इन दिनों चुनावों का बोलबाला है। टेलीविजन पर आकर दक्षिण भारत के नेता, तृणमूल के बांग्लाभाषी लोग, ओडिशा, आंध्र प्रदेश यहां तक कि तमिलनाडु के नेता और कुछ पैनलिस्ट हिंदी में भी बोलते नजर आते हैं। हाल ही में सैम पित्रोदा को भी हिंदी में बोलते सुना गया। एक खबर के अनुसार डीएमके ने, जिसकी राजनीति हिंदी विरोध पर ही परवान चढ़ी थी, इस बार चेन्नई में रहने वाले हिंदी भाषियों के लिए अपनी पार्टी की ओर से हिंदी में पर्चे छपवाए थे।
इसे हिंदी की ताकत ही कहेंगे कि वह बिना किसी आंदोलन और समर्थन के दूर-दराज के उन इलाकों में जा पहुंची है, जहां कुछ दशक पहले तक इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इसमें हिंदी फिल्मों, मीडिया, इंटरनेट और चौबीस घंटे चलने वाले चैनल्स का बड़ा हाथ है। इन दिनों तो विदेश में रहकर भी बहुत से हिंदी चैनल्स देखे जा सकते हैं। ऑनलाइन अखबार पढ़े जा सकते हैं। खुशी की बात है कि हिंदी ग्लोबल यानी कि भूमंडल में फैली हुई और लोकल यानी कि स्थानीय साथ-साथ है।