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सैन्य कार्रवाई में छिपे संदेश

Thu, 11 Jun 2015 08:12 PM IST
मारूफ रजा
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म्यांमार में हुई सैन्य कार्रवाई सीमा पार की गई कोई पहली कार्रवाई नहीं है। अप्रैल-मई, 1995 में वहां ऑपरेशन गोल्डन बर्ड नामक एक अभियान भारतीय सेना ने चलाया था। मगर इस बार सैन्य कार्रवाई इसलिए खास है, क्योंकि नई दिल्ली ने ऐसी कार्रवाई का ऐलान किया है। यानी इसकी विधिवत घोषणा की गई है। इस सैन्य कार्रवाई की कुछ ठोस वजहें थीं। पहला और बड़ा कारण यह था कि पूर्वोत्तर में उग्रवादी काफी हिंसक होने लगे थे। विगत चार जून को ही मणिपुर में उग्रवादियों के हमले में सुरक्षा बल के 18 जवानों की जान गई थी। लिहाजा सैनिकों के मनोबल को बढ़ाना जरूरी था। मगर इसके अतिरिक्त सच यह भी है कि म्यांमार सरकार की पहुंच मणिपुर, नगालैंड और मिजोरम के सीमावर्ती इलाके में ज्यादा नहीं है। वहां के सैनिक भी इतने दक्ष नहीं हैं कि इन इलाकों में शरण लेने वाले अलगाववादियों को दबाकर रखें। साथ ही, एनएससीएन (खपलांग) जैसे उग्रवादी गुटों के नेताओं को म्यांमार की नागरिकता है, और उनकी पहुंच राजनीतिक गलियारे में भी है। लिहाजा भारत की सेना का सीमा पार करना आवश्यक था।
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स्पेशल फोर्सेस की ऐसी कार्रवाई के लिए कुछ चीजों का होना जरूरी माना जाता है। ऐसे ऑपरेशन से पहले सेना यह देखती है कि उग्रवादियों के होने की उसकी सूचना कितनी सटीक है। वह यह भी तय करती है कि जहां हमला करना है, वह हमारी सीमा से कितनी दूर है। वहां आने-जाने में कितना वक्त लगेगा। आम तौर पर इस किस्म के हमले करने के बाद रात में ही वहां से निकलने की कोशिश होती है। ज्यादा समय तक वहां रहने पर उग्रवादियों के अन्य गुटों द्वारा घेरे जाने और जान-माल के नुकसान का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ ही सेना यह भी आकलन करती है कि उग्रवादियों की रक्षात्मक पंक्ति कितनी ताकतवर है। लिहाजा ऐसी कार्रवाई से पहले उस देश से बात की जाती है। चूंकि म्यांमार के साथ अब हमारे रिश्ते काफी सौहार्दपूर्ण हो गए हैं, इसलिए भारतीय सैनिकों ने म्यांमार की सीमा में जाकर उग्रवादियों को ढेर किया। हालांकि सुनने में यह भी आ रहा है कि वहां अब भी 50-60 कैंप काम कर रहे हैं। लिहाजा भविष्य में और ऐसी कार्रवाई होने के कयास बेमानी नहीं हैं।

अलगाववाद या सीमा पार आतंकवाद जैसे मुद्दों के राजनीतिक समाधान के बारे में भी सोचा जाना चाहिए, जैसा कि हमने भूटान के साथ मिलकर किया था। भूटान की सरकार ने उल्फा जैसे उग्रवादी गुटों के खिलाफ कड़ी सैन्य कार्रवाई की। जिस कारण उन्हें या तो भूटान के सैनिकों के हाथों मरना पड़ा, या भागकर हमारी सीमा में आने पर हमारी सेना की गोलियों का निशाना बनना पड़ा। इसलिए अगर राजनीतिक और सैन्य तालमेल बेहतर हों, तो भूटान जैसे प्रयास भी किए जा सकते हैं। मगर ऐसा सभी देशों के साथ नहीं हो सकता, खासकर पाकिस्तान की जमीन पर।
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म्यांमार में हुई कार्रवाई के बाद पाकिस्तान ने हल्ला मचाना शुरू किया है कि उसे म्यांमार न समझा जाए। यह असल में उसका डर है। यह सर्वविदित है कि वहां आतंकियों को पनाह दी जाती है, लिहाजा इस्लामाबाद को यह आशंका है कि ऐसी कार्रवाई अगर उस पर होती है, और आतंकी मारे जाते हैं, तो उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शर्मिंदा होना पड़ेगा। ओसामा बिन लादेन के मामले में उसकी छिछालेदर पहले ही हो चुकी है। हालांकि सच यह भी है कि भारत ऐसी कार्रवाई पाकिस्तान में नहीं कर सकता। इसकी चार-पांच वजहें हैं। पहली बात तो यह है कि म्यांमार सरकार से हमारा तालमेल बेहतर है, जबकि पाकिस्तान से ऐसा नहीं है। इसी तरह पाकिस्तानी सेना का समर्थन भी हमें नहीं मिलेगा, क्योंकि आतंकियों का पोषण परोक्ष रूप से वही करती है। उसकी मंशा है कि भारत अशांत रहे। मगर म्यांमार में हुई सैन्य कार्रवाई के बाद उसके अंदर एक डर पैदा हुआ है। और इसी बौखलाहट में इस्लामाबाद से कई तरह के बयान सामने आ रहे हैं।

वैसे पाकिस्तान में ऐसी सैन्य कार्रवाई न करते हुए दूसरा तरीका अपनाया जा सकता है। वहां के आतंकियों का मुकाबला वहां के ही स्थानीय लोगों को साथ में लेकर किया जा सकता है। पाक अधिकृत कश्मीर में कई लोग उत्पीड़न से नाराज होकर पाकिस्तान की सरकार और वहां की सेना के खिलाफ हैं। ऐसे लोगों को इकट्ठा करके पाकिस्तान की जमीन पर आतंकियों का मुकाबला किया जा सकता है। दूसरा तरीका, इस्राइल जैसा भी है। यानी शहरों के अंदर घूम रहे ताकतवर आतंकियों को मार गिराना और फिर ऐलान भी नहीं करना। सीधी सैन्य कार्रवाई के बजाय पाकिस्तान की जमीन पर पनाह लिए आतंकियों का मुकाबला इन चंद तरीकों से करना बेहतर होगा।

बहरहाल, म्यांमार में की गई सैन्य कार्रवाई में कुछ संदेश भी छिपे हैं। जैसे कि यह कार्रवाई दिखाती है कि अब हमारी विदेश नीति बदल रही है। आने वाले दिनों में भी हम ऐसी कार्रवाइयों से झिझकेंगे नहीं। इतना ही नहीं, यह दिखाता है कि हम ऐसी कार्रवाई में सक्षम भी हैं। दरअसल, सीमा पार जाकर आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करना काफी कठिन है। ओसामा बिन लादेन के खिलाफ भी अमेरिका ने जब सैन्य कार्रवाई की थी, तो उसका एक हेलीकॉप्टर हादसे का शिकार हो गया था। मगर म्यांमार में हमारा ऐसा कोई नुकसान नहीं हुआ। इसलिए इस कार्रवाई को अद्वितीय कहा जा सकता है, और इसे सफलतापूर्वक अंजाम देकर हमने विश्व मंच पर अपनी काबिलियत दिखाई है। ऐसे वक्त में, जब हम पर आतंकी खतरा काफी बढ़ गया है, हमें ऐसी और इससे जुड़ी कार्रवाइयां और बेहतर तरीके से अंजाम देने की जरूरत है। इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव कहीं ज्यादा पड़ता है।
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-लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं
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