जुलाई की शुरुआत में, जब जंतर-मंतर पर छात्रों का विरोध-प्रदर्शन आकार ले रहा था, तब तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा उन शुरुआती राजनेताओं में से थीं, जिन्होंने प्रदर्शन स्थल पर पहुंचकर छात्रों का समर्थन किया। प्रदर्शन के तीन सप्ताह बाद, जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया, तब मोइत्रा ने युवा पीढ़ी का आभार जताते हुए कहा कि उन्होंने ‘भारतीय लोकतंत्र को बचाने’ का काम किया है और सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। जिस काम को पिछले 12 साल में विपक्षी दल नहीं कर पाए थे, वह युवाओं ने कर दिखाया।
यह कहना जल्दबाजी होगी कि छात्रों के इस आंदोलन से पैदा हुई ऊर्जा और गति आगे कायम रह पाएगी या नहीं और क्या इससे संविधान के स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के वादों को व्यापक रूप से फिर से जीवित करने का रास्ता खुलेगा। इतिहासकार ज्योतिषी नहीं होते। इसलिए भविष्यवाणी करने के बजाय मैं यहां अतीत की ओर देखना चाहूंगा, जब भारत के छात्रों ने राजनीति और सार्वजनिक जीवन पर अपनी छाप छोड़ने की कोशिश की थी।
ऐसा पहला महत्वपूर्ण अवसर आज से लगभग 120 वर्ष पहले बंगाल के स्वदेशी आंदोलन के दौरान आया था। इस आंदोलन पर लिखी अपनी पुस्तक में इतिहासकार सुमित सरकार ने बताया है कि “हर जिले के छात्र पढ़ने के लिए कोलकाता (तब कलकत्ता) आते थे और संभवतः उन्हीं के माध्यम से यह आंदोलन सबसे पहले कलकत्ता से निकलकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों तक पहुंचा।” आंदोलन के प्रमुख नेता भले ही स्थापित पेशेवर और जमींदार वर्गों से आते थे, लेकिन सुमित सरकार के अनुसार, आंदोलन के स्वयंसेवक मुख्यतः छात्र समुदाय से ही थे और उनमें से कई की उम्र बेहद कम थी। इसके बाद के वर्षों में भी छात्रों ने महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ चलाए गए विभिन्न आंदोलनों में उत्साहपूर्वक भाग लिया। असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में बड़ी संख्या में पुरुष छात्रों ने हिस्सा लिया और वह जेल भी गए।
‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की एक खासियत युवा महिलाओं की सक्रिय और प्रभावशाली भूमिका थी। बंबई विश्वविद्यालय की छात्रा उषा मेहता जिन्होंने भूमिगत ‘कांग्रेस रेडियो’ के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, उषा ठक्कर की एक उत्कृष्ट पुस्तक में दर्ज है। लेकिन ऐसे कुछ और उल्लेखनीय उदाहरण भी थे, जिनके बारे में आज अपेक्षाकृत कम जानकारी है।
मुझे अभिलेखागार में ‘कर्नाटक इन रिवोल्ट’ शीर्षक से एक फाइल मिली। इसमें बताया गया है कि भारत के इस हिस्से में आंदोलन की ‘सबसे असाधारण विशेषता’ छात्र समुदाय की प्रतिक्रिया थी। छात्रों ने बेलगाम, गडग, बंगलूरू, मैसूर, बीजापुर, बेल्लारी, सिरसी और अन्य स्थानों पर बहिष्कार और हड़तालें आयोजित कीं।
23 अक्तूबर, 1942 को धारवाड़ की दो छात्राएं, मिस शेनोलिकर और मिस गुलवाड़ी, जिला अदालत में दाखिल हुईं। उन्होंने वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराया, उपस्थित जिला जज से कहा कि उन्हें उनके पद से बर्खास्त किया जाता है, पर्चे बांटे और फिर वहां से गायब हो गईं। काश! उनके जीवन की आगे की कहानी इतिहास के इन दस्तावेजों में कहीं दर्ज मिलती।
1968 में अमेरिकी विद्वान फिलिप जी. ऑल्टबैक ने ‘टर्मोइल एंड ट्रांजिशन : हायर एजुकेशन एंड स्टूडेंट पॉलिटिक्स इन इंडिया’ नाम से एक पुस्तक का संपादन किया। किताब की भूमिका में ऑल्टबैक ने लिखा कि “स्वतंत्रता संग्राम में छात्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, लेकिन 1947 के बाद अधिकांश छात्र आंदोलन सीधे तौर पर राजनीतिक नहीं रहे, बल्कि वे गैर-वैचारिक मुद्दों से जुड़े रहे।” पुस्तक में 1960 के दशक के छात्र आंदोलनों से जुड़े कॉलेजों की बढ़ी हुई फीस और छात्रावासों की खराब सुविधाओं जैसे मुद्दे तो थे ही, साथ ही संगीत और रंगमंच जैसी सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े सवाल भी शामिल थे। लेकिन इस पुस्तक के प्रकाशित होने के एक साल के भीतर ही छात्रों ने फिर से राजनीति में सक्रिय वापसी कर ली। 1969 में शुरू हुए अलग तेलंगाना राज्य के आंदोलन में छात्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आजादी के बाद भारत में उभरे तीन प्रमुख क्षेत्रीय आंदोलनों में छात्रों की भूमिका विशेष रूप से दिखाई देती है। इनमें पहला तेलंगाना आंदोलन था। इसके अलावा 1970 के दशक के आखिर और 1980 के दशक की शुरुआत का असम आंदोलन तथा 2000 के दशक का उत्तराखंड आंदोलन भी छात्र सक्रियता से गहराई से जुड़े रहे।
असम आंदोलन के बारे में इतिहासकार अरूपज्योति सैकिया लिखते हैं कि “यह आंदोलन मुख्यतः छात्र नेताओं के हाथों में था।” उनके अनुसार, इन नेताओं के आदर्शवाद ने बड़ी संख्या में लोगों को प्रेरित किया। जब वे जोशीले भाषण देते थे, तो महिलाएं और पुरुष, दोनों ही बड़ी तल्लीनता से उनकी बातें सुनते थे। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के आंदोलन ने आगे चलकर असम गण परिषद को जन्म दिया, जिसने 1985 में विधानसभा चुनाव जीतकर राज्य में सरकार बनाई।
घनश्याम शाह ने अपनी पुस्तक ‘प्रोटेस्ट मूवमेंट्स इन टू इंडियन स्टेट्स’ में गुजरात और बिहार में हुए इन विरोध प्रदर्शनों के बारे में लिखा है। दोनों ही राज्यों में छात्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं। गुजरात में कांग्रेस के मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल युवाओं के आक्रोश का प्रमुख निशाना बने थे। छात्रों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर चिमनभाई को संरक्षण देने और बढ़ती महंगाई पर काबू पाने में विफल रहने का आरोप लगाते हुए उन्हें निशाना बनाया था। शाह लिखते हैं कि गुजरात की तरह ही 1970 के दशक मंे बिहार आंदोलन में भी छात्र अग्रिम मोर्चे पर थे। हालांकि गुजरात के विपरीत बिहार में आंदोलन को नेतृत्व देने में एक बुजुर्ग व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वह व्यक्ति थे जयप्रकाश नारायण यानी जेपी।
शाह के अनुसार, “गरीबों के प्रति उनकी चिंता, उनका नैतिक दृष्टिकोण, सादगी और विनम्रता”, इन गुणों ने जेपी के व्यक्तित्व को असाधारण आकर्षण प्रदान किया था। जेपी ने छात्रों से अपील की कि वे एक वर्ष के लिए अपनी पढ़ाई छोड़कर ‘लोकतंत्र बचाने’ के अभियान में जुट जाएं। उनकी अपील के बाद बड़ी संख्या में छात्र आगे आए। वर्तमान छात्र आंदोलन और जेपी आंदोलन में एक महत्वपूर्ण समानता नजर आती है। 1970 के दशक में इसका चेहरा इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी थीं, जबकि आज यह भूमिका नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी निभा रहे हैं।
फिर भी दोनों आंदोलनों में महत्वपूर्ण अंतर हैं। उस समय एबीवीपी सत्तारूढ़ व्यवस्था के खिलाफ खड़ी थी, जबकि आज वह पूरी मजबूती से सत्तारूढ़ व्यवस्था के पक्ष में है। यह भी दिखाई देता है कि जेपी आंदोलन की तुलना में मौजूदा विरोध प्रदर्शनों में छात्राओं और युवा महिलाओं की मौजूदगी कहीं अधिक स्पष्ट रही है।
वर्तमान छात्र नेताओं की एक बड़ी विशेषता यह है कि वे धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह का भी दृढ़ता से विरोध करते हैं। उनका आह्वान एक साथ आंबेडकर, गांधी और नेहरू का है। एक ऐसा संघर्ष, जिसका लक्ष्य पहले और दूसरे स्वतंत्रता संग्राम के अधूरे रह गए वादों को आखिरकार पूरा करना है। आने वाले वर्षों में ये आदर्श किस हद तक साकार हो पाएंगे, यह अनगिनत व्यक्तियों और संगठनों के कार्यों पर निर्भर करेगा। इनमें से बहुत-से लोग ऐसे भी होंगे, जो उन उत्साह और उम्मीद से भरे जून और जुलाई के दिनों में जंतर-मंतर पर स्वयं मौजूद नहीं थे।