परवाना आ जाए तो उसकी क्या हालत होगी? वही सनीचर की हुई। फिर अपने को काबू में करके उसने कहा, 'अरे नहीं महाराज, मुझ जैसे नालायक को आपने इस लायक समझा, इतना बहुत है। पर मैं इस इज्जत के काबिल नहीं हूं।' बद्री पहलवान ने कहा, 'अबे, अभी से मत बहक। ऐसी बातें तो लोग प्रधान बनने के बाद कहते हैं। इन्हें तब तक के लिए बांधे रख।' इतनी देर बाद रंगनाथ बातचीत में बैठा। सनीचर का कंधा थपथपा कर उसने कहा, 'लायक-नालायक की बात नहीं है सनीचर! हम मानते हैं कि तुम नालायक हो, पर उससे क्या? प्रधान तुम खुद थोड़े ही बन रहे हो। वह तो तुम्हें जनता बना रही है। जनता जो चाहेगी, करेगी। तुम कौन हो बोलने वाले?'                    


(राग दरबारी का एक अंश)
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