मुद्रास्फीति से जुड़े आंकड़े भी सरकारी नीतियों की गिरती साख के बारे में बताते हैं। विगत आठ फरवरी को रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास और मौद्रिक नीति समिति ने जोर देकर कहा कि सकल मुद्रास्फीति अब नर्मी की ओर है (उन्होंने इस वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में मुद्रास्फीति के घटने का भी आकलन किया)। उसके छह दिन बाद 14 फरवरी को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने बताया कि जनवरी में खुदरा मुद्रास्फीति 5.7 फीसदी से बढ़कर तीन महीने की ऊंचाई पर 6.7 प्रतिशत हो गई है। इस तरह मौजूदा वित्त वर्ष के 11 में से नौ महीने में खुदरा मुद्रास्फीति छह फीसदी के वहनीय स्तर से अधिक पाई गई।
हालांकि यह सच है कि नीतिगत वक्तव्य में प्रमुख मुद्रास्फीति (जिसमें खाद्य मुद्रास्फीति और ऊर्जा मुद्रास्फीति शामिल नहीं होती) के प्रति चिंता जताई गई थी, और रिजर्व बैंक के आंकड़े में भी जिसे कुल मुद्रास्फीति के बढ़ने का जिम्मेदार ठहराया गया। लेकिन महंगाई के बढ़े आंकड़े के पीछे कुछ अलग-अलग कारक ज्यादा महत्वपूर्ण थे-जैसे, उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक का 4.19 फीसदी से बढ़कर 5.94 प्रतिशत होना और ग्रामीण इलाकों में खुदरा मूल्यों में वृद्धि।
आवश्यक वस्तुओं के मूल्य में भारी वृद्धि आज देश के बाजारों और घरों में बहस का सबसे बड़ा मुद्दा है। पिछले छह महीनों में दूध के दाम 15 फीसदी बढ़े हैं। पोल्ट्री उत्पादों के मलयेशिया में निर्यात के कारण अंडे के दाम 20 प्रतिशत बढ़े हैं। मछली और मांस की कीमत में भी तेजी आई है। प्रख्यात अर्थशास्त्री स्वर्गीय सुबीर गोकर्ण ने कभी इन वस्तुओं की कीमत में आई तेजी को 'प्रोटीन मुद्रास्फीति' कहा था!
सब्जियों को छोड़कर, जिन्हें मौसमी लाभ मिलता है, हर खाद्य पदार्थ की कीमत बढ़ गई है। लेकिन अनाज की कीमत में वृद्धि न केवल आश्चर्यजनक और पिछले साल रबी फसलों की कटाई से पहले आई तेजी की याद दिलाती है, बल्कि इसमें आई तेजी नीति निर्माताओं के आर्थिक आकलन को गलत साबित कर दे, तो आश्चर्य नहीं होगा।
यह तो तय है कि मुद्रास्फीति का आंकड़ा अगले कुछ सप्ताहों तक रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय को परेशान करता रहेगा। ईंधन मुद्रास्फीति को कम करने के लिए पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने की चर्चा होगी। इस पर भी व्यापक बहस होगी कि तमाम उपाय अपना चुकने के बावजूद मुद्रास्फीति काबू में क्यों नहीं आ रही।
लेकिन सरकार द्वारा दी गई व्याख्याओं के बजाय मुद्रास्फीति के मामले में जो ज्यादा प्रासंगिक है, वह है वास्तविकता और धारणाओं का फर्क। यह देखना महत्वपूर्ण है कि कैसे यह फर्क सरकार की बैलेंस शीट के आकलन को-इसके उपभोग, निवेश और आर्थिक वृद्धि दर के पूर्वानुमान को प्रभावित कर रहा है- खासकर तब, जब यह देश 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारी कर रहा है। मुद्रास्फीति जाहिर है, उत्पादन की मात्रा का पीछा करने में लगने वाली पूंजी की मात्रा ही तो है।
बढ़ती मुद्रास्फीति के लिए जिम्मेदार जिस कारण पर बहस नहीं होनी है, वह बढ़ता सरकारी खर्च और उधार है। एक आकलन यह है कि इस साल केंद्र और राज्य सरकारें 23.5 लाख करोड़ रुपये कर्ज लेने वाली हैं-जो प्रतिदिन 6,400 करोड़ रुपये कर्ज लेने के बराबर है। कर्ज की लागत में वृद्धि चूंकि तय है, ऐसे में, रिजर्व बैंक भी मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दर में आगे और वृद्धि के लिए तैयार है।
पूंजी की लागत घरेलू परिस्थितियों से तो प्रभावित होगी ही, महामारी के बाद की दुनिया में यह वैश्विक कारणों से भी प्रभावित होगी। अमेरिका में मुद्रास्फीति में आश्चर्यजनक वृद्धि से उधारी की दर में 50 बेसिस पॉइंट की और वृद्धि की आशंका बन गई है। पूंजी की लागत में वृद्धि अर्थव्यवस्था की वृद्धि को प्रभावित करने के साथ पोर्टफोलियो निवेश और व्यापार पर भी असर डालेगी। अपने यहां चालू खाते की नाजुक स्थिति को देखते हुए रिजर्व बैंक ब्याज में आने वाले अंतर को समायोजित करने के साथ अपनी मुद्रा की मजबूती बनाए रखने की कोशिश करेगा।
दरों में वृद्धि एक ऐसा भोथरा औजार है, जो मांग को खत्म करता है। लेकिन श्रम बाजार समेत दूसरी भिन्नताओं के बावजूद विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं आज दरों में वृद्धि पर एकमत हैं। जी-7 राष्ट्रों द्वारा दर बढ़ाने का उभरती अर्थव्यवस्थाओं की उधारी और वृद्धि दर पर पड़ने वाले असर पर विमर्श इस सप्ताह बंगलूरू में होने वाली जी-20 के वित्तमंत्रियों की बैठक के एजेंडे में भी है। उस बैठक का निष्कर्ष चाहे जो भी हो, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि मुद्रास्फीति आयात की लागत से प्रभावित होगी।
भारत दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली विशाल अर्थव्यवस्था है। लेकिन इस उपलब्धि को बरकरार रखने के लिए इसे निजी निवेश में वृद्धि करनी होगी, आय का सृजन करना होगा और आर्थिक वृद्धि की रफ्तार बढ़ानी होगी। पर मुद्रास्फीति के बरकरार रहने की आशंका, केंद्र और राज्य सरकारों की बढ़ती उधारी तथा पूंजी की लागत जैसी बड़ी चुनौतियां सामने हैं।
मौजूदा चुनौतीपूर्ण स्थितियां सरकार के लिए नीतिगत मामलों में फिर से ध्यान केंद्रित करने की मांग करती हैं। उदाहरण के लिए, संसाधनों की प्राप्ति और जनसांख्यिकी के लाभ का पूरा फायदा उठाने के लिए राजस्व के नए स्रोतों की तलाश और विनिवेश जैसे कदम प्रभावी साबित हो सकते हैं। राजनीति के मोर्चे पर ध्यान बंटाने वाले जो निरर्थक मामले सामने आते हैं, जरूरी कार्रवाई और लोकप्रिय महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की दिशा में लगा यह देश उनसे जूझ नहीं सकता।