अंग्रेजी की नाभिनाल ब्रिटेन से जुड़ी है। ब्रिटिश होते हुए भी अगर अंग्रेजी आज अमेरिका की जुबान बनी हुई है, तो इसकी वजह अठारहवीं सदी में 1756 से 1763 के बीच ब्रिटेन और फ्रांस के बीच चले संघर्ष के बाद फ्रांस की पराजय रही है। चार्ल्स ने ठीक ही कहा कि अमेरिका पर वर्चस्व की इस लड़ाई में यदि फ्रांस को जीत मिलती, तो अमेरिका में अंग्रेजी राज नहीं कर रही होती। तब फ्रेंच का वर्चस्व होता। इस युद्ध में उत्तर अमेरिकी महाद्वीप के कई इलाकों से फ्रांस को हटना पड़ा तथा वहां ब्रिटेन का कब्जा हो गया। इसके बाद से अमेरिका में ब्रिटिश शासन की शुरुआत हुई। अमेरिका ब्रिटिश राज से भले ही अलग हुआ, पर आज भी वहां की भाषा व सांस्कृतिक परंपराओं में ब्रिटेन की झलक साफ दिखाई देती है।
हर शासक की अपनी एक भाषा होती है। उसी में वह अपना राजकाज चलाता है और उसका रोजाना का व्यवहार भी उसी में होता है। जब किसी भाषा का उपयोग शासन में होने लगता है, तो वह उस क्षेत्र में धीरे-धीरे फैलने लगती है। फिर वही भाषा आम बोलचाल की भाषा बन जाती है। अगर कोई देश या इलाका दूसरी भाषा का प्रयोग करता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह उसे प्यारी है, बल्कि वह अपने अस्तित्व और शासन व्यवस्था से समायोजन के लिए उसे सीखता है और पारंगत होना चाहता है। पहली पीढ़ी तक तो यही कारण होते हैं, बाद की पीढ़ियों के लिए यह आदत बन जाती है। इस तरह देखें, तो हर देश की अपनी भाषा के अलावा वहां प्रचलित विदेशी भाषा को उस इलाके या देश की पहली पीढ़ी संयोगों और ऐतिहासिक संयोगों से सीखती है और अगली पीढ़ी अपनी सहूलियत, जीवनशैली व शासन में हिस्सेदारी के लिए।
आज भारत में एक वर्ग ऐसा है, जिसे इन ऐतिहासिक संयोगों और विकासक्रम से कुछ लेना-देना नहीं है। वे अंग्रेजी से बेइंतहा प्यार करते हैं, पर क्या उनका यह प्यार अंग्रेजी के लिए वैसा ही रहता, अगर 1749 से 1754 के बीच चले द्वितीय कर्नाटक युद्ध में ब्रिटिश अधिकारी रॉबर्ट क्लाइव के बजाय फ्रांसीसी डुप्ले को जीत मिली होती? सोचिए, अगर ऐसा हुआ होता, तो क्या होता? तब देश में फ्रांसीसी उपनिवेश स्थापित होता। फ्रेंच लोग अपनी भाषा और संस्कृति को लेकर आज भी बेहद संजीदा हैं। फ्रांस में आज भी अंग्रेजी का प्रयोग सीमित है। 1994 में तो वहां की संसद ने बाकायदा कानून पारित करके देश में अंग्रेजी के बिना वजह के प्रयोग पर रोक लगा रखी है। फ्रांस जाने वालों को पता है कि होटल की लॉबी और हवाईअड्डे से बाहर फ्रेंच जाने बिना वहां रोजाना के कार्य निपटाना कितना कठिन होता है। साफ है कि करीब तीन सौ साल पहले देश पर फ्रांस का कब्जा हो गया होता, और भारतीय अंग्रेजी के बजाय फ्रेंच से प्यार कर रहे होते। तब उन्हें शायद अपने फ्रेंच ज्ञान और धाराप्रवाह फ्रेंच बोलने को लेकर गुमान होता। एक साक्षात्कार में इतिहासकार और यूजीसी के पूर्व चेयरमैन प्रोफेसर सतीश चंद्रा ने भी कहा था कि बेहतर होता क्लाइव की जगह डुप्ले को जीत मिलती। तब भारत फ्रेंच बोल रहा होता। उनका मानना था कि ब्रिटिश की तुलना में फ्रेंच लोग कहीं ज्यादा संस्कारी होते हैं, इसलिए भारत में आज की तुलना में कहीं ज्यादा बेहतर नागरिक बोध होता, अपनी भाषाओं से प्यार होता और उपनिवेशवाद व वैश्विक हालात को लेकर भारतीयों का नजरिया कुछ और ही होता।
मध्य काल यूरोपीय उपनिवेशवाद के विस्तार का काल है। इस दौरान यूरोप के देशों ने बाहर निकलकर एशिया और अफ्रीका में अपने उपनिवेश स्थापित करने शुरू किए थे। तकरीबन पूरे दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप पर स्पेन का कब्जा रहा। भौगोलिक प्रसार के लिहाज से देखें, तो पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा जगहों पर स्पेनिश ही बोली जाती है। साफ है कि जहां-जहां स्पेन ने अपना उपनिवेश बनाया, वहां-वहां स्पेनिश पहुंच गई। कुछ इसी तरह ब्रिटेन का जहां-जहां उपनिवेश रहा, वहां अंग्रेजी प्रमुख भाषा बनती गई। इसी तरह, फ्रांस के प्रभाव वाले इलाकों में फ्रेंच बोली जाने लगी। मॉरीशस पर फ्रांस का कब्जा रहा, इसलिए वहां की भोजपुरी पर फ्रेंच का असर दिखता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘क्रियोल’ कहा जाता है।
शिक्षा व्यवस्था ने लोगों को अपनी भाषाओं के सांस्कृतिक विकासक्रम की पढ़ाई कम ही कराई है। भाषाओं को राजनीतिक हथियार बनाने के दौर में भी जब स्थानीय और पड़ोसी भाषाओं के खिलाफ अपने ही लोग तलवार निकालते हैं, तो उसकी वजह ऐतिहासिक संयोगों की समझ न होना ही है। ऐतिहासिक संयोगों के साथ आई विदेशी भाषा के जरिये मिलने वाली राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक ताकत ने दरअसल इस सोच को कहीं नेपथ्य में डाल रखा है। भारतीय संदर्भ में देखें, तो भारतीय भाषाएं एक-दूसरे की बहनें हैं। इस लिहाज से सबकी अपनी स्थानीय भाषा मातृभाषा और दूसरी भाषा मौसी है। पर ज्यादातर लोग इसे समझने की कोशिश ही नहीं करते। शासन-सत्ता और वैचारिक प्रतिष्ठान भी इस नजरिये से लोगों को प्रशिक्षित करने का प्रयास नहीं दिखाते।
भूमंडलीकरण के दौर में किसी विदेशी भाषा को त्याज्य नहीं बनाया जा सकता, उनसे दुश्मनी की सोचना भी बेमानी है। पर अपनी भाषाओं से प्यार होना ही चाहिए। ऐतिहासिक संयोगों के साथ विकसित भाषा की कीमत पर अपनों से बैर का कोई तुक नहीं। बेहतर होगा कि हम सब इसे उसी तरह समझें, जैसे चार्ल्स ने ट्रंप को दिए चुटीले जवाब के जरिये अमेरिका को समझाने की कोशिश की है। चार्ल्स का मजाक भाषाओं के नाम पर लड़ती दुनिया के लिए मानीखेज संदेश है कि हर भाषा के साथ संयोग जुड़े होते हैं और इतिहास भी। इस इतिहास और संयोग को लोग समझें और यह भी सोचें कि भाषाओं के नाम पर आखिर संघर्ष की जरूरत ही क्या है? - edit@amarujala.com