ब्रज की होली रास-रंग के लिए मशहूर है, तो बरसाने की लठमार होली की दुनिया भर में धूम है। फिर कुमाऊं की बात करें, तो यहां होली गाने की अनूठी परंपरा है। इस परंपरा का रंग इतना गहरा है कि देश भर में होली आने के कई दिन पहले से ही गीत-संगीत की महफिलें सजने लगती हैं।
पिछले दिनों जब मैंने एक कार्यक्रम में 'होली खेलो मो से नंदलाल'... गाया, तो तालियों की गड़गड़ाहट से पुरानी यादें ताजा हो गईं। फिर से एक बार होली के रंग ने मन को लोकरंग से रंग दिया। ठुमरी में होली का यह गीत आज भी लोगों को होली के रंग में डुबो देता है। वह समय ही कुछ और था, जब होली के रंगों में देसी रागों से सजे गीतों से असली रंग भरा जाता था।
फिर असल बात तो यह है कि आप चाहें ठुमरी गाएं, चैता गाएं या कजरी, राग कोई भी हो, उसमें भाव का रंग आना चाहिए। होली को खुशनुमा बनाने के लिए रास और रंग के साथ जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है, वह भाव ही है। शास्त्रीय गायन में इसका बहुत महत्व है। हमारे यहां की सबसे अच्छी बात यही है कि हर काम में विविधता है।
इसी तरह होली भी अलग-अलग जगहों पर विभिन्न तरीके से मनाई जाती है। लेकिन कुमाऊं वाली परंपरा हर जगह मौजूद है यानी हर जगह अलग-अलग तरह से होली गाई भी जाती है। कहीं पर ख्याल गाते हैं, तो कहीं ठुमरी। दिलचस्प यह है कि रंगों के इस उत्सव में हर जगह गीतों के भी अपने ही रंग हैं। पंजाब में होली अलग तरह से गाई जाती है, महाराष्ट्र में अलग तरह से और बंगाल में कुछ और ही अंदाज देखने को मिलता है।
हम जब गायन सीखते थे, तो एक-एक चीज पर मेहनत होती थी। कैसे आलाप लेना है, कहां ठहरना है और कहां बढ़ना है। तब जाकर एक मुकम्मल शास्त्रीय गायक तैयार होता था। अब समय बहुत बदल चुका है। होली के इन लोकगीतों की महफिलों में अक्सर इस बदलते समय की संस्कृति को देखकर भी चिंता होती है। आज के लोगों को शास्त्रीय की बजाय, धूम-धड़ाके वाला संगीत ज्यादा पसंद आने लगा है। पॉप, रैप पर युवाओं को थिरकना अच्छा लगता है। इसी में होली के गीत भी शामिल हो गए हैं।
हर ओर पहनावा और खान-पान से लेकर संगीत तक सब कुछ बदल चुका है। हमने जिस संगीत को अपनी मेहनत से संवारा उसके कद्रदान कम हो गए हैं। इस चीज को रोका भी नहीं जा सकता है, क्योंकि यह समय के अनुसार होने वाला परिवर्तन है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि 'रंग डारूंगी नंद के लालन पे'... जैसे गीतों को सुनने वाले कम हो गए हैं।
अच्छी बात यह है कि हमारे गांवों में आज भी सादी होली मनाई जाती है, जहां चैता, ठुमरी, कजरी जैसे रंगों से होली को सजाया जाता है। अब उम्र हो चुकी है, इसलिए मैं ज्यादा देर तक गा नहीं सकती। चूंकि राग बदलते रहते हैं, भाव भी बदलता है और अगर होली गीत में साहित्य के अनुसार भाव न बदलें, तो लुत्फ नहीं आता। हम आज भी उसी देसी परंपरा के पोषक हैं, जो हमारी जान है। वृंदावन की होली तो आज भी मशहूर है, जिसकी सबसे बड़ी वजह इसका पारंपरिक स्वाद जस का तस होना है।