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फिर भी दिल मांगे मोर

Wed, 06 Feb 2013 09:40 PM IST
श्याम विमल
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इधर भ्रष्टाचार का ग्राफ सुबह दूना, दोपहर चौगुना और रात अठगुना खमीर-सा फले-फूले जा रहा है। उधर महंगाई का जिराफ ऊपर-दर-ऊपर गर्दन उठाए चरता जा रहा है। ऐसे में आम आदमी की जेब कट रही है। दूसरी ओर, अमीरों की अमीरी बढ़ रही है।
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लोग अमीर क्यों होना चाहते हैं? जबकि परेशानी है इसमें। टेंशन, भय, बीमारियां, टैक्स का भूत, काले धन की कुलक्षणी, स्विस आदि विदेशी बैंकों में खाते खोलने की सिरदर्दी, जाहिर है, काले धन की सजावट से, मिलावटी और नकली माल खपाने जैसी बेईमानी से, रिश्वत-घूस से, बेनामी जमीन पर मल्टीस्टोरी इमारतों की आदर्श स्कीमों से पनपती है।

चारा घोटालों से, संपत्ति की महामाया से, दूरसंचार साधनों वाले सुखरामों और ए राजाओं से, राष्ट्रमंडलीय खेलों के वृहद आयोजनों में कलमाडी होने से, नोटों के बिछौनों पर नींद न आने से पनपती है यह सिरदर्दी। इससे आगे स्टिंग ऑपरेशन, मीडियाकर्मी कैमरों की फ्लैशों की चकाचौंध, फिर थाना-पुलिस और सीबीआई का शिकंजा, कोर्ट के सम्मन-वारंट, कचहरी में पेशियां वगैरह-वगैरह के बावजूद दिल मांगे मोर।
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आज के जमाने में धन-दौलत का छप्पर फाड़कर आना किसी ईश्वरीय कृपा का नतीजा नहीं है। चोर-डाकू गुदड़ी में छिपे लालों को सूंघ लेते हैं और पुलिस के रहमोकरम पर गुदड़ियां लुट जाती हैं। बंद कारों में कैद मोबाइल, लैपटॉप और कैशबैग उठ जाते हैं। क्या लाभ ऐसी असुरक्षित अमीरी से?

धन-दौलत की बढ़ोतरी, तिस पर स्त्री-विमर्श में उपजा शॉपिंग का क्रेज बकौल वर्तमान प्रधानमंत्री के महंगाई का स्रोत है। शॉपिंग के वक्त मुट्ठी में दुनिया वाला मोबाइल होना, बगल में मनीबैग होना, क्रेडिट कार्ड होना, बदन पर भारी गहने होना-मुसीबत की जड़ हैं। इन सबके होने की शान में अपहरण और स्नेचिंग के चांसेज बढ़ते हैं। फिरौती का आतंक, हत्या का डर होना लाजिमी जानिए। बुरे मुहूर्त में एटीएम की शरण में उपस्थित होना मानो चोरों-लुटेरों को न्योतना है।

हमें तो भय है कि आज के पदासीन अर्थशास्त्री नेता और मंत्री ऐसा स्टेटमेंट न देने लगें कि चोरी-लूट-डकैती का आंकड़ा बढ़ने का अर्थ है कि देश में अमीरी बढ़ रही है। महंगाई, मुद्रास्फीति और सेंसेक्स की ऊंचाई-ये सब देश की समृद्धि के प्रमाणपत्र हैं। करीब छह सौ साल पहले कबीर कह गए, मन लागो यार फकीरी में। लेकिन आज दौलत के मारों का दिल है कि मानता नहीं।
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