कोविड-19 का मौजूदा छोटा वैरिएंट जेएन.1, ओमिक्रोन वैरिएंट (बीए.1.529.) का ही वंशज है। दरअसल, ओमिक्रोन चिंता का अंतिम वैरिएंट है, जो नवंबर, 2021 में पहली बार मिला था। दूसरे शब्दों में, वायरस में इतना परिवर्तन नहीं हुआ है कि उसके किसी उप-रूप को चिंता का विषय माना जा सके। जेएन.1 सबसे पहले लक्जमबर्ग में अगस्त, 2023 में मिला था और भारत में यह नवंबर-दिसंबर, 2023 में मिलना शुरू हुआ था। जेएन.1, जिसे पिरोला वैरिएंट भी कहते हैं, ज्यादातर दक्षिण एशियाई देशों और दुनिया के अन्य हिस्सों में कोविड-19 का आम तौर पर प्रसारित होने वाला वैरिएंट है। यद्यपि, जेएन.1 के कुछ नए उप-वंशज, जैसे एलएफ.7 व बीएन.1.8 भी मिले हैं। हालांकि, इन मामलों में कोई बड़ा चिकित्सकीय बदलाव नहीं आया है।
साथ ही वर्ष 2025 के मध्य की स्थिति पांच साल पहले की तुलना में बिल्कुल अलग है। भारत में सभी आयु वर्ग के लोग सार्स सीओवी-2 और ओमिक्रोन सहित कोरोना के विभिन्न वैरिएंट के संपर्क में आ चुके हैं। ज्यादातर वयस्क दो या ज्यादा कोविड-19 टीके लगवा चुके हैं। इसलिए, भारतीय लोगों में प्राकृतिक और टीके की वजह से प्रतिरोधक क्षमता है। अधिकांश लोग दिसंबर 2022 और जनवरी 2023 में ओमिक्रोन वैरिएंट के संपर्क में आए थे। मौजूदा जेएन.1 वैरिएंट ओमिक्रोन परिवार का ही हिस्सा है, इसलिए लोगों की प्रतिरोधक क्षमता बनी रहने की संभावना है।
सवाल उठता है कि आखिर कोविड-19 के मामले क्यों बढ़ रहे हैं? इसका जवाब तीन वैज्ञानिक तथ्यों में निहित है। पहला, सर्वविदित है कि जब कोई वायरस लोगों में प्रवेश करता है, तो वह उनके बीच में ही रहता है। सार्स सीओवी-2 भारत और अन्य जगहों पर अब भी मौजूद है, फिर भी संक्रमण की दर काफी कम है। ऐसा लगता है कि एक पैटर्न उभर रहा है, जिसके तहत कोविड-19 भारत में हर आठ या नौ महीने में उभार दर्ज करता है। पूरी संभावना है कि इस बार भी यह मौसमी पैटर्न की वजह से बढ़ रहा है। दूसरा, सार्स सीओवी-2 आरएनए वायरसों की तरह है, जो अन्य प्रकार के वायरसों की तुलना में लगातार उत्परिवर्तन और आनुवंशिक परिवर्तनों के लिए जाने जाते हैं। यद्यपि, प्रमुख वैरिएंट जेएन.1 ही बना हुआ है, तथापि कुछ नई उप-वंशावलियां भी सामने आई हैं, जो वृद्धि का कारण बन रही हैं। तीसरा, बीते सप्ताह भारत और अन्य देशों में मामलों की वृद्धि होने पर कोविड-19 की जांच बढ़ा दी गई है। इसलिए हम जो उछाल देख रहे हैं, वह कोविड-19 परीक्षण और निगरानी में वृद्धि के कारण है यानी ज्यादा लोगों की जांच की वजह से उनमें संक्रमण का पता चल रहा है।
सवाल है कि यदि हमारे अंदर प्राकृतिक संक्रमण और टीके की वजह से प्रतिरोधक क्षमता है और यह वायरस भी नया नहीं है, फिर इसमें वृद्धि क्यों हो रही है। दरअसल, न तो प्राकृतिक संक्रमण और न ही टीके से प्रेरित प्रतिरोधकता संक्रमण से बचाव करती है। ये मामले कुछ हद तक यही संकेत करते हैं कि लोग अपनी नाक और गले में कोविड-19 वायरस को लेकर चलते हैं। हालांकि, प्रतिरोधक कवच यह सुनिश्चित करता है कि इन्सान बीमार न हो या फिर कम से कम गंभीर बीमारी से तो बचा रहे। मौजूदा साक्ष्यों के अनुसार, अब तक गंभीर बीमारी का कोई मामला सामने नहीं आया है।
हमें वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में भी कोविड-19 के मामलों की समीक्षा करने की जरूरत है। कोविड-19 के मौजूदा स्वरूप से होने वाली बीमारी से ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है। एक सौ चालीस करोड़ की आबादी में से प्रतिदिन करीब सौ मामले ही मिल रहे हैं। कोविड-19 की तुलना में टीबी, इन्फ्लुएंजा और सांस संबंधी बीमारी के ज्यादा मामले मिलते हैं। कोविड-19 के कारण एक-दो मौतें भी हुई हैं, लेकिन इनमें से जिन लोगों की मौतें हुई हैं, उन्हें पहले से भी कई समस्याएं थीं, बस फर्क इतना था कि इसी बीच वे कोरोना संक्रमित भी हो गए। भारत में प्रतिदिन करीब तीस हजार लोगों की मौत वृद्धावस्था या अन्य स्वास्थ्य संबंधी कारणों से होती है। इस पृष्ठभूमि में, कोविड-19 दूसरी बीमारियों की तुलना में कम गंभीर है, जिन्हें अधिक प्राथमिकता दिए जाने की आवश्यकता है।
कई लोग कोविड-19 वैक्सीन की अतिरिक्त खुराक के बारे में भी सवाल कर रहे हैं। भारत में ज्यादातर लोगों को प्राकृतिक और टीके की वजह से मिश्रित प्रतिरक्षा मिली हुई है। रोग-प्रतिरोध का स्तर कम हो सकता है, लेकिन प्रतिरक्षा प्रणाली की मेमोरी सेल भविष्य की गंभीर बीमारी से बचाव के लिए प्रतिक्रिया करने के लिए प्रोग्राम की जाती हैं। भारत में किसी भी आयु वर्ग में अतिरिक्त कोविड-19 टीके की जरूरत नहीं है। इसलिए कोविड-19 के बजाय जिन्हें उच्च जोखिम हैं, उनको फ्लू या फिर चिकित्सक द्वारा बताए जाने वाले दूसरे टीके लगवाने चाहिए। फिलहाल, किसी यात्रा परामर्श या किसी रोकथाम उपाय की जरूरत नहीं। शायद इसकी जरूरत भी नहीं पड़ेगी।
यदि आपको खांसी, जुकाम और बुखार या सांस की कोई बीमारी है, तो खांसते व छींकते वक्त अपनी नाक और मुंह को हमेशा ढककर रखें। चिकित्सक को दिखवाएं। अपनी सेहत का अच्छे से ख्याल रखें और पहले से कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, तो उसका इलाज जारी रखें। एशिया में कोविड-19 में वृद्धि श्वसन वायरस के व्यवहार के अनुरूप है। यह कोई असामान्य बात नहीं है, बल्कि अपेक्षित ही है। रिपोर्टों के अनुसार, बीते कुछ वर्षों से सार्स सीओवी-2 के मामलों में हर छह से नौ महीने में कम या ज्यादा वृद्धि देखी गई है। फिलहाल, चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। बस आवश्यकता इस बात की है कि सरकार इन पर नजर रखे। नागरिक स्वस्थ दिनचर्या और श्वसन संबंधी शिष्टाचार का पालन करें। वास्तव में, यह हमें याद दिलाता है कि हमें जितना संभव हो सके श्वसन संबंधी बीमारियों से खुद को बचाना चाहिए। भारत के लिए, सरकार और नागरिक, दोनों दृष्टिकोण में संतुलन की जरूरत है-न तो इसके जोखिम को हल्के में लें और न ही दहशत फैलाएं। सबसे जरूरी यह है कि किसी भी तरह की अफवाह से खुद भी बचें और इसे फैलाने से भी बचें।