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उनके सवालों के जवाब समय खोजेगा

Thu, 10 Oct 2013 07:13 PM IST
कुमार प्रशांत
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जयप्रकाश होते, तो आज अपने जन्मदिन 11 अक्तूबर को 111 वर्ष के हो जाते। वह नहीं चाहते थे कि वह इतनी लंबी आयु जिएं। अपने आखिरी दिनों में यह श्लोक जैसे उनकी जुबान पर बस ही गया था - मुहूर्तम् ज्वलितम् श्रेयम / न च धूमायितम चिरम् - एक पल को कौंध कर अंधेरे को हटा दूं, बस!... धुआंती लकड़ी की तरह चिरकाल बने रहना भी क्या कोई जीवन है।
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'तब तक जियूं, जब तक कुछ कर सकूं। जब कुछ करने की हालत न बचे, तब जीना भी क्या!' पूछा, लेकिन गांधीजी तो 125 साल तक जीने की चाह रखते थे! एक फीकी-सी हंसी के साथ बोले, तभी तो वह बापू थे!

लेकिन न गांधी सामान्य आदमी थे, न जयप्रकाश!

जनता पार्टी की सरकार बनते ही जयप्रकाश ने दो निर्णय किए, एक घोषित और दूसरा अघोषित। घोषित यह कि इस सरकार को मैं एक साल का वक्त देता हूं कि यह वे वायदे पूरे करे, जो जनता से किए हैं। इस अवधि में मैं सरकारी कामकाज पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। दूसरा अघोषित फैसला यह कि किसी राजनीतिक कारण से दिल्ली नहीं जाऊंगा।
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दोनों के बारे में हमारी गंभीर आपत्ति थी- अवसरवादियों को जड़ जमाने का मौका देना कहां की समझदारी है? दिल्ली जब एकदम ही डगमगाने लगी, तब कई थे, जो दौड़-दौड़कर पटना जा रहे थे कि किसी तरह उन्हें दिल्ली ले जाएं। हर दूसरे दिन चलने वाली डायलिसिस की दिक्कत याद दिलाकर वह दिल्ली खारिज कर देते थे।

लेकिन न वक्त रुका और न बिगड़ते हालात। 1978 का मई महीना था। जयप्रकाश ने मौन तोड़ा। पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर को पत्र लिखा, 'लोकसभा के चुनाव के समय जनता में जो अभूतपूर्व उत्साह का संचार हुआ था, वह ठंडा पड़ गया है और निराशा की भावना बढ़ रही है... जनतंत्र को लोक-सम्मति और लोक-सहकार का व्यापक आधार देना जरूरी है, क्योंकि इसके बिना इसकी जड़ें मजबूत नहीं हो सकती हैं। अगर ऐसा करने के रास्ते में पुराना प्रशासनिक दृष्टिकोण, नियम या कार्य-पद्धति आड़े आती हो, तो उन्हें बदल डालना चाहिए...'

इस लंबे पत्र का अंत करते हुए वह चेतावनी की भाषा में लिखते हैं, 'इस अवसर को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा या आग्रह के कारण खो देना, जनता के साथ विश्वासघात होगा... इन बातों पर अगर आगे किसी चर्चा की जरूरत हो, तो आज की मेरी शारीरिक मर्यादा के बाद भी, मेरी सेवाएं उपलब्ध हैं।' लेकिन तब वह सेवा किसे चाहिए थी।

साल भर की अवधि पूरी होते ही एक मार्च, 1979 को जयप्रकाश ने प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को लंबा पत्र लिखा, 'मैं निराशावादी नहीं रहा हूं। मेरे क्रांतिकारी आदर्शवाद ने मुझे निराशा से भी दूर रखा है और वास्तविकताओं से कटने भी नहीं दिया... मैं यह देखकर चिंतित हूं कि जनता की उभरी हुई आकांक्षाओं का ऊंचा ज्वार अब घोर निराशा के भाटे का रूप ले रहा है। मैंने जनता से कहा था कि वह इस सरकार को कम-से-कम एक साल का वक्त दे... वह अवधि पूरी हुई। आपको स्मरण होगा कि जिस आंदोलन ने जनता पार्टी को जन्म दिया और उसे चुनाव में विजयी बनाया, उसी आंदोलन ने जनता को सिखाया है कि अगर वह महसूस करती है कि उसके प्रतिनिधि काम नहीं कर रहे हैं, तो वह पांच साल की अवधि समाप्त होने से पूर्व ही अपनी आवाज बुलंद करे... हमारी असफलताओं के मूल में भ्रष्टाचार है। इसलिए भ्रष्टाचार से लड़ाई को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की जरूरत है।

जनता पार्टी के नेताओं, सांसदों, विधायकों की एक आचार संहिता होनी ही चाहिए... मैं आर्थिक विकेंद्रीकरण में विश्वास रखता हूं... सामाजिक क्षेत्र में बहुत काम बाकी है। हरिजनों पर लगातार हो रहे अत्याचारों ने जनता पार्टी को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। सांप्रदायिकता फिर सिर उठा रही है... इस लंबे पत्र के अंत में उन्होंने लिखा, 'यद्यपि यह पत्र मैंने आपको ही लिखा है, लेकिन अगर आप चाहें, तो इसे अपने सहकर्मियों के साथ साझा कर सकते हैं।'

किसे ऐसा पत्र साझा करना था! लेकिन आज, उनके जन्मदिवस पर हम देख रहे हैं कि देश में जगह-जगह इस पत्र जैसी प्रतिध्वनि ही उठ रही है। जवाब न तब कहीं से आया था, न अब आ रहा है। लेकिन गांधी हों कि जयप्रकाश, उनकी सिफत यह है कि उनके सवालों के जवाब इतिहास खोजता है।
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