चीन में पिछले कुछ साल से हिंदी फिल्मों का कारोबार तेजी से बढ़ा है। इसका कारण इन फिल्मों में चीन के मध्यवर्ग और युवाओं को प्रभावित करने वाले मुद्दों का अधिक होना है। चीनी दर्शकों को शिक्षा, भाषा, महिला शिक्षा, खेलकूद, महिला सशक्तिकरण, भारत के विदेश संबंध, ग्रामीण भारत एवं उससे जुड़े विषय आकर्षित करते हैं। उनको प्रेम, दया, करुणा और मानवता का संदेश देने वाली फिल्में तो पसंद हैं ही, मनोरंजन, हास्य, साहस व प्रेरणा देने वाली, मेहनत से काम करने का संदेश देने वाली फिल्में भी पसंद हंै।
बजरंगी भाईजान को आम जनता के बीच प्यार का संदेश देने के कारण पसंद किया गया, तो माई नेम इज खान को अमेरिका की भेदभाव वाली नीति का विरोध करने के कारण। बराबरी और न्याय का संदेश देने वाली आवारा भी अपने समय में चीन में बहुत लोकप्रिय हुई थी। चीनी समाज को प्रेम कहानियां भी आकर्षित करती हैं। इसलिए मोहब्बतें अगर चीनी युवाओं की पसंदीदा फिल्म है, तो नूरी का गीत आ जा रे मेरे दिलबर आजा, दिल की प्यास बुझा जा रे या आवारा हूं, गर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं प्रौढ़ पीढ़ी का पसंदीदा गीत है। हाल के वर्षों में अरब देशों, अमेरिका और यूरोप के बाद चीन में भारतीय फिल्मों का एक बड़ा दर्शक वर्ग बन गया है। दंगल फिल्म ने चीनी मुद्रा में 129 करोड़ से अधिक का कारोबार किया। रूस की तरह चीन में भी बॉलीवुड के पुराने अभिनेताओं में लोग राज कपूर को बहुत पसंद करते हैं। उनकी आवारा और मेरा नाम जोकर यहां के बुजुर्गों की याद का हिस्सा हैं। नूरी, कारवां, मिस्टर इंडिया, मोहब्बतें, अशोक, लगान, माई नेम इज खान आदि फिल्में भी लोकप्रिय हुईं। अमिताभ बच्चन, अनिल कपूर, शाहरुख खान, सलमान खान, इरफान खान चीनी समाज के परिचित चेहरे हैं, इधर आमिर खान का जादू भी सिर चढ़कर बोल रहा है। पिछले एक दशक में यहां आमिर की लगान, पीके, थ्री इडिएट्स और दंगल पसंद की गईं। इस बीच हिंदी मीडियम और बाहुबली भी यहां जबर्दस्त प्रदर्शन कर चुकी है।
सीक्रेट सुपरस्टार और दंगल ने चीनी युवतियों को प्रभावित किया, जिसमें बराबरी के हक के लिए लड़ती लड़की यहां प्रेरणा और साहस देने का काम करती है। यद्यपि एक संतान का सिद्धांत लागू हो जाने के बाद चीन में महिलाओं को अधिकार मिले हैं, फिर भी परंपरागत चीनी समाज में युवतियां अधिकार संपन्न होना चाहती हैं। थ्री इडियट्स से प्रभावित एक चीनी छात्र ने मुझसे पूछा कि भारत में माता-पिता या अध्यापक अधिक संवेदनशील और चिंतित हैं या उन्हें नई पीढ़ी पर भरोसा ही नहीं है? पीके में उठाए गए ईश्वर के होने के सवाल पर चीनी युवाओं में मंथन चला। चीनी परिवारों में बच्चे को शिक्षित करने की चिंता बड़ी है, इसलिए इंग्लिश-विंग्लिश यहां बहुत पसंद की गई।
साल भर में विश्व सिनेमा से अधिकतम 38 फिल्में ही चीन में दिखाई जा सकती हैं, इसके बावजूद पिछले साल चीन में चार भारतीय फिल्में रिलीज हुईं। पिछले तीन महीने में तीन हिंदी फिल्में चीन में रिलीज हुईं। चीनी समाज में हिंदी फिल्में जिस तरह से देखी जा रही हैं, इससे आपसी सौहार्द की संभावना बढ़ती है। हो सकता है कि दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध बनाने में हिंदी सिनेमा भी कारगर भूमिका अदा करे।
-शंघाई इंटरनेशनल स्टडीज यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर