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मुद्दा: लोग हैं कि मानते ही नहीं; जंग की विभीषिका से कहीं ज्यादा दुखद हैं रोजाना होने वाली सड़क दुर्घटनाएं

सुभाष नागपाल Published by: Pavan Updated Fri, 08 May 2026 07:58 AM IST

सार

भारत की सड़कों पर हर दिन लगभग 470 लोग अपनी जान गंवाते हैं। यह किसी युद्ध से कम नहीं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां दुश्मन बाहर नहीं, हमारे भीतर बैठा हुआ है। ‘लोग हैं कि मानते ही नहीं...’ यह वाक्य अब एक व्यंग्य नहीं, एक राष्ट्रीय संकट का बयान बन चुका है। अगर हमें इसे बदलना है, तो शुरुआत बाहर से नहीं अपने भीतर से, और अभी करनी होगी।
 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Freepik


हेलमेट न पहनना, सीट बेल्ट को बोझ समझना, गति सीमा की लापरवाही, शराब पीकर ड्राइविंग, फोन का प्रयोग, गलत दिशा में गाड़ी दौड़ाना, गलत लेन में चलना, लाल बत्ती को अनदेखा करना, ये सब हमारी आदत का हिस्सा बन चुके हैं। सरकार ने नियम बनाए, जुर्माने लगाए, जागरूकता अभियान चलाए। फिर भी, हालात जस के तस क्यों हैं? क्योंकि समस्या जानकारी की कमी की नहीं, हमारी मानसिकता है। सड़क दुर्घटनाओं में ओवरस्पीडिंग लगभग 70 फीसदी मामलों में दुर्घटना का कारण बनती है। यह सरकारी आंकड़े हैं। दोपहिया चालकों की मौतों में बड़ी संख्या बिना हेलमेट वालों की होती है। तो आखिर कमी कहां है?


जहां एक ओर लोग नियमों का पालन नहीं करते, वहीं दूसरी ओर चेकिंग व चालान करने में ट्रैफिक नियमों का पालन करने में ढिलाई बरती जाती है। सड़क डिजाइन, और संकेतों की अनदेखी करना भी दुर्घटना का कारण बनते हैं। कई जगहों पर लेन मार्किंग, साइन बोर्ड, और स्पष्ट दिशा-निर्देश ही नहीं होते। कहीं तो, मुख्य सड़कों और हाईवे पर दूर-दूर तक गति-सीमा की चेतावनी बोर्ड नहीं लगे होते। सरकारी तंत्र भी जैसे कोई नवाचार नहीं ढूंढते। ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन ही तो सड़क दुर्घटनाओं का प्रमुख कारण है। गांव से लेकर शहरों तक एक ही कहानी है।


अगर हम और प्रशासन सच में बदलाव चाहते हैं, तो कुछ सख्त निर्णय लेने होंगे। पहले, आदतन उल्लंघनकर्ताओं की पहचान कर, उनका रिकॉर्ड बनाया जाए। उन पर भारी जुर्माना लगाया जाए, उनका लाइसेंस निलंबित हो, और उनकी अनिवार्य काउंसलिंग हो। एआई कैमरे, ऑटोमेटेड चालान, और ‘नो-एस्केप’ सिस्टम लागू हों, ताकि गलती की कोई गुंजाइश न बचे। सड़क इंजीनियरिंग को प्राथमिकता दें। रचनात्मक संकेत, सड़क पर विजुअल मैसेज, और व्यवहार को प्रभावित करने वाले उपाय खोजें और लागू करें। स्कूलों से लेकर हर गांव, शहर में सड़क सुरक्षा की विशेष ट्रेनिंग हो। निवासीय संस्थाओं, एनजीओ और बेरोजगार युवाओं को सड़क सुरक्षा अभियान में शामिल किया जा सकता है।


छिटपुट स्थानों पर तैनात एक-दो पुलिस के सिपाही, चारों ओर फैले अनुशासनहीनता से कैसे जूझ पाएंगे! प्रवर्तन पर कई गुना अधिक बल देने पर ही सड़क सुरक्षा के प्रति डर, और व्यवहार में बड़ा परिवर्तन आ सकता है। यह विषय जीवन-मृत्यु का विषय है, इसलिए इसके हल में कोई अगर-मगर की गुंजाइश नहीं है। अंत में फिर वही कठिन सवाल कि क्या हम बदलना चाहते हैं? क्योंकि सच्चाई यह है कि समाधान हमारे पास ही है, कमी केवल इच्छाशक्ति और ईमानदारी की है। नागरिक और प्रशासन, दोनों की। हर बार जब हम नियम तोड़ते हैं, हम केवल कानून नहीं तोड़ते, बल्कि हम किसी अनजान व्यक्ति की जिंदगी को जोखिम में डालते हैं।

‘लोग हैं कि मानते ही नहीं...’ यह वाक्य अब एक व्यंग्य नहीं, एक राष्ट्रीय संकट का बयान बन चुका है। अगर हमें इसे बदलना है, तो शुरुआत बाहर से नहीं अपने भीतर से, और अभी करनी होगी।

 
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