नरेंद्र मोदी ने 2014 के आम चुनाव के दौरान अर्थव्यवस्था पर बिना सोच विचार कर टिप्पणी की थी। तब मैंने इन शब्दों से इसका जवाब दिया था कि, 'अर्थव्यवस्था के बारे में मोदी का ज्ञान बस इतना है कि उसे किसी डाक टिकट के पीछे लिखा जा सकता है।’ यह एक उचित टिप्पणी थी, लेकिन मैं मानता हूं कि मोदी ने इस टिप्पणी के लिए मुझे कभी माफ नहीं किया! यह कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन समय ने यह साबित कर दिया है कि मैं सही था।
मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल के अंत में हम सरकार के कृत्यों और उसकी नाकामियों को लेकर लंबा आरोप पत्र तैयार कर सकते हैं। इस सूची में, मेरे दृष्टिकोण में, अर्थव्यवस्था का प्रबंधन शीर्ष पर होगा। कुप्रबंधन के लिए जो चीजें जिम्मेदार हैं, उनमें शामिल हैं, (1) मैक्रो इकोनॉमिक्स (समष्टि अर्थशास्त्र) से प्रधानमंत्री का अपरिचित होना और इसे जानने के प्रति उनकी अनिच्छा। (2) वित्त मंत्री की यह पूर्वानुमान लगाने की अक्षमता कि नीतिगत बदलावों पर व्यापार, कारोबार, निवेशकों और उपभोक्ताओं का व्यवहार कैसा होगा। और (3) अर्थशास्त्रियों के प्रति सरकार की उपेक्षा और नौकरशाहों पर जरूरत से अधिक भरोसा।
एक राज्य सरकार को चलाने और भारत में शासन करने में बहुत अंतर होता है। किसी मुख्यमंत्री को विनिमय दर या चालू खाता घाटा या मौद्रिक नीति या बाह्य घटनाक्रम (मसलन, अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर या ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध) को लेकर परेशान नहीं होना पड़ता। यदि कोई मुख्यमंत्री राज्य के राजस्व का प्रबंधन ठीक से करता है, खर्च को नियंत्रित रखता है, केंद्र सरकार से बड़ा अनुदान हासिल करता है और पर्याप्त निजी निवेश आकर्षित करता है, तो आर्थिक प्रबंधन को लेकर वह अच्छा प्रदर्शन करेगा। बिना किसी औपचारिक शिक्षा वाले अनेक जमीनी मुख्यमंत्री अपने राज्य में अर्थव्यवस्था के प्रबंधन के लिए प्रशंसा अर्जित कर चुके हैं।
जब अर्थव्यवस्था के प्रबंधन की जिम्मेदारी नौसिखिया लोगों के या निरंकुश लोगों के हाथों में होगी, तो उसके हश्र भी जल्द सामने आएंगे। नोटबंदी इसका शास्त्रीय उदाहरण है। किसी भी अर्थशास्त्री ने अपनी स्नातक की डिग्री को दांव पर लगाकर प्रधानमंत्री को व्यवहार में आ रही 86 फीसदी मुद्रा को अवैध घोषित करने की सलाह नहीं दी होगी, लेकिन ऐसा किया गया। चूंकि अरुण जेटली ने कभी भी सार्वजनिक तौर पर जिम्मेदारी नहीं ली, इसलिए यह माना जाना चाहिए कि यह फैसला पूरी तरह से प्रधानमंत्री का था। मोदी ने इसका श्रेय तो लिया, लेकिन उन्होंने यह स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दिया, एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग) को नेस्तनाबूद कर दिया, नौकरियां खत्म कर दीं और कृषि क्षेत्र के संकट को और बढ़ा दिया।
नोटबंदी के बाद और गलत निर्णय लिए गए। मानव जाति के आर्थिक व्यवहार की बहुत कम समझ के साथ बजट तैयार किए गए, जीएसटी को खराब ढंग से तैयार कर हड़बड़ी में लागू किया गया, एनपीए के मुद्दे पर कठोर और फूहड़ ढंग से पेश आया गया, अव्यावहारिक राजस्व लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सत्ता की ताकत का दुरुपयोग किया गया और गलत तरीके अपनाए गए और ढांचागत आर्थिक समस्याओं को दूर करने के लिए नौकरशाही के त्वरित समाधान तलाशे गए।