सुंद-उपसुंद के तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने दर्शन दिए। दोनों ने ब्रह्मा से अमरता का वरदान मांगा। परंतु ब्रह्मा सहमत नहीं हुए, तो सुंद-उपसुंद ने कहा, ‘आप यह वरदान दीजिए कि हम दोनों केवल एक-दूसरे के हाथों ही मारे जाएं तथा कोई अन्य प्राणी हमारा वध न कर सके!’ यह वरदान अमर होने के समान ही था, क्योंकि दोनों भाइयों में परस्पर इतना प्रेम था कि एक-दूसरे को मारने का प्रश्न ही नहीं था!
ब्रह्मा ने ‘तथास्तु’ कहा और अंतर्धान हो गए। वरदान मिलने के बाद मृत्यु का भय समाप्त हो गया, तो दोनों भाई पूरी तरह निरंकुश हो गए। पहले उन्होंने देवलोक पर आक्रमण किया और फिर पृथ्वी पर रहने वाले ऋषि-मुनियों को सताने लगे। आखिर सभी देवता मिलकर सहायता मांगने ब्रह्मा के पास पहुंचे। ब्रह्मा ने देवताओं की व्यथा सुनी। उन्होंने कुछ देर विचार किया और फिर देवशिल्पी विश्वकर्मा को बुलाया।
ब्रह्मा ने विश्वकर्मा से कहा, ‘विश्वकर्मा! आप एक ऐसी स्त्री की रचना कीजिए, जो इतनी सुंदर हो कि उस जैसी स्त्री तीनों लोकों में कोई और न हो। जो उसे देखे, बस देखता रह जाए!’
ब्रह्मा की आज्ञा पाकर विश्वकर्मा ने त्रैलोक्य में घूमकर अलग-अलग स्थानों से तिल-तिल करके सर्वोत्कृष्ट, सर्वाधिक बहुमूल्य एवं विस्मयकारी तत्व एकत्रित किए। फिर अप्रतिम सौंदर्य वाले उन कणों की सहायता से विश्वकर्मा ने एक सुंदरी की रचना की और उसे ब्रह्मा के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। ब्रह्मा समेत सभी देवता उस स्त्री के अभूतपूर्व सौंदर्य को देखकर चकित रह गए।
ब्रह्मा बोले, ‘इसका नाम ‘तिलोत्तमा’ होगा, क्योंकि इसे तीनों लोकों के उत्तम तिलों को जोड़कर बनाया गया है। यही सुंद और उपसुंद के अंत का कारण बनेगी!’ फिर उन्होंने तिलोत्तमा से कहा, ‘तुम्हें सुंद और उपसुंद को अपने सौंदर्य से लुभाना है। आगे का कार्य, वे स्वयं कर लेंगे!’ तिलोत्तमा ने ब्रह्मा को प्रणाम किया और सुंद-उपसुंद के पास पहुंच गई। तिलोत्तमा को देखते ही दोनों भाइयों का रोम-रोम खिल उठा। उसके अप्रतिम लावण्य पर दोनों असुर भाई ऐसे मंत्रमुग्ध हुए कि उनमें कामाग्नि प्रज्वलित हो उठी।
‘अहा! कैसा मनमोहक सौंदर्य! मैंने ऐसी सुंदर स्त्री जीवन में पहली बार देखी है।’ सुंद ने हर्ष से भरकर कहा। उपसुंद भी बोला, ‘मैं इसे अपनी पत्नी बनाऊंगा!’
यह सुनकर सुंद को क्रोध आ गया। उसने भाई को फटकारते हुए कहा, ‘मैंने इसे पहले देखा है, इसलिए यह मेरी पत्नी है।’ ‘देखने से क्या होता है!’ उपसुंद चिल्लाया, ‘पत्नी बनाने का विचार मुझे पहले आया है। इससे विवाह मैं ही करूंगा।’
तिलोत्तमा जैसी कोई दूसरी स्त्री तीनों लोकों में नहीं मिल सकती थी। उसके मादक रूप-सौंदर्य ने उनकी बुद्धि हर ली और उसे प्राप्त करने के लिए दोनों लड़ने लगे। शीघ्र ही सुंद-उपसुंद की बहस ने उग्र रूप धारण कर लिया। दोनों में हाथापाई होने लगी। तिलोत्तमा पास खड़ी मुस्करा रही थी। वह ब्रह्मा की योजना को समझ चुकी थी। उसके अनुपम सौंदर्य ने दोनों भाइयों के बीच बैर उत्पन्न कर दिया था। अगले ही क्षण, दोनों भाइयों ने तलवारें निकाल लीं। उनके बीच भीषण युद्ध होने लगा। अंत में वही हुआ, जो होना था! दोनों ने एक-दूसरे को मार डाला।
तिलोत्तमा अब भी मुस्करा रही थी और देवता उस दृश्य को देखकर हर्षित हो रहे थे। एक स्त्री का सौंदर्य भाइयों के बीच बैर और फिर उनकी मृत्यु का कारण बन गया। द्वापर-युग में जब द्रौपदी का पांच पांडव भाइयों से विवाह हुआ, तो देवर्षि नारद ने उन्हें सुंद-उपसुंद की यही कथा सुनाई थी, जिसके बाद पांडवों ने द्रौपदी के साथ रहने के कुछ नियम बनाए, ताकि उनमें द्रौपदी को लेकर सुंद-उपसुंद की भांति झगड़ा न हो जाए!