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वह मुस्करा कर चल दिए

Tue, 08 Sep 2015 07:58 PM IST
शरद उपाध्याय
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फिर वही अकेलेपन की रात, वही कम सीटों का गम, वही सत्तामय तन्हाई... इतने दिनों से सब ठीक चल रहा था, गलबहियां डाले गीत गा रहे थे कि यह बंधन तो प्यार का महागठबंधन है। ऐसा लग रहा था कि प्यार की पींगे बढ़कर सत्ता की गृहस्थी बन जाएगी। अलग धर्म, अलग जाति, अलग संप्रदाय की पार्टी प्रवृत्ति पर सत्तामय सुनहरा रंग मधुर संगीत बिखेर देगा। मगर फिर वही पुरानी आदत... दिल के टुकड़े-टुकड़े करके मुस्करा कर चल दिए।
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सचमुच राजनीतिक प्यार की गठबंधन गृहस्थी के फूल खिल भी नहीं पाते कि झट से उस खिलते हुए पौधे को कोई अपना ही झटककर चल देता है। अभी तो सभी ने मिलकर ताजा-ताजा प्यार का पौधा लगाया था, कितने प्यार से सभी उसमें मिलन की खाद दे रहे थे, आपस में कितने प्यार से नैन-मटक्का की सेल्फी पोस्ट कर रहे थे, कि फिर महागठबंधन का पौधा हिल गया।

राजनीतिक गठबंधन के प्यार का इतिहास कभी अच्छा नहीं रहा है। बेचारे करें भी तो क्या? वे तो भोले-भाले राजनीतिक प्रेमी हैं। सत्तामय प्रेमिका को देखकर बैचेन हो जाते हैं। एक हूक-सी दिल में उठती है कि बस किसी भी तरह वह मिल जाए। एक उसे पाने के लिए वे न जाने कितने प्रासंगिक, अप्रासंगिक मेल मिलाप कर बैठते हैं, न चाहते हुए भी न जाने कितनी कसमें खा लेते हैं। अकेले होते, तो कोई बात नहीं होती। किसी भी तरह से जनता प्रेमिका को बहला-फुसला लेते। फिर सामने रकीब भी तो मजबूती से खड़ा हुआ है। वह कभी महंगी-महंगी गिफ्टें भेजता है, तो कभी मीठी-मीठी मन की बातें बांचता है।
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फटे कपड़ों और भूख से कुलबुलाती आंतों से आहत जनता इन दिनों प्रेम की लोरी सुन रही है। कोई अच्छे दिन ला रहा है, तो कोई समूची दुनिया को बदलने का संकल्प दे रहा है। ये बेचारे प्यार के गठबंधन के साथी, तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद बस यही गीत गाए जा रहे हैं- एक-दूसरे के वास्ते मरना पड़े तो, हैं तैयार हम। अब कह तो यही रहे हैं। आगे-आगे देखते हैं, होता है क्या?
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