मुंबई में जहां एक ओर जहांगीर आर्ट गैलरी, सस्न लाइब्रेरी और वहां का विश्वविद्यालय परिसर है उसी के ठीक सामने है चेतना प्रकाशन, जिसके संस्थापक सुधाकर दीक्षित अन्य प्रकाशकों जैसे नहीं थे। वे मूल रूप से अध्यवसायी थे। उनकी रुचि दर्शन एवं तत्त्वचिंतन से संबद्ध पुस्तकें छापने में अधिक थी। उन्होंने अगले दिन वाहन भेजकर हमें चाय पर बुलाया। उन्होंने कठोपनिषद की जो प्रति अब से तिरपन वर्ष पूर्व हमें दी थी, वह आज भी हमारे पास है।
सुधाकर दीक्षित के कार्यकक्ष में एक तरफ करीने से जो ग्रंथ सजे रखे थे, उनमें मोनियर विलियम्स का कोश, श्री अरविंद की `सावित्री’, एडविन गेरो की `इंडियन पोएटिक्स’, ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका के अलावा कॉलिन विल्सन की 'बियॉन्ड द आउटसाइडर' और सन 1898 में छपी `स्टोरी ऑफ रिलिजन्स’ आदि दूर से ही पढ़ी जा सकती थीं। चाय पीने की प्रक्रिया में सुधाकर दीक्षित ने पूछा, `यह महाराष्ट्र है, यहां लोग ज्यादातर मराठी में ही बात करना पसंद करते है। तुम्हें आए आठ-दस दिन तो हो ही गए हैं, कुछ शब्दों की ध्वनि के अर्थ समझ पड़े क्या?’
हमने कहा, `बरसों पहले हमारा एक मित्र हुआ करता था मधुकर गंगाधर खेर, उसके सान्निध्य में रहते-रहते काफी कुछ मराठी आ गई थी। फिर भी आप यह क्यों पूछ रहे हैं?’ सुधाकर जी सिर्फ मुस्कुराए, बोले कुछ नहीं। इस बीच कोई फोन आया, जिसका शायद उन्हें इंतजार था। हमने ऊपर दीवार की ओर देखा दत्तात्रेय का एक चित्र था। सुधाकर दीक्षित ने फोन रखते हुए पूछा, `इन्हें या इनके बारे में कुछ तो पता होगा?’ हमने कहा, `क्यों नहीं ये तो अत्रि ऋषि की संतान दत्तात्रेय हैं।
कपिल की बहन अनुसूया इनकी मां थीं।’ सुधाकर द्विवेदी अब खुले, `आज पूर्णिमा है, सूरज ढलते ही समुद्र में ज्वार आएगा। तब हम बीड़ी बाबा के यहां चलेंगे। बीड़ी बाबा का असली नाम तो था मारुति। बोध हो जाने के बाद उन्हें उनके गुरु ने निसर्गदत्त नाम दिया। बीड़ी बाबा यहीं पास में वनमाली बिल्डिंग, खेतवाड़ी में रहते हैं। उन्हें बीड़ी बनाते हुए बोध हुआ।’ सुधाकर द्विवेदी जब यह कह रहे थे, तब हमें एकाएक बाबा कवीर (जुलाहा), सेना जी (नाई) और रैदासजी (चर्मकार) की याद आई। `निसर्गदत्त दरअसल नवनाथ संप्रदाय के हैं। यहां महाराष्ट्र में नवनाथ या दत्त परंपरा दत्तात्रेय के अवतरण के साथ ही शुरू हुई। शुरू के नवनाथों के कुछ नाम मुझे याद हैं- योगिराज दत्त, सिद्धराज दत्त, आदिगुरु दत्त, अवधूत दत्त, शिवरूप दत्त, दिगंवर दत्त, मायामुक्त दत्त और देवदेव दत्त आदि।
अमर रत्नागिरि में जन्मे निसर्ग दत्त अपने गुरु का न नाम बताते हैं, न ही वह गुह्यमंत्र जिसके स्मरण से उन्हें बोध हुआ और जो पूर्णिमा की शाम आते ही, समुद्र में उठती ऊंची लहरों के ही साथ रूपांतरित हुए से भाव समाधि में चले जाते हैं। कम लोगों को रुचि है अतीन्द्रिय लोक में जाने या उसे समझने या पाने की। मगर मैं कुछ औंधी खोपड़ी का हूं। यहां इस शहर में मैं भी कम उम्र में आ गया था। तुम तो खैर लिफाफिया किस्म के हो। मैं तो छह फुटा खाया-पीया जवान, जिधर से निकल जाता लोग ठगे रह जाते थे।
मुंबई की बरसात में बुरी तरह भीगा मैं, यहां के फुटपाथों पर रातों टहला हूं। देखा है मैंने, सेठ, सटोरियों, सिने- तारिकाओं और धर्मगुरुओं को मुखौटों पर मुखौटे लगाए। अनैतिक हो गए हैं सबके सब।’ हमने देखा, सुधाकर दीक्षित की बड़ी-बड़ी आंखें और बड़ी हो गई थीं। `अट्ठाइस वर्ष तक इस मायानगरी में हाड़-तोड़ मेहनत के बाद एक अवधूत मिला, एक सिद्ध पुरुष वह भी एक मामूली बस्ती के अधटूटे घर में गुमनाम जिंदगी जीता हुआ। मन हुआ तुमको उसके पास ले जाने का। देखूं, क्या कहेगा बीड़ी बाबा।’ यह कहकर सुधाकर जी उठ खड़े हुए।
सुधाकर जी हमें अपने वाहन में ले चले। सन् 1960 में मुंबई एक आकर्षक शहर हुआ करता था। कोई बीस-पच्चीस मिनट लगे होंगे खेतवाड़ी पहुंचने में। नीचे के खंड के साथ ही टूटी सीढ़ियां थी। ऊपर के कमरे में एक गोरा व्यक्ति और अधेड़ मराठी युवती बैठी थी। निसर्गदत्त कुछ बुदबुदाकर बोल रहे थे। हम जब वहां पहुंचे, तो बीड़ी बाबा ने सुधाकर जी को घनिष्ट निगाहों से देखकर तब हमारी ओर बड़ी तीखी दृष्टि से देखा। नमन कर समीप बैठते हुए सुधाकर दीक्षित ने कहा, `यह कैलाश हैं, कविता लिखते हैं। मुंबई आए हैं। हफ्ते भर से यही हैं।’
बीड़ी बाबा ने हमारी तरफ देखना बंद ही नहीं किया। हमें लगा जैसे हृदय डूबा जा रहा है, समुद्र की लहरों की दहाड़ तरल थपकियों में बदल रही है। बचपन में झूले पर सुलाती मां की लोरी मन के भीतरी कोशों को स्पंदित कर रही है। ऐसा लगा कि जैसे ब्लैक आउट होने को है। बीड़ी बाबा के नेत्र अर्धनिमीलित होने लगे। हल्की मीठी आवाज में निसर्गदत्त ने कहा, `शहर पकड़ेगा, लौटना अभी नहीं होगा।
कविता खून खाएगी, वैराग्य की बदरिया बिन बरसे लौट जाएगी। करम काटते सदी बीत जाएगी। अभी तो अस्पताल जाना है।’ वाक्य पूरा होते ही निसर्गदत्त तुरीयासिक्त स्थिति से भावसमाधि में चले गए। न सुधाकर दीक्षित की समझ में आया न हमारी कि किसे अस्पताल जाना है। आठ दिसंबर सन् 1981 की रात थी। हम जन्म के अनिद्रा रोगी अपने साउथ एक्सटेंशन स्थित आवास में सोने की कोशिश में थे, तभी सूचना मिली कि कैंसर से पीड़ित अवधूत निसर्गदत्त ने काया छोड़ दी। चेतना अभी भी वही है।