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अपनों के हाथों पिटती हिंदी: कल का सुनहरा भविष्य हो रहा फेल

क्षमा शर्मा Published by: क्षमा शर्मा Updated Tue, 14 May 2019 06:22 AM IST
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इन दिनों चुनावों का बोलबाला है। टेलीविजन पर आकर दक्षिण भारत के नेता, तृणमूल के बांग्लाभाषी लोग, ओडिशा, आंध्र प्रदेश यहां तक कि तमिलनाडु के नेता और कुछ पैनलिस्ट हिंदी में भी बोलते नजर आते हैं। हाल ही में सैम पित्रोदा को भी हिंदी में बोलते सुना गया। एक खबर के अनुसार डीएमके ने, जिसकी राजनीति हिंदी विरोध पर ही परवान चढ़ी थी, इस बार चेन्नई में रहने वाले हिंदी भाषियों के लिए अपनी पार्टी की ओर से हिंदी में पर्चे छपवाए थे।

इसे हिंदी की ताकत ही कहेंगे कि वह बिना किसी आंदोलन और समर्थन के दूर-दराज के उन इलाकों में जा पहुंची है, जहां कुछ दशक पहले तक इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इसमें हिंदी फिल्मों, मीडिया, इंटरनेट और चौबीस घंटे चलने वाले चैनल्स का बड़ा हाथ है। इन दिनों तो विदेश में रहकर भी बहुत से हिंदी चैनल्स देखे जा सकते हैं। ऑनलाइन अखबार पढ़े जा सकते हैं। खुशी की बात है कि हिंदी ग्लोबल यानी कि भूमंडल में फैली हुई और लोकल यानी कि स्थानीय साथ-साथ है।



कई चैनल्स जो कल तक सिर्फ अंग्रेजी में बातचीत दिखाते थे, वे द्विभाषी हो चले हैं। अंग्रेजी के चैनल्स पर बहुत से पैनलिस्ट धड़ल्ले से हिंदी में बोलते हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अंग्रेजी में पूछे गए सवालों का जवाब हिंदी में देते हैं। एक बार उनसे पूछा भी गया था कि आप अच्छी-खासी अंग्रेजी जानते हैं, फिर अपनी बात हिंदी में ही क्यों कहते हैं। तब उन्होंने कहा था जनता से जुड़ना चाहते हैं, इसीलिए उस भाषा में बोलते हैं, जो लोगों की समझ में आ सके।

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इन दिनों चुनावों का बोलबाला है। टेलीविजन पर आकर दक्षिण भारत के नेता, तृणमूल के बांग्लाभाषी लोग, ओडिशा, आंध्र प्रदेश यहां तक कि तमिलनाडु के नेता और कुछ पैनलिस्ट हिंदी में भी बोलते नजर आते हैं। हाल ही में सैम पित्रोदा को भी हिंदी में बोलते सुना गया। एक खबर के अनुसार डीएमके ने, जिसकी राजनीति हिंदी विरोध पर ही परवान चढ़ी थी, इस बार चेन्नई में रहने वाले हिंदी भाषियों के लिए अपनी पार्टी की ओर से हिंदी में पर्चे छपवाए थे।

इसे हिंदी की ताकत ही कहेंगे कि वह बिना किसी आंदोलन और समर्थन के दूर-दराज के उन इलाकों में जा पहुंची है, जहां कुछ दशक पहले तक इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इसमें हिंदी फिल्मों, मीडिया, इंटरनेट और चौबीस घंटे चलने वाले चैनल्स का बड़ा हाथ है। इन दिनों तो विदेश में रहकर भी बहुत से हिंदी चैनल्स देखे जा सकते हैं। ऑनलाइन अखबार पढ़े जा सकते हैं। खुशी की बात है कि हिंदी ग्लोबल यानी कि भूमंडल में फैली हुई और लोकल यानी कि स्थानीय साथ-साथ है।

कई चैनल्स जो कल तक सिर्फ अंग्रेजी में बातचीत दिखाते थे, वे द्विभाषी हो चले हैं। अंग्रेजी के चैनल्स पर बहुत से पैनलिस्ट धड़ल्ले से हिंदी में बोलते हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अंग्रेजी में पूछे गए सवालों का जवाब हिंदी में देते हैं। एक बार उनसे पूछा भी गया था कि आप अच्छी-खासी अंग्रेजी जानते हैं, फिर अपनी बात हिंदी में ही क्यों कहते हैं। तब उन्होंने कहा था जनता से जुड़ना चाहते हैं, इसीलिए उस भाषा में बोलते हैं, जो लोगों की समझ में आ सके।

इसके विपरीत कांग्रेस पार्टी है, जिसने कर्नाटक के चुनावों के दौरान मेट्रो ट्रेन में हिंदी में भी निर्देश लिखने पर हिंदी के विरुद्ध आंदोलन तक चला दिया था। जबकि इसे त्रिभाषा फाॅर्मूला के अंतर्गत ही लिखा गया था। हिंदी के साथ कन्नड़ और अंग्रेजी भी मौजूद थी, लेकिन विरोध का शिकार सिर्फ हिंदी को होना पड़ा। हाल ही में कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी कहा था कि हिंदी लादी जा रही है। हिंदी प्रदेश में कांग्रेस को वोट तो चाहिए, लेकिन दक्षिण में उसे लगता है कि हिंदी को ठोककर ही काम चल सकता है, जबकि लोग वहां हिंदी सीख रहे हैं। आखिर इस तरह का दोहरापन क्यों? याद नहीं आता कि हिंदी प्रदेश में भाषा के नाम पर किसी के साथ भेदभाव किया गया हो।

यहां तो अक्सर सुर समावेशी रहता है कि हिंदी क्षेत्र में अन्य भाषाएं भी सीखी जानी चाहिए। तमाम भारतीय भाषाओं के साहित्य का हिंदी में अनुवाद किया जाना चाहिए, जिससे हिंदी भाषी उसे पढ़ सकें, लेकिन नेता, लोगों को भड़काकर वोट बटोरने के लिए जब चाहे तब हिंदी के खिलाफ विष वमन करते रहते हैं। आखिर उन्हें हिंदी प्रदेश के पचपन करोड़ लोगों का ध्यान क्यों नहीं आता कि उनकी भाषा का अपमान एक तरह से उनका अपमान भी है।

नेताओं से ज्यादा दुखद यह है कि हिंदी प्रदेशों में हिंदी के अपने ही उसे दुर्गति में झोंक रहे हैं। इस साल उत्तर प्रदेश बोर्ड की परीक्षा में दस लाख बच्चे हिंदी में फेल हो गए। आखिर इसकी क्या वजह हो सकती है? क्या अध्यापक हिंदी ठीक से नहीं पढ़ाते? या बच्चे हिंदी को इतना मामूली समझते हैं कि बिना पढ़े ही पास होने की सोचते हैं? या कि ध्यान इस बात पर है कि पढ़ने का मतलब सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी सीखना है, क्योंकि कई दशकों से बच्चों और विद्यार्थियों को तमाम माध्यमों द्वारा यह बात लगातार सिखाई गई है कि जीवन में कुछ करना है, तो अंग्रेजी जानो, उसे ही सीखो, उसी पर ध्यान दो।

हिंदी का क्या है, आगे चलकर जब करियर की उड़ान भरोगे, तो यह किसी काम नहीं आएगी। अंग्रेजी सीखना अच्छी बात है, लेकिन अपनी ही भाषा, जिसे हिंदी कहते हैं, उसका इतना तिरस्कार कहां तक जायज है!
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