एससीओ की स्थापना 2001 में चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस, तजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान द्वारा की गई थी। जून, 2017 में इसमें भारत एवं पाकिस्तान, जुलाई, 2023 में ईरान और जुलाई, 2024 में बेलारूस शामिल हुआ। इसमें कई देश पर्यवेक्षक या संवाद भागीदार के रूप में शामिल हैं, लेकिन चीन यूरेशियाई क्षेत्र में अपना प्रभुत्व बनाए रखना चाहता है। एससीओ के सचिवालय का मुख्यालय भी बीजिंग में है। एससीओ का एक स्थायी अंग क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी संरचना (आरएटीएस) है, जिससे ‘आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद’ की तीन बुराइयों के खिलाफ सदस्य देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने की उम्मीद की जाती है। हैरानी की बात है कि जब पहलगाम आतंकी हमले के बारे में चीन को बताया गया, तो दिल्ली स्थित चीनी राजदूत ने सिर्फ घड़ियाली आंसू बहाए। लेकिन बीजिंग ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई पर खेद व्यक्त किया। पाकिस्तान को दंड देने की बात तो दूर, चीन ने संयुक्त राष्ट्र में भी चर्चा के दौरान पाकिस्तान को आलोचना से बाहर निकालने में सहायता की।
एससीओ के रक्षा मंत्रियों की बैठक में, भारतीय रक्षा मंत्री ने अपने चीनी समकक्ष से मुलाकात की और ‘जमीनी स्तर पर कार्रवाई करके 2020 के सीमा गतिरोध के बाद पैदा हुए अविश्वास की खाई को पाटने’ की आवश्यकता पर बल दिया। भारतीय रक्षा मंत्रालय ने देश को आश्वस्त किया कि दोनों मंत्री ‘विभिन्न स्तरों पर विचार-विमर्श के लिए सहमत हैं।’ लेकिन क्या इससे दोनों देशों के बीच बुनियादी विवाद के जो मुद्दे हैं, वे हल हो सकते हैं? यह पहेली तब खड़ी होती है, जब हम एक पूर्व भारतीय विदेश सचिव की एक हैरान करने वाली सलाह को याद करते हैं कि ‘भारत को यह मान लेना चाहिए कि चीन धोखा देने के लिए बातचीत करता है।’ और यह बात ऐसे व्यक्ति ने कही है, जिसे चीनी मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है और जो चीन में भारत का राजदूत रह चुका है। क्या उसने अपने राजनीतिक आकाओं के साथ अपनी धारणाएं साझा की थीं?
इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस की रणनीतिक विश्लेषण पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि 1950 के बाद से लगभग 50,000 वर्ग मील भारतीय क्षेत्र पर दावा करने की चीनी घोषणा गैर-आधिकारिक और निजी तौर पर प्रकाशित मानचित्रों पर आधारित थी, जिसे शिन पाओ मानचित्र के रूप में जाना जाता है। जाहिर है, सत्ता में आई भारतीय सरकारें चीन के इरादों को विफल करने में सफल नहीं हो पाई हैं, बल्कि समय-समय पर होने वाले उल्लंघनों के बावजूद हम चीनी नेताओं का स्वागत करते रहे हैं। पाकिस्तान-चीन गठजोड़ का इतिहास रहा है। जब पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में चीन को सीट देने के लिए मतदान किया, तो चीन ने जनवरी, 1962 में पाकिस्तान द्वारा विवादित मानचित्रों को वापस ले लिया और मार्च, 1962 में सीमा वार्ता में शामिल होने पर सहमति व्यक्त की। दोनों देशों के बीच दो मार्च, 1963 को एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए। जब ये कार्रवाइयां हो रही थीं, तब भारत चीनी सैनिकों द्वारा भारतीय सीमा पार से छेड़े गए युद्ध से पीड़ित था।
इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने लगभग 5,300 वर्ग किमी (2,050 वर्ग मील) क्षेत्र चीन को सौंप दिया, जिस पर उसका कोई अधिकार नहीं था, क्योंकि ये भारतीय क्षेत्र थे। बदले में पाकिस्तान को गिलगित-बाल्टिस्तान के नाम से जाना जाने वाला क्षेत्र मिला। गिलगित-बाल्टिस्तान जम्मू और कश्मीर की पूर्व रियासत का एक हिस्सा है, जो ‘भारत का अभिन्न अंग है।’ इस प्रकार एक दोहरी साजिश रची गई और उसे अंजाम दिया गया। अमेरिकन टाइम ने 1963 में इस मामले पर स्पष्ट रूप से लिखा था कि पाकिस्तान ने कश्मीर समस्या के ‘समाधान की उम्मीदों को और कम कर दिया है’, क्योंकि इस चीन-पाकिस्तान समझौते के तहत, उत्तरी कश्मीर के एक हिस्से पर पाकिस्तान के नियंत्रण को चीन द्वारा मान्यता दी गई थी। इस विस्तारवादी षड्यंत्र की असली प्रकृति तब सामने आई, जब पाकिस्तान को सियाचिन ग्लेशियर में विदेशी पर्वतारोहण अभियानों को मंजूरी देते हुए देखा गया, जो 27 जुलाई, 1949 को संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षकों की उपस्थिति में भारत और पाकिस्तान के सैन्य कमांडरों द्वारा हस्ताक्षरित कराची समझौते के फैसलों से एक गलत निष्कर्ष निकालने जैसा था।
समझौते के शब्दों और भावना के अनुसार, एनजे 9842, इस युद्ध विराम रेखा पर सबसे उत्तरी सीमांकित बिंदु है, जहां से इसे उत्तर की ओर ग्लेशियरों तक जाना था। पाकिस्तान ने इसे काराकोरम दर्रे पर आखिरी बिंदु के रूप में समझा और उस घेरे हुए हिस्से में मौजूद सभी इलाकों को अपनी जमीन मान लिया। जब यह धोखा सामने आया, तो इंदिरा गांधी सरकार ने सैन्य अभियान शुरू किया और चीन-पाकिस्तान की साजिश को नाकाम कर दिया। लेकिन भारत एक विस्तारवादी शत्रु के खिलाफ अपनी चौकसी कम नहीं कर सकता, जो देपसांग मैदानों में 30 किलोमीटर की दूरी पर दौलत बेग ओल्डी में भारतीय बेस पर नजर गड़ाए हुए है। यह एक रणनीतिक सीमा है, जो उन्हें सीपीईसी के तहत बनाई जा रही सड़क तक पहुंच प्रदान करेगी और जो पाकिस्तान द्वारा सौंपे गए क्षेत्र से होकर गुजरती है। यही मुख्य कारण है कि भारत चीन द्वारा अपनाई जा रही ‘वन बेल्ट वन रोड’ योजना में शामिल नहीं हो रहा है। भारत सरकार को चीनी गतिविधियों, रुख और रवैये के बारे में अपने निष्कर्षों का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए और बड़ी तस्वीर को ध्यान में रखते हुए ही कोई निर्णय लेना चाहिए।